3.5 Very Good

Karthik Calling Karthik

‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’ की मुख्य भूमिका में हैं फरहान अख्तर। कार्तिक एक सीधे-सादे, हारे हुए मध्यम परिवार के लड़के की कहानी है, जिसमें आत्मविश्वास नाम की कोई चीज नहीं है और जो जिंदगी में हमेशा मजाक का पात्र बना रहता है।

भोला-भाला और निष्कपट कार्तिक चुपचाप काम करने में यकीन रखता है, लेकिन उसके दिल के एक कोने में अपनी खूबसूरत और आकर्षक सहकर्मी शोनाली मुखर्जी (दीपिका पादुकोण) के लिए प्यार पलने लगता है, पर वह कभी उसका इजहार नहीं कर पाता, क्योंकि उसमें आत्मविश्वास की कमी है। और शोनाली को यह भी नहीं पता कि पिछले चार साल से कोई कार्तिक उसके दफ्तर में काम करता है।

अब अचानक जो बदलाव होते हैं उनसे कार्तिक कि जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। और यह काम होता है एक फोन कॉल के जरिए। कार्तिक का एक हमनाम उसे फोन करता है और उससे वह सब कुछ करवाता है जो वह खुद चाहता है।

यहां तक तो ऐसा लगता है कि फिल्म आत्मविश्वास सिखाने का पाठ भर है। लेकिन कहानी में रोमांच तब बढ़ जाता है जब कार्तिक को बदलनेवाला कार्तिक उसका दुश्मन हो जाता है। अब फिल्म एक नाटकीय मोड़ लेती है और बेचारा कार्तिक खुद ही अपनी जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में लग जाता है और ये क्षण दिल को छू लेनेवाले हैं।

लेखक-निर्देशक विजय ललवानी ने ‘कार्तिक...’ को बड़े ही प्यार से बनाया है। उनकी हॉलीवुड शैली बेहद दिलचस्प है और संपादन भी चुस्त है। कहानी में नयापन नहीं है, लेकिन उसकी शैली और संवाद उसे दर्शनीय बना देते हैं। सिनेमाटोग्राफी भी आकर्षक है।

फिल्म आपको कार्तिक का हमदर्द बना देती है। जब भी फोन बजता है आप भी परेशान हो जाते हैं।

निर्देशक हमारे दिमाग द्वारा खेले जानेवाले खेल से पैदा हुई कहानी के रोमांच को बहुत ही प्रभावी रूप से फिल्माने में सफल रहे हैं। हालांकि मध्यांतर तक दर्शकों को पता चल जाता है कि फिल्म क्या बताना चाहती है, लेकिन इसके बावजूद रोमांच और रहस्य अंत तक बना रहता है। आपको अंत तक पता ही नहीं चलता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सच जानने के लिए आपको फिल्म ही देखनी होगी।

फरहान अख्तर ने इस फिल्म में खुद को और श्रेष्ठ साबित किया है। पर्दे पर वे खूब जंचते हैं और यह भी साबित होता है कि किसी भी तरह के किरदार में डूब जाने का माद्दा उनमें है। एक बेहतरीन अदाकार अपने निर्माण की प्रक्रिया में है और फरहान इसे जारी रखते हैं तो यह समय बेहतर है।

दीपिका पादुकोण मन को लुभाती हैं और एक बिंदास बाला के रूप में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं। इस फिल्म में उन्हें अभिनय दिखाने के लिए ज्यादा अवसर नहीं थे, लेकिन फरहान के साथ आकर्षक जोड़ी बनाने में वे सफल हुई हैं।

राम कपूर, विवन भतेना, तराना, शेफाली छाया और विपिन शर्मा ने अपनी-अपनी भूमिकाएं बखूबी निभाई हैं।

लोकप्रिय गाने फिल्म की धीमी रफ्तार में राहत पहुंचाते हैं।

लेकिन ‘कार्तिक...’ किसी रहस्यमय या थ्रीलर फिल्म की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, लेकिन यह कहानी आपके मन को छूती जरूर है।

विजय ललवानी ने दिखाया है कि किसी संवेदनशील विषय को रुपहले पर्दे पर उतारने के लिए केवल ‘तारे जमीन पर’ और ‘माई नेम इज खान’ जैसे रास्ते ही नहीं हैं। हां, इतना है कि रहस्य खुल जाने के बाद ‘कार्तिक...’ दुबारा नहीं देखी जा सकती।