एक्टर से फ़िल्ममेकर बने राकेश रोशन 6 सितंबर को अपना 73वां जन्मदिन सेलिब्रेट करेंगे । बॉलीवुड अभिनेता ॠतिक रोशन के पिता और एक सफ़ल फ़िल्ममेकर राकेश रोशन ने हिंदी सिनेमा को करण अर्जुन, किशन कन्हैया, कोयला, कहो न प्यार है, कोई मिल गया, कृष और कृष 3 जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में दी हैं और अब वह ॠतिक रोशन की कृष 4 की तैयारी में जुटे हुए हैं । हाल ही में राकेश रोशन ने बॉलीवुड हंगामा के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत की जिसमें उन्होंने बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप होती हिंदी फ़िल्मों के बारें में खुलकर बात की साथ ही कहा कि हमें पुष्पा और आरआरआर की सफ़लता से सीखना चाहिए कि उन फ़िल्मों में ऐसा क्या था जो वो फ़िल्में लोगों को इतनी पसंद आई ।

EXPLOSIVE: बॉक्स ऑफिस पर हिंदी फ़िल्मों के लगातार फ़्लॉप होने का कारण बताते हुए राकेश रोशन ने कहा, “हमारे बॉलीवुड फिल्ममेकर्स को पता नहीं क्या हो गया है ; हमें पुष्पा और आरआरआर की सफलता से सीखना चाहिए”

सवाल- कई हिंदी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल पा रही हैं । आपको क्या लगता है ऐसा क्यों हो रहा है ?

जवाब- ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिन्हें वे और उनके दोस्त देखना पसंद करते हैं । वे ऐसे विषय चुन रहे हैं जो दर्शकों के बहुत छोटे वर्ग को पसंद आते हैं । दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा इससे रिलेट नहीं हो सकता । एक और बड़ी समस्या यह है कि फिल्म के गानों में कोई दम नहीं हैं । या तो गानों को बैकग्राउंड में चला दिया जाता है और कभी-कभी केवल मुखड़ा बजाया जाता है । पहले 6 गाने हुआ करते थे । ये गाने अभिनेताओं को सुपरस्टार बनने में मदद करते थे । आप पुराने गानों से हीरो को याद रखते हैं । जब भी आप पुराने क्लासिक्स सुनते हैं, तो आपको उन गानों के हीरो याद आते हैं । आजकल, जब गाने ही यादगार नहीं हैं, तो हीरो याद नहीं आते हैं । इसी का नतीजा है कि मौजूदा समय में सुपरस्टार बनना बहुत मुश्किल है ।

अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, जीतेंद्र, देव आनंद, संजीव कुमार, शम्मी कपूर, राज कपूर, शशि कपूर आदि के गाने आप देखिए। फिल्म सुपर डुपर हिट । उदाहरण के लिए पुष्पा या आरआरआर को ही ले लें, इन फ़िल्मों का हर गाना एक क्रेज बन गया । इसलिए हमें पुष्पा और आरआरआर की सफलता से सीखना चाहिए ।

सवाल- आज, बॉलीवुड में, दुर्भाग्य से ऐसे निर्देशकों को ढूंढना मुश्किल है जो कमर्शियल हिट दे सकते हैं या जो पैन इंडिया फिल्में बना सकते हैं । दक्षिण में, जबकि सीन अलग है…

जवाब- दक्षिण में, वे अभी भी अपनी जड़ों से संबंधित कहानियों पर टिके हुए हैं और कमर्शियल संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें बहुत उन्नत तरीके से उन्हें प्रस्तुत कर रहे हैं । अगर आप आरआरआर और बाहुबली जैसी फिल्में देखें, तो उनकी बिटन-टू-डेथ कहानियां हैं । बाहुबली करण अर्जुन से काफी मिलती-जुलती है । लेकिन इसे बड़े पैमाने पर पेश किया गया । यहां तक कि गाने भी शानदार थे और इसलिए लोगों को पसंद आए । और हमारे बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं को पता नहीं क्या हो गया है । वे भारतीयता की जड़ों से दूर हो गए हैं । वे तथाकथित 'आधुनिक सिनेमा' बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन यह केवल 1% आबादी को पसंद आता है बस। यह बी और सी केंद्रों को पसंद नहीं आता है । इसलिए यदि आप सी, बी और ए केंद्रों की पसंद के विषयों को चुनते हैं और उन्हें बहुत ही नए तरीके से प्रस्तुत करते हैं, तो यह सभी को पसंद आएगा ।

सवाल- महामारी से पहले, फिल्म निर्माताओं को पता था कि वे एक बड़ी शुरुआत के साथ और शुरुआती सप्ताहांत में अपने निवेश की वसूली कर सकते हैं । लेकिन अब तो उनकी फिल्मों को ओपनिंग भी अच्छी नहीं मिल रही है...

जवाब- दुर्भाग्य से, इस महामारी के समय में, फिल्म निर्माता, अच्छी स्क्रिप्ट को ज्यादा समय देने के बजाय, कैलक्यूलेशन पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं । एक फिल्म में निर्देशक का जुनून दिखना चाहिए । जिस फ़िल्म में आप उसके डायरेक्टर का सिग्नेचर स्टाइल नहीं देखते हैं तो वो फ़िल्म काम नहीं कर सकती है । आपकी पहली प्रतिक्रिया होनी चाहिए, 'वाह...क्या बनाया है उसने'! फिल्म को आपसे खुद ही बात करनी चाहिए । लेकिन आजकल निर्देशक की स्किल नहीं दिख पाती इसलिए फ़िल्म भी नहीं चल पाती ।