
क्या आप चाहते हैं कि आपकी फ़िल्म हर आयु वर्ग के दर्शक देखें ? तब फ़िल्म की भाषा अच्छा रखिए । और भूल से भी महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल न करें । यहां तक की 'साली' शब्द की भी अनुमति नहीं है । सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) को सख्ती से यह कहा गया है कि महिलाओं के खिलाफ मौखिक और शारीरिक हिंसा को दर्शाती कोई भी फ़िल्म, चाहे वह घरेलू हिंसा के बारे में क्यों न हो, पास नहीं किया जाएगा जब तक की उसमें से उन शब्दों को हटा न लिया जाए जो महिलाओं के खिलाफ़ हो ।
सीबीएफसी के एक स्रोत का कहना है, , "फ़िल्म में एक थप्पड़ की भी अनुमति नहीं दी जाएगी फ़िर चाहे वो फ़िल्म घरेलू हिंसा के बारे में क्यों न हो । उसकी जगह आप एक काली आँख या सूजे हुए गाल के साथ महिलाओं को दिखा सकते हैं जो ये दर्शाएगा कि महिला पर अत्याचार हुआ है । लेकिन आप यह नहीं बता सकते कि उसे ये कैसा लगा ।”
"साली" देश के कई हिस्सों में बातचीत में स्वीकार्य शब्द हो सकता है । हालांकि फ़िल्म निर्माता साकेत चौधरी की आगामी फ़िल्म हिंदी मीडियम को कहा गया था कि यदि उन्हें उनकी फ़िल्म के लिए 'यू' प्रमाणपत्र चाहिए तो वह फ़िल्म में से अभद्र भाषा को हटा दे ।
सेंसर बोर्ड के करीबी सूत्रों के मुताबिक, "हिंदी मीडियम एक संदेश-उन्मुख फिल्म है । यह हमें बताती है कि माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भर्ती करने के लिए कितनी मुश्किल उठाते हैं । हम चाहते थे कि इस फ़िल्म को माता-पिता और बच्चें दोनों साथ में देखें । लेकिन इस फ़िल्म में महिलाओं पर कुछ दुर्व्यवहार दिखाया गया है जो अनुचित है । हमने उन्हें कहा कि 'यू' प्रमाण पत्र से पहले वो सब हटा दो ।
यह सुनने में आ रहा है कि हिंदी मीडियम में महिलाओं के खिलाफ़ कुछ अभद्र शब्दों का इस्तेमाल हुआ हैं जैसे 'कुतिया', 'हरामजादी', 'साली' । पहलाज निहालनी कहते हैं कि, "हम महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह की मौखिक या शारीरिक हिंसा को जरा भी सहन नहीं कर सकते हैं । जिन शब्दों का आप जिक्र कर रहे हैं उन्हें महिलाओं के खिलाफ मानकर फ़िल्म को अनुमति नहीं दी जाएगी, फ़िर भले ही फिल्म हमारे द्वारा 'केवल वयस्क' के रूप में प्रमाणित हो ।
















