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इस साल अप्रैल में संजय लीला भंसाली को पंडित दीनानाथ मंगेशकर अवॉर्ड से समान्नित किया गया था, ये अवॉर्ड संजय लीला भंसाली की आदर्श लता मंगेशकर के पिता के नाम पर रखा गया है । पुरस्कार प्राप्त कर संजय ने कहा कि, 'ये मेरे करियर का अब तक का सबसे सर्वोच्च सम्मान है जो मैं अब तक प्राप्त कर सका । जब मुझे ये पुरस्कार दिया जा रहा था तब वहां लताजी उपश्तित नहीं हो सकी । लेकिन आशाजी (आशा भोंसले) ने मुझे ये पुरस्कार प्रदान किया । लेकिन उसके बाद लताजी ने मुझसे आधा घंटे फ़ोन पर बात की । मेरा विश्वास कीजिए, एक कलाकार के रूप में वो मेरे जीवन का सबसे अनमोल पल था ।

संजय लीला भंसाली ने अब अपनी अगली फ़िल्म अपनी आदर्श लता मंगेशकर को समर्पित करने का फ़ैसला किया है । भंसाली कहते हैं, मैं बार-बार यह बात कह चुका हूं, अब दोबार मैं कहता हूं । उनकी आवाज़ सुनकर ही मैंने फ़िल्म निर्माण करना सीखा है । उनकी आवाज़ में हर मानवीय भावनाएं शामिल हैं जो नैसर्गिकरूप से हर किसी के दिल में उतर जाती है ।

लेकिन मेरी असली प्रेरणा का तरीका वो है जब वह किसी प्रयास और तनाव के लक्षण दिखाए बिना उच्चतम स्वर लगाती हैं । यही कारण उन्हें लता मंगेशकर बनाता है कि वह क्या हैं ।

भंसाली कहते हैं कि 'यह यह संगीत की अभिव्यक्ति का शिखर है जहां संगीत के सुर गहराई से दिल में उतरते हैं और यही वो अपने सिनेमा में या फ़िल्म में पाने की कोशिश करते हैं । मेरी फ़िल्म में भावनाएं उच्चतम तरीके से स्थिर रहती हैं । पिच पर एक संतुलन बनाए रखने का जज्बा सिर्फ़ लताजी के लिए ही संभव है । मैं बिल्कुल ऐसा ही संतुलन पाने की कोशिश करता हूं । मैं जब भी लता जी का गाया गाना 'मैं तेरे इश्क में मर न जाऊं कहीं (फ़िल्म -लोफ़र, गीत बनाया- लक्ष्मीकांत प्यारेलाल) सुनता हूं, तो मेरे अंदर एक तड़प जाग जाती है और जो मुझे ऐसा ही मेरी फ़िल्म में करने की चुनौती देती है ।