फ़िल्म :- सरफिरा
कलाकार :- अक्षय कुमार, राधिका मदान, परेश रावल
निर्देशक :- सुधा कोंगारा
रेटिंग :- 2.5 स्टार्स

संक्षिप्त में सरफिरा की कहानी :-
सरफिरा एक आदमी और उसके असंभव से लगने वाले सपने की कहानी है । वर्ष 1998 है। वीर म्हात्रे (अक्षय कुमार) महाराष्ट्र के जारेन्देश्वर गांव में रहता है । रानी (राधिका मदान) एक अरेंज मैरिज के लिए उससे मिलने आती है । वीर उसे बताता है कि भारत की पहली कम लागत वाली एयरलाइन शुरू करना उसका सपना है । हालाँकि, वह असफल रहा है क्योंकि कोई भी बैंक उसे बड़ी रकम उधार देने को तैयार नहीं है । रानी वीर में दिलचस्पी रखती है लेकिन यह स्पष्ट करती है कि अगर वह अपने प्रयास में सफल होता है तो वह उससे शादी करेगी । इस बीच, वीर अपने लक्ष्य की ओर काम करना जारी रखता है । उनके आदर्श जाज एयरलाइंस के मालिक परेश गोस्वामी (परेश रावल) हैं । वीर की उनसे मिलने की कोशिशें बेकार साबित होती हैं । इसलिए, वह अपना सारा पैसा उसी फ्लाइट में बिजनेस क्लास की टिकट बुक करने में खर्च कर देता है जिसमें परेश यात्रा कर रहा होता है । वीर बीच उड़ान में परेश से मिलता है और अपना विचार बताता है। परेश इसे अस्वीकार कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि उसके ग्राहक आम आदमी के साथ यात्रा करने में सहज नहीं होंगे । फंडफ्लो वेंचर्स के प्रकाश बाबू (प्रकाश बेलावाड़ी) उसी फ्लाइट में सवार होते हैं । वे वीर के विचार में रुचि दिखाते हैं । वीर फंडफ्लो के बोर्ड को आश्वस्त करता है कि उसकी एयरलाइन कंपनी अनोखे उपायों के ज़रिए मुनाफ़ा कमा सकती है। उसके लिए सब कुछ ठीक चल रहा होता है, लेकिन एक दिन उसे अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका लगता है ।
सरफिरा मूवी रिव्यू :-
सरफिरा 'सिंपली फ्लाई - ए डेक्कन ओडिसी' किताब से प्रेरित है । सुधा कोंगरा की कहानी दिलचस्प है। सुधा कोंगरा और शालिनी उषादेवी की पटकथा मनोरंजक है, हालांकि इसमें कुछ कमियाँ हैं। पूजा तोलानी के डॉयलॉग्स शार्प हैं।
सुधा कोंगरा का निर्देशन प्रभावी है। वह एक प्रेरक कहानी बताती है, वह भी जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में कम लागत वाली हवाई यात्रा कैसे शुरू हुई । फिल्म मनोरंजक और नाटकीय क्षणों से भरपूर है जो रुचि को बनाए रखते हैं जैसे कि इंट्रो सीन, फ्लाइट में वीर की परेश गोस्वामी से पहली मुलाकात, वीर द्वारा उडिपी के एक रेस्तरां में प्रकाश बाबू को कम लागत वाली यात्रा के विचार के बारे में बताना आदि। घर पहुँचने के लिए पैसे इकट्ठा करने के लिए वीर का संघर्ष करने वाला दृश्य और उसके बाद का दृश्य दिल दहला देने वाला है। मध्यांतर बिंदु अप्रत्याशित है। अंतिम 15 मिनट दर्शकों की आँखों को नम कर देंगे।
वहीं कमियों की बात करें तो, फिल्म कुछ जगहों पर कमज़ोर हो जाती है, खासकर सेकेंड हाफ़ में। रोमांटिक ट्रैक मधुर है लेकिन यह कथा को लंबा भी करता है। एपीजे अब्दुल कलाम वाला दृश्य अति नाटकीय है। ओरिजनल फिल्म में, यह कहीं अधिक वास्तविक लग रहा था । साथ ही, यह मुख्य रूप से शहरी दर्शकों के लिए एक फिल्म है, न कि आम जनता के लिए। फिल्म देखने वालों का एक बड़ा वर्ग यह जानने में दिलचस्पी नहीं रखेगा कि भारत की कम लागत वाली एयर कैरियर की शुरुआत कैसे हुई ।
सरफिरा मूवी में परफॉरमेंस :-
अक्षय कुमार शानदार हैं और उनका अभिनय इमोशंस से भरपूर है। वे मज़ेदार और नाटकीय दृश्यों में तो वह बेहतरीन हैं, लेकिन इमोशनल सींस में वहाँ देखने लायक़ हैं । राधिका मदान ने आत्मविश्वास से भरपूर अभिनय किया है। यह कोई आसान भूमिका नहीं है, लेकिन वे इसमें शानदार प्रदर्शन करती हैं । परेश रावल खलनायक के रूप में शानदार लगते हैं। कोई भी उनकी हरकतों से नफरत किए बिना नहीं रह सकता । प्रकाश बेलावाड़ी ने अच्छा साथ दिया है। आर सरथकुमार (नेदुमारन; भारतीय वायुसेना में वीर के कमांडिंग ऑफिसर), अनिल चरणजीत (मंदार), इरावती हर्षे मायादेव (चित्रा; ऑल इंडिया रेडियो) और वीर के पिता की भूमिका निभाने वाले अभिनेता सहायक भूमिकाओं में प्यारे हैं। सीमा बिस्वास ने खास तौर पर फ्लैशबैक सीन में अपनी छाप छोड़ी है। कृष्णकुमार बालासुब्रमण्यम (चैतन्य राव) और सौरभ गोयल (सैम) अच्छे हैं। जय उपाध्याय (रानी के मामा) कुछ हंसी-मज़ाक करते हैं। राहुल वोहरा (शशांक देशमुख; डीजीसीए अधिकारी) ठीक-ठाक हैं। सूर्या कैमियो में शानदार लग रहे हैं।
सरफिरा फिल्म का संगीत और अन्य तकनीकी पहलू :-
जी वी प्रकाश कुमार का संगीत कहानी में अच्छी तरह से समाया हुआ है, लेकिन साउंडट्रैक में एक भी हिट गाना नहीं है। सभी गाने - 'मार उड़ी', 'खुदाया, 'सारे की', 'दे ताली', 'चावत', 'धोखा' और 'ये कहानी' भावपूर्ण और अच्छी रचनाएँ हैं। जी वी प्रकाश कुमार का बैकग्राउंड स्कोर उत्साहजनक है।
निकेत बोम्मी की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। फाल्गुनी ठाकोर की वेशभूषा यथार्थवादी है। अरविंद अशोक कुमार और बिंदिया छाबड़िया का प्रोडक्शन डिज़ाइन प्रामाणिक है। एएनएल अरासु और परवेज़ शेख का एक्शन न्यूनतम और काफी अच्छा है। एनवाई वीएफएक्सवाला, वीएफएक्स ट्रायंगल स्टूडियो का वीएफएक्स आकर्षक है। सतीश सूर्या की एडिटिंग और शार्प की जा सकती थी ।
क्यों देंखे सरफिरा :-
कुल मिलाकर, सरफिरा आकर्षक तरीके से बनाई गई एक प्रेरणादायक कहानी बताती है जो अक्षय कुमार के दमदार अभिनय पर टिकी हुई है । बॉक्स ऑफिस पर, एक खास विषय और सीमित चर्चा के कारण इसकी संभावनाएं बहुत सीमित होंगी। इसलिए, यह एवरेज बिज़नेस कर पाएगी ।
















