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रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट एक अविश्वसनीय वैज्ञानिक की कहानी है । 60 के दशक के उत्तरार्ध में, नंबी नारायणन (आर माधवन) एक प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं जो विक्रम साराभाई (रजीत कपूर) के सानिध्य में तकनीकी सहायक के रूप में इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) के लिए काम करते हैं । उन्हें 1969 में प्रतिष्ठित प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला और इसलिए वे न्यू जर्सी, यूएसए चले गए । प्रोफेसर क्रोको (विंसेंट रिओटा) के सानिध्य में अपनी थीसिस करना उनका सपना है । प्रोफेसर छात्रों को स्वीकार नहीं कर रहा है, लेकिन अनुनय, तेज दिमाग के कारण नंबी के लिए एक अपवाद बनाते है और इसलिए भी कि नंबी घर और प्रोफेसर की बीमार पत्नी (ब्रांका पेट्रिक) की देखभाल करने की पेशकश करते है । प्रोफेसर क्रोको के अधीन और प्रिंसटन में अध्ययन करके, नंबी को तरल गैसों के बारे में बहुत ज्ञान प्राप्त हो जाता है । उसे नासा से एक ऑफ़र मिलता है लेकिन वह इसे अस्वीकार कर देता है ताकि वह भारत लौट सके और इसरो को बुलंदियों पर ले जा सके । नंबी की वजह से, इसरो रोल्स रॉयस से हाइड्रोलिक इंजन के पुर्जे मुफ्त में प्राप्त करना मैनेज करता है । वह इसरो के वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ फ्रांस भी जाता है ताकि उनके अंतरिक्ष मिशन में उनकी मदद की जा सके । बदले में, नांबी और वैज्ञानिक आगे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के बारे में सीखते हैं । यूएसएसआर के पतन के दौरान, नंबी क्रायोजेनिक ईंधन-आधारित इंजनों को कम कीमत पर सुरक्षित करने की पूरी कोशिश करता है । नंबी के लिए सब ठीक चल रहा है लेकिन 30 नवंबर 1994 को सब कुछ बदल जाता है । नंबी को जासूसी के आरोप में और पाकिस्तान को महत्वपूर्ण रहस्य लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है । आगे क्या होता है इसके लिए फ़िल्म देखनी होगी ।

Rocketry – The Nambi Effect Movie Review: आर माधवन की अवॉर्ड विनिंग परफ़ोर्मेंस से सजी रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट हैरान कर देती है

आर माधवन की कहानी (अंजलि नायर, अनंत नारायण महादेवन और श्रीदेवी कृष्णन की अतिरिक्त कहानी) काफी आशाजनक है और एक बेहतरीन फिल्म बनाती है । आर माधवन की पटकथा (सुखमणि साधना और अंजलि नायर की अतिरिक्त पटकथा) ठीक है । लेखन ऐसा है कि कोई नंबी की जर्नी में शामिल हो जाता है और उन कठिनाइयों से भी आगे बढ़ता है जब उन पर देशद्रोही होने का झूठा आरोप लगाया जाता है । हालांकि फर्स्ट हाफ को और बेहतर लिखा जा सकता था । आर माधवन के डायलॉग (राहुल पांडे के अतिरिक्त संवाद) सरल है इसी के साथ तीखे भी हैं । हालांकि, फ़र्स्ट हाफ में काफी तकनीकी शब्दजाल का इस्तेमाल किया गया है और इसे टाला जा सकता था ।

आर माधवन का निर्देशन अच्छा है । यह उनका पहला निर्देशन है और उन्होंने कुछ दृश्यों को असाधारण रूप से हैंडल किया है । उनका विषय का चुनाव भी बहुत अच्छा है क्योंकि दर्शकों को इस महान व्यक्ति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है । आर माधवन उनके जीवन के अहम पहलू उठाते हैं और उन्हें मनोरंजक तरीके से निष्पादित करते हैं । दर्शकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि नंबी नारायणन ने एपीजे अब्दुल कलाम के साथ काम किया था और उन्होंने नील आर्मस्ट्रांग और रोल्स रॉयस के सीईओ क्लीवर ह्यूजेस को प्रभावित किया था । साथ ही, यह तथ्य कि इस तरह की प्रतिभा को एक तुच्छ मामले में दो दशकों से अधिक समय तक भुगतना पड़ा, यह देखकर दर्शक हैरान रह जाएंगे और यहां तक कि उन्हें उत्तेजित भी करेंगे । दूसरी ओर, 157 मिनट पर फिल्म बहुत लंबी लगती है । फ़र्स्ट हाफ़ हाफ कमजोर है और जटिल रॉकेट साइंस भाषा का उपयोग दर्शकों को अपना सिर खुजलाने पर मजबूर कर देगा । सेकेंड हाफ़ बेहतर है क्योंकि यह नंबी परिवार के उन पर देशद्रोही आरोप लगाए जाने के बाद के संघर्षों पर केंद्रित है । हालांकि, यहां भी कई सवाल अनुत्तरित रह गए हैं । अंत में, उत्साह सीमित है और इसलिए, इसकी बॉक्स ऑफिस संभावनाएं धूमिल लगती हैं ।

रॉकेट: नंबी इफेक्ट एक लंबे शॉट के साथ शुरू होती है जो दर्शकों को प्रभावित करेगी । शुरुआत में ही नंबी को अपमानित और गिरफ्तार होते दिखाया गया है । फ़र्स्ट हाफ़ में कुछ दृश्य ऐसे सामने आते हैं, जो ध्यान खींचते है । जैसे नंबी प्रोफेसर क्रोको को लुभाते हैं, नंबी प्रोफेसर चोकमार्क को साबित करते हैं कि वह गलत थे और नंबी बेटे की मौत के बारे में उन्नी से छिपा रहे थे । इंटरमिशन प्वाइंट रोमांचक है । इंटरवल के बाद, नंबी से पूछताछ के दृश्य शानदार हैं । फिनाले में असली नंबी नारायणन को दिखाना दिल छू लेने वाला है ।

एक अभिनेता के रूप में आर माधवन शानदार फॉर्म में हैं । उन्होंने इस परफॉर्मेंस में अपना दिल और आत्मा दोनो लगा दी है और उनका लुक भी उनके इसमें उनका साथ देता है । यह देखकर हैरानी होती है कि बड़े नंबी के रूप में उनका लुक बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि असली नंबी नारायण का है । रॉकेट: नंबी इफ़ैक्ट निश्चित रूप से उनके सबसे सफल प्रदर्शनों में से एक है । सिमरन (नंबी की पत्नी मीना) को फ़र्स्ट हाफ में ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं मिलता लेकिन सेकेंड हाफ़ में वह अपनी छाप छोड़ती है । सैम मोहन (उन्नी) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और वह बहुत अच्छा करते है । कार्तिक कुमार (सीबीआई अधिकारी पी एम नायर) छोटी भूमिका में एक बड़ी छाप छोड़ते हैं । रजत कपूर प्यारे लगते हैं । विन्सेंट रिओटा सभ्य है जबकि ब्रांका पेट्रिक दर्शकों को मुस्कुराने में कामयाब होते है । अनुरीता झा (मरियम रशीदा), दिनेश प्रभाकर (इंस्पेक्टर एल डी गोपाल), अमान (एपीजे अब्दुल कलाम), राजीव रवींद्रनाथन (नांबी के सहयोगी परम), भावशील सहानी सिंह (नांबी के सहयोगी सरताज), व्लादिमीर वुकोविक (यूरी), रिक जिंगल (प्रोफेसर चोकमार्क) ), दीपक कृपलानी (सतीश धवन), रॉन डोनाची (क्लीवर ह्यूजेस, रोल्स रॉयस के सीईओ) और श्रीराम पार्थसारथी (बैरी अमलदेव) भी अच्छा करते हैं । अंत में, शाहरुख खान एक विशेष उपस्थिति में उत्कृष्ट हैं । उनकी मौजूदगी फिल्म का लेवल बढ़ाती है ।

संगीत कुछ खास नहीं है । फिल्म में 'श्री वेंकटेश सुप्रभातम' को अच्छी तरह से बुना गया है । 'बहन दो' और 'आसमान' अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रहते हैं । सैम सी एस का बैकग्राउंड म्यूजिक (दिवाकर सुब्रमण्यम का अतिरिक्त संगीत) प्राणपोषक है और कई दृश्यों में प्रभाव को बढ़ाता है ।

सिरशा रे की सिनेमेटोग्राफ़ी परफ़ेक्ट है । रंजीत और प्रेरणा का प्रोडक्शन डिजाइन विस्तृत है । निहारिका खान और गौतमी हाजरा की वेशभूषा वास्तविक है और पीरियड सेटअप के साथ सेट होती है । विक्रम गायकवाड़, फराह तारापुर और रोहन जगताप का मेकअप और हेयर डिजाइन काबिले तारीफ है, खासकर आर माधवन के मामले में । एक्शन भी वास्तविक से लगते है । गोल्डन स्क्वायर मीडिया वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड, हाइव एफएक्स स्टूडियोज़ और रेडचिलीज़ वीएफएक्स का वीएफएक्स रिच है । बिजित बाला की एडिटिंग शार्प होनी चाहिए थी ।

कुल मिलाकर, एक प्रतिभाशाली इसरो वैज्ञानिक की हैरान कर देने वाली कहानी को पेश करती रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट आर माधवन की अवॉर्ड विनिंग परफ़ोर्मेंस से सजी है । बॉक्स ऑफिस पर यह फ़िल्म दर्शक जुटाने के लिए पॉजिटिव वर्ड ऑफ़ माउथ पर निर्भर रहेगी ।