बॉलीवुड परिवार के सबसे प्रतिष्ठित परिवार में से एक है देओल परिवार । और जब पूरा देओल परिवार किसी फ़िल्म में एक साथ नजर आ जाए तो इससे बड़ी ट्रीट उनके फ़ैंस के लिए और क्या हो सकती है । धर्मेंद्र, सनी देओल और बॉबी देओल की जबरद्स्त कैमि्स्ट्री को दर्शाती उनकी हिट फ़्रैंचाइजी फ़िल्म यमला पगला दीवाना ने दर्शकों के दिल में खासी जगह बनाई और देओल एक बार फ़िर अपनी इस फ़िल्म की तीसरी किश्त लेकर आए हैं, यमला पगला दीवाना फ़िर से । क्या इस हफ़्ते रिलीज हुई ये फ़िल्म दर्शकों को हंसाने में कामयाब हो पाती है या निराश करती है, आईए समीक्षा करते है ।

यमला पगला दीवाना फ़िर से,एक भ्रष्ट दवा कंपनी के खिलाफ ऐसे आदमी के संघर्ष की कहानी है । फिल्म की कहानी पंजाब से शुरू होती है जहां अमृतसर में वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल) अपना एक आयुर्वेद का क्लीनिक चलाता है । वह अपनी वैद्यशाला में अपने पूर्वजों द्वारा पारित प्राचीन औषधीय ज्ञान का उपयोग करता है । पूरण के साथ उनका भाई काला (बॉबी देओल) और दो बच्चों के साथ रहता है । पूरन सिंह का एक किराएदार भी है जिसका नाम जयवंत परमार (धर्मेंद्र) है । जो पेशे से वकील भी है । पूरन सिंह के पास वज्र कवच नामक आयुर्वेदिक दवा बनाने का फार्मूला है, जिसका काम कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है । उस फार्मूले के पीछे मशहूर बिजनेसमैन माफतिया लग जाता है । कहानी में चीकू (कृति खरबंदा) की एंट्री होती है जो कि एक डेंटिस्ट है और सिलसिलेवार घटनाओं में उसकी मुलाकात पूरन सिंह और काला से होती है । कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब बिजनेसमैन माफिया अपनी तरफ से पूरण सिंह के ऊपर दवा का फॉर्मूला चोरी करने का केस करता है और कहानी पंजाब से गुजरात पहुंच जाती है । अंततः क्या होता है यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी ।
धीरज रतन की कहानी काफ़ी बेकार और पुरानी है । इस तरह की कहानी वाली फ़िल्में 90 के दशक में, या यहां तक कि पिछले दशक में भी काम करेगी लेकिन अब और नहीं । धीरज रतन की पटकथा सबसे बड़ी दोषी है । यदि फ़िल्म की स्क्रिप्ट अच्छे से गूंथी गई होती तो यह एक अच्छी फ़िल्म साबित हो सकती थी । लेकिन दुख की बात ये है कि, ऐसा नहीं हुआ है । कुछ दृश्यों को कहानी के स्तर पर अच्छी तरह से सोचा जाता है लेकिन स्क्रिप्ट स्तर पर, यह कपूत साबित होते है ।
नवनीत सिंह का निर्देशन काफ़ी साधारण है । वह अपना कुछ नहीं जोड़ते हैं ऐर सिर्फ़ खराब लेखन को ही निष्पादित करते रह जाते है ।
यमला पगला दीवाना फ़िर से, शुरूआत में आकर्षित करती है जब सूत्रधार अन्नू कपूर आयुर्वेद दवाई का परिचय देते हैं और पुराणो में इसकी महत्ता के बारें में ब्यौरा देते है । जैस ही काला का परिचय होता है, चीजें बिगड़ने लगती है । इस फ़िल्म को एक कॉमेडी फ़िल्म माना जा रहा था लेकिन पूरी फ़िल्म में शायद ही ऐसे कोई सीन थे जिन्हें देखकर हंसी आई हो । वैद्य पूरन सिंह की वैद्यशाला से आयुर्वेदिक दवा बनाने का फार्मूला चुराने का सीन पूरी तरह से पूर्वानुमेय था । काला-चीकू की लव स्टोरी कोई खास नहीं है । सेकेंड हाफ़ में लगता है कि चीजें संभल जाएंगी जब फ़िल्म सूरत शिफ़्ट हो जाती है । लेकिन अफ़सोस, यहां भी बमुश्किल ऐसे सीन होते हैं जहां दर्शकों को मजा आए ।
इस तरह की अप्रभावशाली फ़िल्म में भी सनी देओल छा जाते है । वह वाकई अपना बेस्ट शॉट देते है और पूरी फ़िल्म में वह एकमात्र ऐसे किरदार हैं जो दर्शकों के दिल के तारों को छू लेते हैं । उदाहरण के तौर पर उनका एक सीन जिसमें वह एयरपोर्ट पर होते हैं काफ़ी दिल को छू लेने वाला है लेकिन साथ ही खराब लेखन से प्रभावित होता है । क्लाइमेक्स में, उनके साथ अनुचित व्हवहार होता है । उनके एक्शन सीन को ज्यादा फ़ुटेज मिलना चाहिए था बजाए कोर्टरूम सीन को खींचने के । बॉबी देओल सख्ती से ठीक है और कई सीन में ओवर चले जाते है । हैरानी की बात ये है कि धर्मेंद्र की काफ़ी देर से एंट्री होती है और फ़र्स्ट हाफ़ मेम उनके लिए करने के लिए बहुत कम होता है । यह वाकई काबिलेतारीफ़ है कि वह इस उम्र में भी एक्टिंग कर रहे हैं । वह अच्छा करने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट की वजह से मात खा जाते है । कृति खरबंदा काफ़ी खूबसूरत दिखाई देती हैं और शानदार परफ़ोरमेंस देती है । वह लगातार स्क्रिप्ट से ऊपर उठने और दृश्य को बेहतर बनाने की कोशिश करती है । शत्रुघ्न सिन्हा (न्यायाधीश सुनील सिन्हा) एक अच्छी तरह से गूंथा गया किरदार था और यह फिल्म को दूसरे स्तर पर ले जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं होता है । वह काफी पुराने दिखते हैं लेकिन फिर भी मनोरंजन करते हैं । मोहन कपूर खलनायक के रूप में ठीक है जबकि राजेश शर्मा (वकील भाटिया) कोर्टरूम ड्रामा सीन में अमिट छाप छोड़ते है । असरानी (नानू) निराश करते हैं । सतीश कौशिक (बेदी) बर्बाद हो जाते हैं । वास्तव में, उन्हें क्लाइमेक्स में जबरदस्ती जोड़ा गया । अंत में सलमान खान का कैमियो दिखाई देता है लेकिन वह भी रूचिहीन लगते हैं ।
फ़िल्म का म्यूजिक निराश करता है । 'लिटिल लिटिल' और 'नजरबट्टू' को कोई याद नहीं रखता है । 'रफ़्ता रफ़्ता मेडली' को अंत के क्रेडिट में दिखाया जाता है । राजू सिंह का बैकगाउंड स्कोर काफ़ी लाउड और शीर्ष पर है ।
जीतन हरमीत सिंह का छायांकन कुछ खास नहीं है । रीता घोष का प्रोडक्शन डिजाइन नाटकीय है । विक्रम दहिया के एक्शन काफी अच्छे हैं । मनीष मोर का संपादन ठीक है ।
कुल मिलाकर, यमला पगला दीवाना फ़िर से को एक कॉमेडी फ़िल्म के रूप में दर्शाया गया था लेकिन बड़े दुख की बात ये है कि इसमें बमुश्किल ऐसे सीन है जिन्हें देखकर हंसी आ जाए । ये फ़िल्म निराश करती है ।
















