साल 1947 में जब भारत आजाद हुआ था, तब उन लोगों के लिए एक चुनौती थी जिन्होंने आजाद भारत की सत्ता संभाली थी । क्योंकि उन्हें अपने देश को एक नए सिरे से शुरू करना जो था । और ये चुनौतियां आज तक जारी हैं लेकिन यह देखकर खुशी हो रही है कि तमाम बाधाओं के बावजूद, भारत ने कई क्षेत्रों में बड़ी प्रगति हासिल कर ली है । और भारत की तमाम उपलब्धियों में से एक है, कि भारत अब एक एक पूर्णतया परमाणु देश बन गया है और ये हुआ साल 1998 में राजस्थान में की गई परमाणु परीक्षणों की एक श्रृंखला के साथ जिसके बाद भारत एक परमाणु देश बन गया है । असल जिंदगी की घटनाओं पर फ़िल्म बनाने के इस दौर में हैरानी की बात है कि किसी ने भी इन परमाणु परिक्षणों पर कोई फ़िल्म नहीं बनाई । लेकिन एक्टर और प्रोड्यूसर जॉन अब्राहम ने इस चुनौती को लिया और पोखरण में हुए परमाणु परिक्षणों पर एक फ़िल्म बनाई, परमाणु - द स्टोरी ऑफ़ पोखरण, जो इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । तो क्या यह फ़िल्म दर्शकों को अपनी अद्भुत घटनाक्रम से रोमांचित करेगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।

परमाणु- द स्टोरी ऑफ़ पोखरण उन लोगों की कहानी है जिन्होंने 11 मई, 1998 को पोखरण में गुप्त रूप से परमाणु बम परीक्षण विस्फोट की एक श्रृंखला आयोजित की थी । अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) केंद्र सरकार के शोध विभाग से हैं और 1995 में, वह प्रधान मंत्री कार्यालय को इस क्षेत्र में सर्वोच्चता प्राप्त करने और दुनिया की परमाणु शक्तियों के बीच भय स्थापित करने के लिए परमाणु बम परीक्षण करने की सलाह देता है । उसकी सलाह मान ली जाती है लेकिन उसे इसका हिस्सा नहीं बनाया जाता है । उसकी योजना पर सही तरह से काम नहीं किया जाता है । नतीजतन, संयुक्त राज्य अमेरिका की सेटेलाइट भारत को ऐसे टेस्ट करते हुए रंगे हाथों पकड़ लेती है । भारत को शर्मींदगी का सामना करना पड़ता है और अश्वत को बली का बकरा बना दिया जाता है । उसे नौकरी से हटा दिया जाता है और वह अपनी पत्नी सुषमा(अनुजा साठे) और बेटे प्रहलाद के साथ मसूरी शिफ़्ट हो जाता है । अगले 3 सालों तक अश्वत अजीब नौकरियां करता है उस दौरान अनुजा एक वेधशाला में काम करके घर चलाती है । साल 1998 में, भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं अटल बिहारी वाजपेयी । और इसके बाद प्रधानमंत्री के प्रिंसीपल सेक्रेटरी हिमांशु शर्मा (बोमन ईरानी) अश्वत को बुलाते हैं और उससे परमाणु परीक्षणों में मदद करने के लिए कहते हैं । अश्वत संयुक्त राज्य अमेरिका को भनक लगे बिना, इन परमाणु परीक्षणों को तैयार करने और संचालन करने की योजना तैयार करता है और खुद इसका संचालन करता है । वह इसके लिए अपनी एक टीम तैयार करता है जिसमें शामिल होती हैं अंबालिका उर्फ नकुल (डायना पेंटी), डॉ. विराफ वडिआ (आदित्य हितकारी), डॉ. नरेश सिन्हा (योगेन्द्र टिकू), मेजर प्रेम सिंह (विकास कुमार) और पुरुनगनाथं । ये सभी मिलकर अपने मिशन को कैसे पूरा करते है और विश्व परमाणु मानचित्र पर भारत को कैसे ला पाते हैं, यह सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
साइविन क्वेडरस, संयुक्ता चावला शेख और अभिषेक शर्मा की कहानी काफ़ी प्रोमिसिंग है और काफ़ी अनूठी है क्योंकि इसमें पर्याप्त मात्रा में राष्ट्रवाद रूपी मनोरंजन और अनुभव है । साइविन क्वेडरस, संयुक्ता चावला शेख और अभिषेक शर्मा की पटकथा काफ़ी साधारण और स्वच्छ है और साथ ही उन्होंने इस बात का ख्याल रखा है कि फ़िल्म में कहीं भी तकनीकि भाषा का इस्तेमाल न हो जिससे दर्शक समझ न पाए । नतीजतन, यह फ़िल्म ऐसी है, कि आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है कि क्या हो रहा है ।
परमाणु - द स्टोरी ऑफ़ पोखरण की शुरूआत काफ़ी कमजोर रूप से होती है । फ़िल्म में दिखाए गए 1995 के सीन में दर्शकों को सही तरीके से शामिल नहीं किया जाता है । दर्शक फ़िल्म से तब जुड़ते हैं जब अश्वत, हिमांशु से मिलता है । यहां से, फ़िल्म एक अलग स्तर पर चली जाती है और अश्वत्थ का अपनी टीम को इकट्ठा करना और संयुक्त राज्य अमरीका को बेवकूफ देखना मजेदार लगता है । फ़िल्म का इंटरवल एक महत्वपूर्ण मोड़ पर होता है । फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ बेहतर है क्योंकि पाकिस्तानी जासूस (दर्शन पांड्य) और सीआईए एजेंट डैनियल (मार्क बेनिंगटन) टीम, अश्वत के मिशन को असफल करने की पूरी कोशिश करते हैं । और यहीं अचानक फ़िल्म में हास्य का तड़का लगाया जाता है और यह काफ़ी अच्छे से काम करता है, और यह विशेष रूप से अश्वत और सुषमा के बीच टकराव के दृश्य में बहुत अच्छी तरह से काम करता है । लेकिन सबसे बेहतरीन सीन फ़िल्म के क्लाइमेक्स के लिए बचाकर रखा जाता है । यह बहुत अच्छी तरह से मैनेज किया जाता है और देशभक्ति का उत्साह खूबसूरती से सामने आता है ।
साइविन क्वेडरस, संयुक्ता चावला शेख और अभिषेक शर्मा के डायलॉग इतने प्रभावपूर्ण नहीं है लेकिन वास्तविक और संवादात्मक लगते है । अभिषेक शर्मा का निर्देशन बहुत अच्छी तरह से फ़्लो होता है और एकदम सटीक लगता है । 130 मिनट में वह पूरी फ़िल्म को कह जाते है । हालांकि यहां कुछ लोगों को लगता है कि, काश फ़िल्म में तनावपूर्ण पल थोड़े और होते है । इस तरह की फ़िल्म में ऐसे और कई सीन होने चाहिए थे जिससे दर्शक अपनी सीट से चिपकने को मजबूर हो जाएं जिससे फ़िल्म का मजा दोगुना हो जाता । इसके अलावा, हालांकि टीम को रोडब्लॉक का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन कुछ जगहों पर यह उचित लगता है । शुक्र है, फिल्म में पर्याप्त संभावनाएं हैं जो इन ग्लिच को सशक्त बनाती हैं ।

जॉन अब्राहम इस फ़िल्म में अपने फ़िल्मी करियर का अब तक बेहतरीन प्रदर्शन देते है । उनका अभिनय बहुत आकर्षक है और एक अमिट छाप छोड़ता है । फ़िल्म में उनके किरदार को काफ़ी पीड़ाग्रस्त बताया गया है और वह इसे बखूबी दर्शाते है । इसके अलावा वह एक अजेय हत्या मशीन के रूप में नहीं दिखाए गए है, जो उनकी एक छवि है । वह अपने किरदार में बहुत जंचते है । डायना पेंटी का फ़िल्म में काफ़ी अहम रोल है और वह बिना किसी गलती के अपने किरदार को बखूबी निभाती है । बोमन ईरानी एक अविश्वसनीय प्रदर्शन देते है और इतने समय बाद उन्हें स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है । आर्मी मेजर के रूप में विकास कुमार विश्वसनीय लगते है । योगेंद्र टिकु फ़िल्म में हास्य का तड़का लगाते है और आदित्य हितकारी स्मार्ट दिखते है और प्रभावपूर्ण परफ़ोरमेंस देते है । दर्शन पांड्या एक अमिट छाप छोड़ते है । अनुजा साठे बहुत अच्छी है और अपने सपोर्टिंग रोल में एक जादू सा चला जाती है । मार्क बेनिंगटन और जॅचरी कॉफिन (स्टीफन) ठीक हैं ।
सचिन-जिगार का संगीत को इतना ज्यादा स्कोप नहीं मिलता है और सभी गाने बैकग्राउंड में बजाए जाते है । 'थारे वास्ते' एकमात्र ऐसा गीत है जो दिल जीत लेता है, वो भी अपने निष्पादन के कारण । संदीप चौटा का पृष्ठभूमि स्कोर नाटकीय और प्रभावशाली है लेकिन इसमें एक प्रमुख हंस ज़िमर हैंगओवर है जो टाला जा सकता था । जुबिन मिस्त्री का छायांकन काफी अच्छा है और राजस्थान के बंजर इलाकों को अच्छी तरह से कैप्चर किया है । रामेश्वर एस भगत का संपादन चतुराईपूर्ण है । टी पी अबीद और संदीप एस रावडे का प्रोडक्शन डिजाइन बहुत प्रामाणिक और यथार्थवादी है । अमर शेट्टी के एक्शन रक्तरंजित नहीं है ।
कुल मिलाकर, परमाणु- द स्टोरी ऑफ पोखरण एक बेहतरीन फ़िल्म है जो चर्चा में कम रहने के बावजूद भी बॉक्सऑफ़िस पर बेहतरीन प्रदर्शन करने का दम रखती है । देशभक्ति उत्साह और साधारण, प्रभावी नेरेशन, फ़िल्म के पक्ष में काम करता है । यकीनन इस फ़िल्म को देखने जरूर जाइए !
















