फ़िल्म :- हक
कलाकार :- यामी गौतम, इमरान हाशमी
निर्देशक :- सुपर्ण एस वर्मा
रेटिंग :- 3.5/5

शॉर्ट में हक का प्लॉट :-
फिल्म हक़ (HAQ) की कहानी है एक महिला शाज़िया बानो (यामी गौतम) की, जो 1967 में उत्तर प्रदेश के संखनी कस्बे में रहती है। शाज़िया को नामी वकील अब्बास खान (इमरान हाशमी) से प्यार हो जाता है, और दोनों की शादी हो जाती है। सब कुछ ठीक चलता है, जब तक कि उनके बीच मतभेद पैदा नहीं हो जाते। एक दिन अब्बास किसी संपत्ति से जुड़े काम के लिए बाहर जाते हैं और तीन हफ्ते में लौटने का वादा करते हैं, लेकिन तीन महीने बाद लौटते हैं वह भी अकेले नहीं, बल्कि अपनी दूसरी पत्नी सायरा (वार्तिका सिंह) के साथ। शाज़िया हैरान रह जाती है। अब्बास सफाई देता है कि सायरा विधवा है और उसने मानवीय आधार पर उससे शादी की है। वह शाज़िया को यह भी भरोसा दिलाता है कि सायरा गर्भावस्था और बच्चों की देखभाल में मदद करेगी। लेकिन जल्द ही सायरा शाज़िया को सच बता देती है कि अब्बास उससे तब भी प्यार करता था जब उसने शाज़िया से मुलाकात तक नहीं की थी। टूट चुकी शाज़िया अब्बास के साथ रहना जारी रखती है, मगर हालात तब बिगड़ते हैं जब अब्बास अपनी शादी की सालगिरह पर भी उसके साथ समय नहीं बिताता। आहत शाज़िया अपने मायके लौट जाती है। यहीं से उनके रिश्ते में दरार गहराती जाती है और अंततः शाज़िया अलीगढ़ सेशंस कोर्ट का रुख करती है। आगे की कहानी अदालत के भीतर और बाहर उसकी संघर्ष गाथा को दिखाती है।
हक मूवी स्टोरी रिव्यू:
फिल्म हक़ लेखिका जिग्ना वोरा की किताब ‘बानो: भारत की बेटी’ पर आधारित है। रेशु नाथ की कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और आज के दौर में भी बेहद प्रासंगिक लगती है। पटकथा दिलचस्प है, हालांकि कुछ जगहों पर गति थोड़ी धीमी पड़ती है। संवाद फिल्म की यूएसपी हैं कई डायलॉग ऐसे हैं जो थिएटर में तालियां बटोरेंगे।
निर्देशक सुपर्ण एस वर्मा ने कहानी को सादगी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। उन्होंने लीगल जार्गन (कानूनी शब्दावली) में उलझे बिना एक भावनात्मक यात्रा को उभारा है। शाज़िया बानो का किरदार बेहद प्रभावशाली ढंग से लिखा गया है, जिससे दर्शक शुरुआत से अंत तक उसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं।
हक़ का फर्स्ट हाफ दर्शकों को शिकायत का कोई मौका नहीं देता। शाज़िया और सायरा के बीच जो तनाव पनपता है, उसे बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है। वह सीन जहां सायरा शाज़िया को सच्चाई बताती है, यादगार बन जाता है। इसी तरह, जब शाज़िया अब्बास को उसके कर्मों के लिए फटकार लगाती है, वह भी एक शक्तिशाली पल साबित होता है। इंटरवल के बाद कोर्टरूम ड्रामा और अंतिम संस्कार वाला सीक्वेंस खास तौर पर उभरकर सामने आते हैं। फिल्म का अंतिम सीन इसकी सबसे बड़ी खासियत है।
वहीं कमियों की बात करें तो, सेकेंड हाफ में कुछ ऐसे पल आते हैं जब कहानी की पकड़ थोड़ी ढीली पड़ती है। फिल्म इस हिस्से में एपिसोडिक लगने लगती है। दर्शक शाज़िया के संघर्ष और समाज द्वारा किए गए उसके बहिष्कार की पीड़ा को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाते। साथ ही, यह भी महसूस होता है कि अगर फिल्म में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे मुकदमे के हिस्से को थोड़ा और विस्तार से दिखाया जाता, तो असर और गहरा होता।
परफॉरमेंस :-
आर्टिकल 370 (2024) और धूम धाम (2025) के बाद यामी गौतम ने एक बार फिर शानदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया है। दरअसल, यह अब तक का उनका सबसे बेहतरीन प्रदर्शन कहा जा सकता है। उन्होंने जिस तरह शाज़िया बानो के किरदार में खुद को पूरी तरह ढाल लिया है, वह देखने लायक है। इमरान हाशमी भी अपने किरदार में पूरी मजबूती के साथ उतरते हैं। भले ही वह फिल्म में निगेटिव लीड हैं, लेकिन उन्होंने इसे पारंपरिक खलनायक की तरह नहीं निभाया। यही बात उनके अभिनय को कई गुना प्रभावशाली बना देती है। वार्तिका सिंह एक बेहतरीन खोज साबित हुई हैं और उन्होंने अपने हिस्से का काम ईमानदारी से किया है। दानिश हुसैन (शाज़िया के पिता), शीबा चड्ढा (बेला जैन) और असीम हट्टंगडी (फ़राज़ अंसारी) जैसे कलाकारों ने अपने किरदारों में गहराई छोड़ी है। बाकी कलाकारों का प्रदर्शन भी संतुलित और प्रभावशाली है।
संगीत और तकनीकी पहलू:
विशाल मिश्रा का संगीत अपेक्षाकृत फीका रहा। हालांकि टाइटल ट्रैक में एक जोशीला एहसास है, लेकिन बाकी गाने जैसे ‘क़बूल’ और ‘दिल तोड़ गया तू’ — लंबे समय तक याद नहीं रहते। संदीप चौटा का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड के अनुरूप है और प्रभावशाली माहौल बनाता है।
प्रथम मेहता की सिनेमैटोग्राफी संतोषजनक है। सोनम सिंह और अभिजीत गोंकार का प्रोडक्शन डिज़ाइन तथा एशले रिबेलो की कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग कहानी की पृष्ठभूमि से मेल खाती है और यथार्थवादी अहसास देती है । हालांकि, व्हाइट एप्पल स्टूडियोज़ का VFX कमजोर साबित होता है, खासकर सुप्रीम कोर्ट के बाहरी दृश्य में। साउंड मिक्सिंग कुछ हिस्सों में असमान लगती है, जबकि निनाद खानोलकर की एडिटिंग तेज़ और सटीक है।
क्यों देंखे हक ?
कुल मिलाकर, हक़ एक प्रभावशाली और दमदार ड्रामा के रूप में उभरती है, जो अपने शक्तिशाली प्रदर्शन, भावनात्मक पलों और कसे हुए क्लाइमेक्स के ज़रिए गहरी छाप छोड़ती है। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की शुरुआत भले ही साधारण स्तर पर हो, लेकिन पॉजिटिव वर्ड ऑफ माउथ के चलते इसमें धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने और दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक असर छोड़ने की पूरी क्षमता है।
















