भारत में लिव-इन के विचार को लोकप्रिय बनाने का श्रेय 2005 में आई फिल्म सलाम नमस्ते को जाता है । फिल्म को रिलीज हुए लगभग 14 साल हो चुके हैं और अब हालांकि लिव-इन एक स्वीकार्य रिलेशनशिप हो गई है और बॉलीवुड में भी इस विषय पर कई फ़िल्में बनाई जा चुकी है । लेकिन ये अभी भी कई जगहों पर एक वर्जित विषय है और लोग इसे सही नहीं मानते है । सिनेमेटोग्राफ़र से निर्देशक बने लक्ष्मन उतेकर इस हफ़्ते इसी विषय पर फ़िल्म लाए है लुका छुपी, जो लिव-इन जैसे वर्जित विषय को बड़े ही मजेदार ढंग से उठाती है । तो क्या लुका छुपी दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब हो पाती है, या यह अपने प्रयास में विफल रहती है ? आइए समीक्षा करते है ।

लुका छुपी अपने परिवार के साथ रहने वाले एक जोड़े की कहानी है । सुपरस्टार नाज़िम खान (अभिनव शुक्ला) एक विवाद में पड़ जाता है जब यह पता चलता है कि वह अपनी प्रेमिका के साथ लिव-इन में रह रहा है और इसका उसे कोई मलाल नहीं है । उसके इस 'अशोभनीय' कृत्य के विरोध में मोरल पुलिस पूरी ताकत से सामने आती है । ऐसा ही एक संगठन है राष्ट्रीय संस्कृत मंच और मथुरा में, इसका नेतृत्व विष्णु त्रिवेदी (विनय पाठक) करते हैं । उसकी बेटी रश्मि (कृति सैनॉन) है और वह दिल्ली में अपनी मीडिया की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक स्थानीय समाचार चैनल से जुड़ जाती है । यहाँ वह गुड्डू (कार्तिक आर्यन) से टकराती है और दोनों प्यार में पड़ जाते हैं । अपने बड़े अविवाहित भाई विकास (हिमांशु कोहली) और बहनोई बाबूलाल (पंकज त्रिपाठी) के साथ लड़ाई के बाद, वह जल्द से जल्द शादी के बंधन में बंधने का फ़ैसला करता है । वह रश्मि को शादी के लिए प्रपोज करता है । वह इतनी जल्दी शादी करने से इंकार कर देती है ले्किन वह लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए उसे जोर देती है । निंसंदेह गुड्डू नाराज हो जाता है । हालाँकि, उनके सहयोगी अब्बास (अपारशक्ति खुराना) द्वारा दिए गए एक विचार से प्रेरित होकर, वे ग्वालियर में, जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता, 20 दिन के असाइनमेंट पर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला करते हैं । यहां वह बिना किसी डर के रह सकते थे । लेकिन किराए पर फ्लैट पाने के लिए, वे एक विवाहित जोड़े होने का दिखावा करते हैं । रश्मि को भी मंगलसूत्र पहनकर रखना है और सिंदूर लगाना है । सब कुछ ठीक चल रहा होता है लेकिन जैसे ही बाबूलाल उन्हें पब्लिक प्लेस में कॉजी होते हुए देख लेता है । लेकिन उसे लगता है कि वे शादी शुदा है । वह अपने परिवार को इस बारें में बताता है और उनका परिवार ग्वालियर आत है । इसके बाद आगे क्या होता है यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
रोहन शंकर की कहानी अनूठी और मनोरंजक है और यह इस शैली की अन्य फिल्मों से अलग है । किरदारों से अभिनय अच्छी तरह से निचोड़ा गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात, वे भरोसेमंद हैं । रोहन शंकर की पटकथा अधिकांश भागों के लिए प्रभावी है और सही हास्य को उद्घाटित करती है । हालांकि कुछ स्थानों पर, यह थोड़ा कमजोर है, खासकर फ़र्स्ट हाफ़ में । किरदारों के बीच तालमेल बनाने और पृष्ठभूमि सेट करने के प्रयास में लगता है लेखक ने जल्दबाजी की है । वहीं कुछ सीन अद्भुत रूप से शानदार है जिन्हें यकीनन पसंद किया जाएगा । रोहन शंकर के डायलॉग मजेदार हैं । शुक्र है कि डबल मिनिग वाले वाले कोई डायलॉग नहीं है ।
लक्ष्मण उतेकर का निर्देशन अच्छा है लेकिन और बेहतर हो सकता था । फ़र्स्ट हाफ़ में फ़िल्म की कहानी थोड़ी बिखरी हुई लगती है और निर्देशन भी उसे बचा नहीं पाता है । लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है और बेहतर होती जाती है । फ़िल्म का सबसे अच्छा हिस्सा वो है जिसमें इसे वर्जित विषय को लेकर बात की जाती है । अतीत में भी लिव-इन विषय पर फ़िल्में बनी है जिसमें थी ओके जानू [2017] लेकिन ये चुनिंदा दर्शकों के लिए ही थी क्योंकि देश का अधिकांश हिस्सा इससे संबंधित नहीं था । लक्ष्मण ने इस प्लॉट को काफ़ी अच्छी तरह से संभाला है और फ़िल्म का मैसेज खुलकर सामने आता है । ह्यूमर और सही नि्र्देशन की वजह से नतीजतन फ़िल्म ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित करती है ।
नज़ीम खान विवाद दिखाते हुए लुका छुपी की शुरूआत काफ़ी आश्चर्यजनक नोट पर होती है । यहां यह साफ़ हो जाता है कि कॉमेडी के अलावा यह फ़िल्म सामाजिक टिप्पणी भी करने जा रही है । हालांकि दर्शक इसके ट्रेलर को देख कर उम्मीद करेंगे कि उन्हें फ़िल्म में रोमांस और कुछ फ़नी सीन देखने को मिलेंगे । जैसे ही दर्शक किरदारों से परिचित होते है उनकी उम्मीद खरी उतरने लगती है । वहीं फ़िल्म अपने एलीमेंट में आने में थोड़ा समय लगाती है । प्यार में पड़ना एकदम से हो जाता है । जिस तरह से विकास और बाबूलाल के साथ गुड्डू के बीच समीकरण स्थापित हुआ है, वह जबरदस्ती का डाला हुआ लगता है । असल में एक ड्रीम सीक्वंस जिसमें गुड्डू को लगता है कि उसका भतीजा चीकू शादी कर रहा है वह काम नहीं करता है । वह सीन जहां ग्वालियर के पड़ोसी हंगामा मचाते है, फ़िल्म अलग स्तर पर चली जाती है । यह खास सीन काफ़ी मजेदार है, और इसे तालियों के साथ पसंद किया जाएगा । मध्यांतर बिंदु, जब गुड्डू-रश्मि की 'लुका छुपी' उजागर हो जाती है (हालांकि पूरी तरह से नहीं) भी काफी मनोरंजक है । इंटरवल के बाद, फिल्म और भी अच्छी हो जाती है, जब गुड्डू और रश्मि शादीशुदा होने का नाटक करते हैं । मंदिर वाला सीन काफ़ी प्रभावपूर्ण है, खासकर यह फिल्म में एक नया मोड़ लेकर आती है । गुड्डू-रश्मि का अपने घर में शादी करने का प्रयास करना, काफ़ी टची है, और हां ठहाको से भरा है । फ़िल्म का बेस्ट सीन यकीनन फ़ाइनल के लिए रिजर्व रहता है । लुका छुपी का अंत एक अच्छे नोट पर होता है ।
कार्तिक आर्यन एक बार फिर शानदार फॉर्म में हैं । उनका लड़के वाला लुक यकीनन काम करता है लेकिन यहां उनकी परफ़ोरमेंस, उन्हें और भी प्यारा बनाती है । कृति और अपारशक्ति के साथ एक बेडरूम सीन में, वह 'मोनोलॉग' यानी आत्मभाषण जोन में चले जाते है, लेकिन जल्दी से खुद को कंपोज करते है । उनकी खामोशी, मृत भाव, खासकर उन सीन में जहां उनके परिवार के सदस्य उन्हें नाम से बुलाते है, काफ़ी मजेदार है । कृति सैनॉन की शानदार स्क्रीन उपस्थिति है और वह अपने मजबूत अभिनय से छा जाती है । वह सेकेंड हाफ़ के एक महत्वपूर्ण इमोशनल सीन में सरप्राइजिंगली बाजी मार ले जाती है । अपारशक्ति खुराना विश्वसनीय है । उनके किरदार के प्रति लोगों का पूर्वाग्रह काफ़ी छूने वाला है । पंकज त्रिपाठी का हास्य शुरूआत में जबरदस्ती का लगता है लेकिन बाद में वह ही हैं जो फ़िल्म में सबसे ज्यादा हंसी लेकर आते है । विनय पाठक एक रहस्योद्घाटन है । अब तक, वह मजाकिया और हल्की भूमिकाओं से जुड़े रहे हैं । लेकिन इस फ़िल्म में, वह एक खूंखार राजनेता की भूमिका निभा रहे हैं जिसमें वह छा जाते है । हिमांशु कोहली फिल्म के लिए सरप्राइज हैं और उनका किरदार फिल्म में हास्य को जोड़ने में बहुत मदद करता है, खासकर इंटरवल के बाद । विश्वनाथ चटर्जी (गुड्डू के भाई वरुण) और नेहा सराफ (गुड्डू की भाभी जानकी) को भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मौका मिलता है । चीकू (मास्टर समर्थ) प्यारे लगते है । सपना सांड (श्रीमती श्रीवास्तव) ग्वालियर में पड़ोसी के रूप में अच्छी लगती है । अजीत सिंह (श्रीकांत) विष्णु त्रिवेदी के संगी के रूप में खिजाते है लेकिन उनके किरदार के लिए सही है क्योंकि उनके किरदार में एक नेग़ेटिव रोल है । अतुल श्रीवास्तव (गुड्डू के पिता बद्रीप्रसाद) और अलका अमीन (गुड्डू की मां शकुंतला) अच्छी हैं । अभिनव शुक्ला ठीक हैं और आदर्शत; निर्माताओं को उनके स्थान पर एक सुपरस्टार को लेना चाहिए था ।
फिल्म में केवल वही गाने अच्छे हैं जो रिक्रिएट किए गए है । फिल्म का सबसे बड़ा गीत 'पोस्टर लागवा दो' फिल्म से गायब है और इसे अंत क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है । इससे उसके प्रशंसक निराश हो सकते हैं । 'कोका कोला' भी अंत क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है । 'फ़ोटो' और 'दुनिया' अच्छे है जबकि, 'तू लौंग मैं इलाची' मधुर है । केतन सोढ़ा के बैकग्राउंड स्कोर में एक मजेदार टच है जो फ़िल्म की गति को हल्का-फुल्का बनाती है ।
मिलिंद जोग की सिनेमैटोग्राफर औसत है । मानिनी मिश्रा का प्रोडक्शन डिजाइन संतोषजनक है । सुकृति ग्रोवर, मल्लिका चौहान और जिया भागिया की वेशभूषा आकर्षक लग रही है, विशेष रूप से कृति सैनॉन द्वारा पहनी गई ड्रेस । मनीष प्रधान का संपादन उचित है । फिल्म सिर्फ 126 मिनट की है और तेजी से आगे बढ़ती है ।
कुल मिलाकर, लुका छुपी स्थितिजन्य और मजाकिया क्षणों के गुत्थियों से भरे आधुनिक रिश्तों पर एक मज़ेदार टिप्पणी है । इस साफ़-सुथरी कॉमेडी फ़िल्म को न केवल युवाओं से बल्कि फ़ैमिली दर्शकों से भी अच्छा रेस्पॉंस मिलेगा । इसे जरूर देखिए ।
















