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सस्पेंस शैली, एक ऐसी शैली है जहां बॉलीवुड पिछड़ गया है, जबकि पश्चिमी फिल्म उद्योग ने इस मामले में काबिलेतारिफ़ प्रगति की है । जब हिंदी सिनेमा की बात आती है, तो बहुत कम ऐसी फिल्में बनती हैं, जिनमें से केवल कुछ ही यादगार होती हैं । इस श्रेणी में सुजॉय घोष द्दारा निर्देशित फ़िल्म कहानी [2012] सबसे श्रेष्ठ है । नतीजतन सुजॉय घोष से उम्मीदें और ज्यादा बढ़ जाती है जब उनकी निर्देशित फ़िल्म बदला, जो इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । इसके अलावा इस फ़िल्म के लीड कलाकार अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू, जिसने पिंक [2016] में असाधारण परफ़ोरमेंस दिया, के कारण बादल से उम्मीदें और बढ़ जाती है । इतना ही नहीं बदला एक स्पेनिश सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म, THE INVISIBLE GUEST का हिंदी रीमेक है । तो क्या बदला दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल होती है, आइए समीक्षा करते है ।

फ़िल्म समीक्षा : स्मार्ट सस्पेंस ड्रामा है बदला

बदला एक हत्या के आरोपी की कहानी है जो अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश कर रही है । नैना सेठी (तापसी पन्नू) लंदन में एक सफल व्यवसायी हैं और एक शादीशुदा महिला है जिसकी एक बेटी भी है । उसकी जिंदगी तब एक मोड़ लेती है जब उस पर उसके प्रेमी अर्जुन जोसेफ (टोनी ल्यूक) की हत्या का आरोप लगता है । इस आरोप के बाद उसका जीवन पूरा बदल जाता है । सभी सबूत नैना के खिलाफ हैं क्योंकि वह उस वक्त होटल के कमरे में अकेली थी जहाँ अर्जुन मारा गया था । लेकिन नैना दावा करती है उस वक्त होटल के कमरे में उसके अलावा कोई तीसरा व्यक्ति भी शामिल था जिसने इस हत्या को अंजाम दिया और यहां तक कि उसके माथे पर भी चोट पहुंचाई । लेकिन प्रारंभिक जांच में पता चला कि कमरा अंदर से बंद था । कमरे के बाहर गवाहों ने पुष्टि की कि कोई भी कमरे से बाहर नहीं आया । नैना के वकील जिमी पंजाबी (मानव कौल) को पता चलता है कि यह एक मुश्किल स्थिति है । इसलिए वह एक्सपर्ट डिफ़ेंस वकील बादल गुप्ता (अमिताभ बच्चन) को यह सुनिश्चित करने के लिए काम पर रखता है कि नैना को जेल नहीं जाना पड़े । बादल नैना के घर पर पहुँचता है और वह अपनी जाँच शुरू करता है । नैना से बात करते हुए वह उससे कहता है कि वह उसे सिर्फ़ सच बताए और इस दौरान कई सच सामने आते है । वह बताती है कि अर्जुन की हत्या का ताल्लुक एक छोटा से शहर से ताल्लुक रखने वाले सनी कौर से है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

ओरोल पॉलो की कहानी (THE INVISIBLE GUEST की मूल लेखिका) काफी प्रभावशाली है और अन्य मर्डर मिस्ट्री के विपरीत है । सुजॉय घोष की रूपांतरित पटकथा मूल फिल्म और उसके कथानक के साथ न्याय करने की पूरी कोशिश करती है । बहुत सारे दृश्य अच्छे से लिखे गए हैं । हालाँकि फिल्म बीच में जटिल है । एक आम आदमी के लिए, यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि क्या हो रहा है । इसके अलावा, कथा की शैली दर्शकों पर थोड़ी भारी पड़ सकती है । सुजॉय घोष और राज वसंत के डायलॉग तीखे और मजाकिया हैं । हालांकि कुछ डायलॉग अनावश्यक रूप से कहानी को खींचते हैं ।

सुजॉय घोष का निर्देशन अनुकरणीय है और द इनविजिबल गेस्ट के सार को जीवित रखने की कोशिश करते है । लेकिन यहां कुछ कमिया रह जाती है, जो कि द इनविजिबल गेस्ट में भी थी । लेकिन फ़िर भी उनका निर्देशन ऐसा कि कोई भी उन कमियों पर ध्यान नहीं देगा । वहीं दूसरी ओर, बदला और थोड़ी हो सकती थी । द इनविजिबल गेस्ट महज 106, मिनट लंबी थी और बदला उससे 14, मिनट लंबी है । इस फ्रेम-बाय-फ्रेम रीमेक में ये अतिरिक्त मिनट कुछ संवादों के कारण हैं जिनकी आवश्यकता नहीं थी । इसके अलावा, घोष फ़र्स्ट हाफ में एक महत्वपूर्ण संवाद जोड़ते है जो फिल्म के क्लाइमेक्स का एक संकेत है और उन्होंने ऐसा किया तो यह आश्चर्यजनक है । कहानी के विपरीत, यह फिल्म थोड़ी अलग दर्जे की है और यह इसकी संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है ।

बदला के ओपनिंग क्रेडिट काफ़ी दिलचस्प और चतुराईपूर्ण है । फ़िल्म का शुरूआती हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ सा लगता है । सच को साबित करने में बादल का बहुत समय बर्बाद हो जाता है । लेकिन जब वह बात करना शुरू करती है तब दिलचस्पी बढ़ने लगती है । हालांकि फ़र्स्ट हाफ का सबसे अच्छा हिस्सा अर्जुन की रानी (अमृता सिंह) और निर्मल से मीटिंग के दौरान आता है । इंटरवल प्वाइंट काफ़ी दिलचस्प है क्योंकि वह फ़िल्म के मूड को अच्छे से सेट कर देता है । इंटरवल के बाद, फ़िल्म बांधना शुरू करती है लेकिन वहीं कुछ हिस्सों में फ़िल्म बिखरने लगती है । लेकिन केवल अंत के 20, मिनट में चीजें बदल जाती है और फ़िल्म केलिए आकर्षण बढ़ जाता है । क्लाइमेक्स निश्चित रूप से अचानक एक ऐसे रूप में आता है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है । लेकिन इसे और बेहतर तरीके से और अधिक मुख्यधारा के प्रभाव के लिए अच्छी तरह से निष्पादित किया जाना चाहिए था ।

हमेशा की तरह अमिताभ बच्चन बेहद ही शानदार परफ़ोरमेंस देते है । उनका एक सीन बंद कमरे में तापसी के साथ है । लेकिन वह इसे बखूबी निभाते हैं और नाटकीय ढंग से यह फ़िल्म में फ़न को जोड़ता है । तापसी पन्नू असाधारण है और जिस तरह से वह अपने किरदार के विभिन्न रंगों को सामने लाती है, वह प्रशंसनीय है । पूरी फ़िल्म के दौरान यह समझना मुश्किल हो जाता है कि, क्या वह पीड़ित हैं या नहीं, और ऐसा उनके असाधारण परफ़ोरमेंस के कारण लगता है । अमृता सिंह नेचुरल लगती हैं और फिल्म में उनका महत्वपूर्ण रोल है । वह एक बार फिर से साबित करती है कि वह स्क्रीन पर और अधिक दिखने के लायक है । टोनी ल्यूक के पास एक एक्सेंट है लेकिन वह उनके किरदार के लिए काम करता है । प्रदर्शन के लिहाज से वह श्रेष्ठ है । मानव कौल एक छोटी सी भूमिका में ठीक हैं । डेन्ज़िल स्मिथ (पुलिस) और सनी कौर जिसने नैना के पति सुनील का किरदार निभाया अपने रोल में ठीक है ।

बदला एक गीत से रहित फ़िल्म है लेकिन एक ही टाइटल ट्रेक ओपनिंग क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है । क्लिंटन सेरेजो का बैकग्राउंड स्कोर आकर्षक है और यह फिल्म के मूड को सूट करता है ।

अविक मुखोपाध्याय की सिनेमैटोग्राफी उपयुक्त है और बाहरी देश के दृश्य अच्छी तरह से कैप्चर किए गए हैं । कौशिक दास, सुब्रत बारिक और पॉल रोवन का प्रोडक्शन डिज़ाइन ठीक है, हालांकि होटल के कमरे के दृश्य में यह थोड़ा अधिक वास्तविक हो सकता था । दीपिका लाल और अनिरुद्ध सिंह की वेशभूषा शानदार हैं । क्रिश्चियन टिंस्ले और डॉमनी टिल के प्रोस्थेटिक्स अच्छे हैं क्योंकि यह फिल्म में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है । शाम कौशल और एलिस्टर मैजोट्टी का एक्शन रियल है । मोनिशा आर बलदावा के संपादन में पहले आधे घंटे और दूसरे घंटे के बीच के कुछ दृश्यों को छोड़कर कई शिकायतें हैं ।

कुल मिलाकर, बदला हैरान कर देने वाले क्लाइमेक्स और शानदार प्रदर्शन, जो इसकी खासियत है, के साथ एक स्मार्ट और प्रभावशाली सस्पेंस ड्रामा है । बॉक्स ऑफिस पर, इसकी संभावनाएं मल्टीप्लेक्स दर्शकों तक सीमित हो सकती हैं ।