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बॉलीवुड के दिग्गज फ़िल्ममेकर्स में शुमार महेश भट्ट ने हिंदी सिनेमा को ऐसी कई बेहतरीन फ़िल्में दी हैं जो आज भी यादगार हैं । हल्की-फ़ुल्की, गंभीर और म्यूजिकल हर शैली की फ़िल्म में उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचर दिया । महेश भट्ट की इन्हीं यादगार फ़िल्मों में से एक है साल 1991 में आई संजय दत्त और पूजा भट्ट अभिनीत सड़क । यह फ़िल्म अपने शानदार प्रदर्शन, गानों और ड्रामा के साथ-साथ सदाशिव अमरापुरकर के खलनायक महारानी किरदार के कारण हर जगह सराही गई थी । और अब पूरे 29 साल बाद महेश भट्ट अपनी फ़िल्म सड़क का सीक्वल लेकर आए हैं सड़क 2 । इतना ही नहीं सड़क 2 के साथ महेश भट्ट ने पूरे 21 सालों बाद एक बार फ़िर निर्देशन की कमान संभाली । विशेष फ़िल्म्स के बैनर तले बनी ये फ़िल्म भट्ट फ़ैमिली के लिए खास है क्योंकि इसमें आलिया भट्ट लीड एक्ट्रेस के रूप में नजर आईं है । तो क्या सड़क 2 दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब हो पाएगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल होती है । आइए समीक्षा करते हैं ।

Sadak 2 Movie Review: हर मोर्चे पर निराश करती है महेश भट्ट की फ़िल्म सड़क 2

सड़क 2,  एक शक्तिशाली गॉडमैन को बेनकाब करने की कोशिश करने वाली एक लड़की की कहानी है । आर्या (आलिया भट्ट) ने अपनी मां शकुंतला को कैंसर के कारण खो दिया है, लेकिन उसे लगता है कि उसकी मां की मौत के पीछे शक्तिशाली गॉडमैन ज्ञान प्रकाश (मकरंद देशपांडे) का हाथ है । उसके पिता, योगेश देसाई (जीशु सेनगुप्ता) ज्ञान प्रकाश के भक्त हैं । योगेश अपनी मृत पत्नी शकुंतला की बहन नंदिनी (प्रियंका बोस) से शादी भी कर लेता है, जो ज्ञान प्रकाश की भक्त हैं । आर्या गॉडमैन को बेनकाब करने के लिए एक ऑनलाइन कैंपेन चलाती है जिसमें उसे लाखों लोगों का साथ मिलता है । इसी दौरान आर्या की मुलाकात विशाल (आदित्य रॉय कपूर) से होती है जो आर्या के मिशन में उसका साथ देता है । एक दिन, ज्ञान प्रकाश अपने गुर्गे को भेजकर आर्या को मारने का प्रयास करता है । हालाँकि विशाल उस गुर्गे को मार देता है जिसके लिए उसे जेल भी हो जाती है । इसके बाद आर्या को पागलखाने भेज दिया जाता है और मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया जाता है । इस दर्मियान उसका ऑनलाइन कैंपेन भी बंद हो जाता हैं । हालांकि, वह अस्पताल से भाग जाती है और माउंट कैलाश जाने का फैसला करती है । ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका 21वां जन्मदिन आने वाला है और उसकी माँ की इच्छा थी कि वह अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण दिन पर इस पवित्र स्थान पर जाए । वह पूजा (पूजा भट्ट) और उसके पति रवि (संजय दत्त) द्वारा संचालित पूजा ट्रैवल्स एंड टूर्स से तीन महीने पहले ही कैब बुक करवा लेती है । पूजा द्वारा बुकिंग स्वीकार करने के बाद, पूजा तो एक सड़क दुर्घटना में मर जाती है । जिसके बाद रवि बिखर जाता है और आत्महत्या करने का प्रयास करता है । एक दिन अचानक आर्या रवि के पास आती है रानीखेत जाने के लिए । पहले रवि जाने से इंकार करता है लेकिन फ़िर मान जाता है । आर्या और रवि की इस जर्नी में विशाल भी शामिल हो जाता है । इसके बाद आगे क्याहोता है ये आगे की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

महेश भट्ट और सुहृता सेनगुप्ता की कहानी अतार्किक और बेसिरपैर की है । फ़िल्म के प्लॉट का कोई पुख्ता आधार नहीं है । और हैरान करने वाली बात ये है कि ये अप्रूव कैसे हो गई । महेश भट्ट और सुहृता सेनगुप्ता की पटकथा कमजोर कथानक को सुधारने में विफल रहती है । लेखकों के पास एक बहुत अच्छा ज्वलंत मुद्दा था-झूठे बाबाओं का और वे इसमें बहुत कुछ कर सकते थे । लेकिन अफ़सोस की बात है कि उन्होंने इस मौके को गंवा दिया । इसके बजाए उन्होंने चीप टर्न एंड ट्विस्ट के जरिए दर्शकों को सिर्फ़ और सिर्फ़ निराश ही किया । महेश भट्ट और सुहृता सेनगुप्ता के संवाद कुछ खास नहीं हैं ।

महेश भट्ट का निर्देशन कुछ काम नहीं करता है । निर्देशन के क्षेत्र में उनके पास कई सालों का अनुभव रहा है लेकिन यहां उनका अनुभव देखने को नहीं मिलता है । फ़िल्म में कई सारी कमियां है और फ़िल्म का निष्पादन उन कमियों को छुपाने में नाकाम साबित होता है । कुछ सीन हैं जैसे- विशाल एक आदमी की हत्या के जुर्म में जैल में बंद होता है । लेकिन एक दिन अचानक वह रिहा हो जाता है । योगेश देसाई के ट्रैक में भी आए ट्विस्ट समझ के परे है । सबसे खराब सीन तो क्लाइमेक्स के लिए रिजर्व रहता है । जहां रवि आर्या और विशाल को नशेवाला केक खिला देता है और फ़िर रवि उस गॉडमैन के महल में बड़ी ही आसानी से पहुंच जाता है । फ़िल्म के लास्ट 20 मिनट दर्शकों के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल होगा ।

सड़क 2 की शुरूआत काफ़ी विचित्र ढंग से होती है । फ़िल्म के किरदारों का परिचय भी सही ढंग से नहीं कराया जो फ़िल्म को कंफ़्यूजिंग बनाता है । जब आर्या और रवि एक दूसरे को जानने लगते हैं, फ़िल्म वहां से थोड़ी बेहतर होती है । पूरी फ़िल्म में लॉजिक को तो ताक पर रख दिया है । जब रवि एक्शन मोड में आता है दिलीप हथकटा और उसके आदमियों को मारता है वहां से फ़िल्म में दिलचस्पी जागती है । इसके अलावा आर्या को विशाल का सच पता चलने के बाद भी उसे प्यार करना, दिल को छू जाता है । लेकिन एक के बाद एक ट्विस्ट इसे सरप्राइजिंग नहीं बल्कि कंफ़्यूजिंग बनाते हैं । एक पल को लगता है कि शायद फ़िल्म के क्लाइमेक्स में कुछ बेहतर देखने को मिलेगा लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगती है ।

संजय दत्त इस फ़िल्म की जान है । वह अपने किरदार में जंचते हैं और शानदार परफ़ोर्मेंस देते हैं । वह काफ़ी हैंडसम भी लगते हैं । आलिया भट्ट अपना बेहतर देने की कोशिश करती हैं लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण अपने किरदार से निराश करती हैं । वह काफ़ी जोश से भरी दिखती हैं । आदित्य रॉय कपूर अपने रोल में जंचते हैं लेकिन सेकेंड हाफ़ में उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ होता नहीं है । पूजा भट्ट फ़िल्म में मौजूद नहीं है लेकिन उनकी आवाज कहीं-कहीं सुनाई देती है । मकरंद देशपांडे एक कमजोर विलेन के रूप में सामने आते हैं । जिशु सेन गुप्ता बहुत ज्यादा ओवरएक्टिंग करते हैं । प्रियंका बोस के साथ भी ऐसा ही कुछ है । गुलशन ग्रोवर एक अपराधी के रूप में बर्बाद हो जाते हैं । उनका किरदार काफ़ी सही था लेकिन उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ होता नहीं है । जॉन गार्डनर (जॉन) और मोहन कपूर (राजेश पुरी) केवल ऐसे दो सहायक अभिनेता हैं जो इस फिल्म में ओवरएक्टिंग नहीं करते हैं । अनिल जॉर्ज (ओम), हिमांशु भट्ट (गौरव), जहांगीर करकरिया (डॉ दस्तूर), क्रिसन परेरा (नैना दास) और आकाश खुराना (मनोचिकित्सक) ठीक हैं ।

इस फ़िल्म के संगीत में कोई जान नहीं है । 'इश्क कमाल' को याद किया जा सकता है लेकिन बाकी के गाने जैसे- 'शुक्रिया', 'तुम ही से' और 'दिल की पुरानी सड़क' कोई प्रभाव नहीं छोड़ते हैं । संदीप चौटा का बैकग्राउंड स्कोर में कोई कमी नहीं है ।

Jay I Patel की सिनेमैटोग्राफी काफी अच्छी है और स्थानीय जगहों को अच्छी तरह से कैप्चर करती है । अब्बास अली मोगुल के एक्शन नाटकीय है । अमित रे और सुब्रत चक्रवर्ती की प्रोडक्शन डिजाइन और प्रियंका भट्ट की वेशभूषा ठीक है । संदीप कुरुप का संपादन कुछ खास नहीं है ।

कुल मिलाकर, सड़क 2 निराश करने वाली कंफ़्यूजिंग फ़िल्म है ।