जब भी जासूसी थ्रिलर फ़िल्म की बात आती है लोगों के जहन में मेगाबजट की एक्शन पैक्ड बड़ी फ़िल्में आती है जैसे- एक था टाइगर[2012], टाइगर जिंदा है[2017], एजेंट विनोद[2012], फ़ैंटम[2015], बेबी[2015], बैंग बैंग[2014] इत्यादि । लेकिन बीते साल आई जासूसी थ्रिलर फ़िल्म राजी ने जासूसी फ़िल्मों की धारणा को बदल कर रख दिया । हालांकि इस फ़िल्म में इतना ज्यादा एक्शन सीन नहीं था लेकिन फ़िर भी इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों-दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ी और हर जगह इसे सराहा गया । और अब इसी से मिलती जुलती फ़िल्म रोमियो अकबर वॉल्टर इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । तो क्या राजी की तरह जॉन अब्राहम अभिनीत रोमियो अकबर वॉल्टर दर्शकों के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो पाती है, या यह अपने प्रयास में विफ़ल होती है । आइए समीक्षा करते है ।

रोमियो अकबर वॉल्टर, एक ऐसे देशभक्त की कहानी है जो दुश्मन देश में जासूसी करते हुए सबसे बड़ा जोखिम लेता है । ये साल है 1971 । रोमियो अली (जॉन अब्राहम) भारत में एक बैंक में काम करता है । वह अपनी मां वहीदा (अलका अमीन) , जो रोमियो के पिता की देश की सेवा करते समय मृत्यु हो जाने के बाद से उसको लेकर बहुत प्रोटेक्टिव है, के साथ रहता है । रोमियो को भी भारत के लिए काम करने का जुनून है, लेकिन वह अपनी मां के कारण ऐसा नहीं कर पा रहा है । हालांकि एक दिन उसकी मुलाकात रॉ के प्रमुख श्रीकांत राव (जैकी श्रॉफ) से होती है, और वह रोमियो को उनके साथ शामिल होने और पाकिस्तानियों की जासूसी करने के लिए कहता है । रोमियो ऐसा करने के लिए राजी हो जाता है और इसके लिए ट्रेनिंग पर जाने से पहले, वह अपनी मां से झूठ बोलता है कि, उसे उसकी बैंक में प्रमोशन मिला है जिसके चलते उसे ट्रेनिंग के लिए बाहर जाना पड़ेगा । पाकिस्तान में, वह हथियारों के सौदागर आइज़क अफरीदी (अनिल जॉर्ज) ,जो जनरल जोरावर (पूर्णेंदु भट्टाचार्य) का बहुत करीबी था, का विश्वास जीतने में सफल रहता है । बातचीत और गतिविधियों पर जासूसी करते हुए, रोमियो को मिली एक महत्वपूर्ण जानकारी हिला कर रख देती है । पाकिस्तानी सेना तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बदलीपुर इलाके में हवाई हमले की योजना बना रही है । पाकिस्तान का यह हिस्सा विद्रोही हो रहा है और आज़ादी चाहता है । इस बीच विद्रोहियों को भारतीय बलों द्वारा प्रशिक्षित किया जा रहा है और उनमें से कई बदलीपुर में तैनात हैं, जहाँ पाकिस्तानियों ने बम गिराने की योजना बनाई है । आगे क्या होता है यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।
रॉबी ग्रेवाल की कहानी आशाजनक है और एक रोमांचक थ्रिलर के लिए बनाई जा सकती थी । रोबी ग्रेवाल और राहुल सेन गुप्ता की पटकथा बहुत कमजोर और त्रुटिपूर्ण है । दृश्य अच्छे से नहीं चलते हैं और कथा काफी असंगत है । ऑडियंस आसानी से समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या हो रहा है । बहुत अधिक खामियां हैं जो एक आम आदमी भी आसानी से समझ जाएगा । रोबी ग्रेवाल, इशराक ईबा और श्रेयांश पांडे के संवाद अच्छे हैं लेकिन कुछ भी यादगार नहीं है ।
रोबी ग्रेवाल का निर्देशन उचित स्तर का नहीं है । यह सही है कि उन्होंने इसके लिए काफ़ी रिसर्च की है लेकिन इसका सही इस्तेमाल नहीं किया गया है । इसके अलावा दर्शक राजी, जो एक बेहतरीन प्रोडक्ट था, से इसकी तुलना करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे । रोमियो का अपनी मां के साथ बॉंड अधपका सा लगता है । यहां तक की पारूल (मौनी रॉय) के साथ रोमांटिक ट्रेक भी जबरदस्ती का डाला हुआ लगता है । मेकर्स ने यह दिखाने की जरा भी कोशिश नहीं कि बाद में पारुल के साथ क्या होता है ।
रोमियो अकबर वॉल्टर की शुरूआत एक चौंकाने वाले एलीमेंट से होती है लेकिन इसके बाद यह फ़िल्म बिखरने लगती है । फ़िल्म में कई जगह कमियां है । दर्शकों को यह समझने में काफ़ी मुश्किल होती है कि आखिर चल क्या रहा है । कुछ सीन तो खासतौर पर पचा पाना बहुत मुश्किल है जैसे- कैसे पाकिस्तानी लोग इतनी आसानी से रोमियो पर भरोसा करना शुरू कर देते हैं । कुछ सीन फ़िल्म में दिलचस्पी बढ़ा देते है जैसे-, कर्नल खान (सिकंदर खेर) का रोमियो के घर की खोज करना, झूठ डिटेक्टर परीक्षण अनुक्रम इत्यादि । लेकिन इस तरह के दृश्यों का तुरंत बाद में कोई रोमांचक या त्रुटिपूर्ण घटनाक्रम नहीं होता है । आखिरी कुछ मिनट देशभक्ति का जज्बा पैदा करते हैं और दर्शकों का ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन इसमें भी मेकर्स केवल आंशिक रूप से सफल होते हैं ।
जॉन अब्राहम अपना सौ फीसदी देते हैं । फिल्म निराश कर सकती है लेकिन वह अपनी परफ़ोर्मेंस से कहीं भी निराश नहीं करेंगे । उनके भावहीन एक्सप्रेशन उनके किरदार के लिए एकदम सटीक बैठते है । मौनी रॉय का किरदार काफ़ी दिलचस्प है । और वह अपने किरदार को काफ़ी अच्छे से भी निभाती है, लेकिन उनके किरदार के साथ अच्छे से न्याय नहीं हो पाता है । जैकी श्रॉफ भरोसेमंद लगते है लेकिन कई जगहों पर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह क्या बोल रहे है । सिकंदर खेर भय और आतंक दिखाते हैं जो सही लगता है । सुचित्रा कृष्णमूर्ति (रेहाना काज़मी) ठीक हैं लेकिन उनके पास करने के लिए बहुत कम है । अनिल जॉर्ज प्रभावशाली हैं । रघुबीर यादव (मुदस्सर) एक छाप छोड़ते है । पूर्णेंदु भट्टाचार्य ठीक हैं । राजेश श्रृंगापुरे (अवस्थी) और नवाब अफरीदी (शादाब अमजद खान) अच्छा करते हैं ।
संगीत का फ़िल्म में कोई काम नहीं है और यह जबरदस्ती का डाला हुआ लगता है । 'बुल्लेया' एक राग को फेल करने में विफल है । 'मा' को जबरदस्ती जोड़ा जाता है । 'वंदे मातरम' एंड क्रेडिट में प्ले किया जाता है । 'अल्लाह हू अल्लाह' बेकार है जबकि 'जी लेन दे' बस एक मिनट के लिए है । हनीफ शेख का बैकग्राउंड स्कोर काफी लाउड है लेकिन प्रभाव बढ़ाने में काम आता है ।
तपन तुषार बसु की सिनेमैटोग्राफी उपयुक्त है । मधुर माधवन और स्वप्निल भालेराव का प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म को अच्छा रेट्रो टच देता है । अमीरा पुनवानी की वेशभूषा भी किरदारों को रेट्रो टच देने में कामयाब होती हैं । मौनी द्वारा पहने गए कपड़े दिखाए गए युग के अनुरूप हैं । प्राण और पिक्सेल डी का वीएफएक्स काम चलाऊ है । निलेश गिरधर का संपादन काफी धीमा है और फिल्म 144 मिनट में भी बहुत लंबी है ।
कुल मिलाकर, रोमियो अकबर वॉल्टर प्रभावित करने में नाकाम होती है । क्योंकि यह दोषपूर्ण स्क्रिप्ट होने के साथ-साथ कमजोर निर्देशन से भी ग्रस्त है । बॉक्स ऑफिस पर इसे नंबर जुटाने में काफ़ी संघर्ष करना होगा ।
















