''उम्र महज एक नंबर है'' ये बहुत लोगों को कहते सुना है । बुजुर्ग अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद, अपने अंदर बच्चे को जिंदा रखना पसंद करते है । वहीं दूसरी तरफ़, कुछ बुजुर्ग अपनी बढ़ती उम्र को स्वीकार कर और उनकी जटिलताओं को स्वीकारते हुए उन्हीं के साथ रहना पसंद करते है । आर बाल्की ने साल 2007 में अपनी फ़िल्म चीनी कम, जिसमें अमिताभ बच्चन ने 64 साल के एक ऐसे बुजुर्ग आदमी का किरदार निभाया था, जो अपनी इस उम्र के बाद भी शादी करने के लिए तैयार था जबकि उनके होने वाले ससुर, जिसका किरदार परेश रावल ने निभाया था, उनसे छोटे थे । और एक बार फ़िर अमिताभ बच्चन इसी प्रकार के किरदार को निभाते हुए नजर आएंगे, अपनी इस हफ़्ते रिलीज होने वाली फ़िल्म 102 नॉट आउट में, जिसमें उनका साथ दिया है ॠषि कपूर ने । तो क्या यह फ़िल्म एक पारिवारिक मनोरंजक फ़िल्म साबित होगी ? या यह, फ़न और पागलपन को बनाने में नाकाम साबित होगी ?

102 नॉट आउट एक पिता और बेटे की असामान्य सी कहानी है । दत्तात्रय वखारिया (अमिताभ बच्चन) अपनी 102 उम्र के बावजूद भी काफ़ी स्वस्थ्य हैं और किसी युवा से कम नहीं हैं । दत्तात्रय बिना टेंशन के मजेदार जिंदगी जीना चाहते हैं । पृथ्वी पर सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए और उनका और 16 साल जीने का लक्ष्य है । उनका बेटा बाबूलाल (ऋषि कपूर) है, जो 75 साल का है, उसका अपनी जिंदगी को लेकर कोई लगाव नहीं है । बाबुलाल की जिंदगी के प्रति ये असंतोष दत्तात्रय को पसंद नहीं आता है । बुढ़ापा ओड़ लेना, मौत आदि के संबंध में नकारात्मक बाते करना दत्तात्रेय के बर्दाश्त के बाहर है । इसलिए दत्तात्रेय ऐसा पहला पिता बनने का फ़ैसला करता है, जो अपने 75 साल के बेटे को वृद्दाश्रम में दाखिल कराना चाहता है । बाबुलाल अपने पिता के इस फ़ैसले से हैरान रह जाता है और इस बाबत वह अपने पिता का विरोध करता है । नतीजतन दत्तात्रय बाबुलाल के सामने कुछ शर्त रखता है कि यदि वह इस बड़ी सी हवेली में उनके साथ रहना चाहता है तो वह ये सब पूरा करे । चूंकि दत्तात्रय इन शर्तों को पूरा करना शुरू कर देता है, इसलिए वह अधिक से अधिक उत्साहित और बच्चे की तरह बन जाता है । लेकिन इसके बाद कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ जाता है और कई चुनैतियां सामने आती है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
फ़िल्म के ओपनिंग क्रेडिट काफ़ी क्रिएटिव हैं, मुंबई के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों को दर्शाते हैं, जिनमें से कई फिल्म की कहानी का हिस्सा भी हैं । फ़िल्म के तीनों महत्वपूर्ण किरदारों का परिचय- दत्तात्रय, बाबुलाल और धीरू (जिमित त्रिवेदी) काफी मजाकिया है और फ़िल्म को देखने लायक बनाता है । यह फ़िल्म महज 102 मिनट लंबी है, और इसमें कहीं भी समय की बर्बादी नहीं हुई है । फिल्म त्वरित परिचय के बाद ट्रैक पर आती है और दत्तात्रय का अपने बेटे को वृद्दाश्रम में दाखिला दिलाने की कोशिश करना, काफ़ी मजेदार है । एक सीन, जिसमें वह बाबुलाल का प्रेम पत्र पढ़ता है, हंसी से लोटपोट कर देता है । यहीं से फ़िल्म थोड़ी सी फ़िसल जाती है क्योंकि निर्देशन थोड़ा सा गड़बड़ा जाता है । लेकिन फ़िर इसी मोड़ पर एक चर्च का सीन आता है जो फ़िल्म को एक नया मोड़ देता है, और फ़िल्म फ़िर से अपनी रफ़्तार पकड़ती है । इंटरवल के बाद, यह मोड़ काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाता है और यही वह जगह है जहां फिल्म भावनात्मक हो जाती है । वो सीन जहां, दत्तात्रय अपने जीवन से जुड़ी एक दिल दहलाने वाली घटना को बताते है जो दिल को अंदर तक भेद जाती है, यह सीन फिल्म के सर्वश्रेष्ठ सीन में से एक है । फ़िल्म का क्लाइमेक्स ताली बजाने योग्य है और जो आपके चेहरे पर मुस्कान लेकर आता है । लेकिन इस प्रक्रिया में, फ़िल्म के प्रोमो में जो हास्य का तड़का लगाया जाता है और उससे फ़िल्म में, और ज्यादा हास्य की उम्मीद बढ़ जाती है, थोड़ी सी निराश कर सकती है क्योंकि सेकेंड हाफ़ काफ़ी गंभीर है और यहां हास्य की कुछ कमी है ।
सौम्या जोशी की कहानी अनूठी, छू लेने वाली है और एक महत्वपूर्ण संदेश देती है । अधिकांश हिस्सों में सौम्या जोशी की पटकथा काफ़ी प्रभावपूर्ण है, लेकिन फ़र्स्ट हाफ़ में यह काफ़ी तेज और थोड़ी असंगत लगती है । उदाहरण के तौर पर, जिस तरह से फ़िल्म का टोन तब काफ़ी इमोशनल हो जाता है जब बाबुलाल हवाई जहाज के साथ पार्क में प्रवेश करता है, यह काफ़ी तेजी से आता है और जिससे दर्शक अनजान होते है । सौम्या जोशी के डायलॉग हालांकि मज़ेदार है और फ़िल्म के लिए रुचि जगाते है लेकिन ये कई जगहों पर अच्छे नहीं लगते है । उमेश शुक्ला का निर्देशन काफ़ी साधारण और स्वच्छ है । फ़र्स्ट हाफ़ में वह कुछ जगहों पर संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते है, लेकिन कुल मिलाकर वह फ़िल्म को आकर्षक बनाने में कामयाब होते है और दर्शकों को बराबरी से हंसाने और भावुक करने में अच्छा मैनेज करते है । 102 नॉट एक गुजराती नाटक पर बेस्ड फ़िल्म है, जिसे सौम्या जोशी ने ही निर्देशित किया था और उमेश शुक्ला ने इसे फ़िल्मी पर्दे पर उतारा । कुछ स्थानों पर, यह आपको एक नाटक की भावना देती है लेकिन इसके दमदार कंटेट के चलते इससे कोई शिकायत नहीं है ।
अमिताभ बच्चन एक बार फ़िर अपनी शानदार परफ़ोरमेंस से छा जाते हैं । सौ बरस के व्यक्ति के रूप में उन्हें देखना काफ़ी दिलचस्प और प्यारा लगता है । वह इस उम्र के किरदार को भी काफ़ी जिंदादिली से अदा करते है । यहां तक की इमोशन सीन में भी वह काफ़ी जंचते है । उनका गुजराती उच्चारण अच्छी तरह से सामने आता है, लेकिन यह जरा भी ओवर नहीं दिखता है । ॠषि कपूर भी काफ़ी अच्छी परफ़ोरमेंस देते हैं और अपने किरदार में पूरी तरह समाए हुए नजर आते है । उन्हें एक नाराज वरिष्ठ नागरिक के रूप में देखना अच्छा लगता है और उनका क्रमिक परिवर्तन भी सुंदर है । उनका सबसे अच्छा कार्य निश्चित रूप से सेकेंड हाफ़ में देखने को मिलता है जहां कोई डायलॉग नहीं है लेकिन उनके हाव-भाव और आंखों के माध्यम से बातचीत करना, काफ़ी प्रशंसनीय है । जिमित त्रिवेदी जिसने भूल भूलैया (2007) से अपना डेब्यू किया था, एक बार फ़िर शानदार परफ़ोरमेंस देते है । वह फ़िल्म के फ़न और इमोशनल सीन में अपना अभूतपूर्व योगदान देते है । धर्मेंद्र गोहिल (अमोल) एकाकी सीक्वेंस में अच्छे लगते है ।
सलीम-सुलेमान का संगीत मुश्किल से याद रखने योग्य है । 'बच्चे की जान' और 'कुल्फ़ी' दोनों ही बैकग्राउंड में बजाया जाता है और ये दोनों कहानी के साथ मेल खाते है । 'बदुंबा' फ़िल्म से नदारद है । हालांकि जॉर्ज जोसेफ का बैकग्राउंड स्कोर काफी उत्साहजनक है । लक्ष्मण उत्कर्ष का छायांकन अच्छा है और मुंबई के बाहरी शॉट अच्छी तरह से कैप्चर किए गए हैं । बोधदित्य बनर्जी का संपादन धीमा है, वहीं कहीं-कहीं तेज भी है, लेकिन कुल मिलाकर अच्छा है । यह सराहनीय है कि 102 नॉट आउट शीर्षक वाली यह फिल्म वास्तव में 102 मिनट लंबी है और इसे प्रबंधित करने के लिए इसके एडिटर प्रशंसा के पात्र है । मानसी ध्रुव मेहता का प्रोडक्शन डिजाइन आकर्षक है - हवेली काफी समृद्ध दिखती है । वीरा कपूर ई की ड्रेस डिजाइनिंग काफ़ी उत्कृष्ट है । प्रीतीशेल सिंह के मेकअप, बाल और प्रोस्थेटिक्स के उल्लेख के बिना यह फ़िल्म समीक्षा अधूरी रहेगी । प्रीतीशेल ने दोनों दिग्गज अभिनेताओं का कमाल का मेकअप किया है, जो फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत है ।
कुल मिलाकर, 102 नॉट आउट दमदार इमोशंस, जो इसकी सबसे बड़ी खासियत है, के साथ एक मनोरंजक पारिवारिक फ़िल्म है । यह आज के समय के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म, मजबूत मुंह जुबानी के चलते लोगों को जुटाने में कामयाब होगी और परिवार इसे थिएटर में देखने के लिए बाध्य होंगे । आप इसे जरूर देखिए !
















