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गुरू, युवा, धूम, सरकार, पा, बोल बच्चन और दोस्ताना जैसी कई बेहतरीन फ़िल्में देने के बाद अभिषेक बच्चन ने फ़िल्मों से तकरीबन ढाई साल का ब्रेक लिया और फ़िर मनमर्ज़ियां से एक बार फ़िर अपना शानदार कमबैक किया । इसके बाद अभिषेक ने अपना डिजीटल डेब्यू भी किया । और अब अभिषेक एक बार फ़िर अपनी आगामी फ़िल्म द बिग बुल के साथ दर्शकों का मनोरंजन करने आए हैं । स्टॉक ब्रोकर हर्षद मेहता के जीवन से प्रेरित फ़िल्म द बिग बुल क्या दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब हो पाएगी या यह अपने प्रयास में नाकाम होती है ? आइए समीक्षा करते हैं ।

The Big Bull Movie Review: स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव जैसी है अभिषेक बच्चन की द बिग बुल

द बिग बुल की कहानी एक साधारण आदमी की आम से खास बनने की कहानी है । यह साल 1987 है । बॉम्बे के निवासी हेमंत शाह (अभिषेक बच्चन) बाल कला केंद्र में मामूली वेतन पर काम करता हैं । वह अपने पड़ोस में रहने वाली प्रिया (निकिता दत्ता) से प्यार करता है, लेकिन वह आर्थिक रूप से उतना सक्षम नहीं है, इसलिए वह उसके पिता से शादी की बात करने के बारें में आशंकित है । एक दिन, बाल कला केंद्र में एक बच्चें के माता-पिता, हेमंत को बताते हैं कि बॉम्बे टेक्सटाइल के शेयरों को बेचने के बाद, उन्हें काफ़ी मुनाफ़ा हुआ । यह बात हेमंत को स्टॉक की दुनिया के बारे में जानने के लिए उत्सुक बनाती है । इस बीच, उनके भाई वीरेन शाह (सोहम शाह) शेयरों में बड़ी राशि गंवा देते हैं । वीरेन कर्ज में है और हेमंत बॉम्बे टेक्सटाइल के शेयरों में निवेश करने का फैसला करता है । लेकिन ऐसा करने से पहले वह अपना होमवर्क करता है । यह हेमंत को न केवल वीरेन को कर्ज-मुक्त करने में सक्षम बनाता है, बल्कि मुनाफ़ा भी दिलाता है । कुछ ही समय में, हेमंत स्टॉक की दुनिया में प्रवेश करता है और कांतिलाल (हितेश रावल) नामक एक स्टॉक व्यापारी के लिए काम करना शुरू कर देता है । हेमंत खुद का ट्रेडिग अकाउंट चाहता है लेकिन इसके लिए उसे 10 लाख रु की जरूरत है । 10 लाख रु कमाने के लिए हेमंत प्रीमियर ऑटो के यूनियन लीडर राणा सावंत (महेश मांजरेकर) से हाथ मिलाता है । उनकी इनसाइडर ट्रेडिंग गतिविधि जल्द ही उन्हें 10 लाख रु कमाने में मदद करती है । हेमंत अब स्टॉक में हेरफेर करना शुरू कर देता है और यहां तक कि सिस्टम में खामियों का फायदा उठाने के लिए बैंकों को भी मिला लेता है। यह सब सेंसेक्स को ऊंचाई पर ले जाता है। इस तरह वह शेयर मार्केट में हीरो बन जाता है । आर्थिक स्थिती अच्छी होने के बाद वह प्रिया से शादी भी कर लेता है । जब हर कोई हेमंत शाह के गुणगान कर रहा होता है, तब इंडिया टाइम्स समाचार पत्र के वित्त पत्रकार मीरा राव (इलियाना डीक्रूज़) को कुछ ठीक नहीं लग रहा होता है । उसे लगता है कि हेमंत अवैध रूप से स्टॉक एक्सचेंज में पैसा कमा रहा है । वह उसके बारे में आलोचनात्मक लेख लिखती है। और एक दिन, वह हेमंत की नापाक हरकतों के बारे में चौंकाने वाले खुलासे करती है । इसके बाद क्या होता है, ये आगे की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

कूकी गुलाटी और अर्जुन धवन की कहानी दिलचस्प है । यह स्टॉक ब्रोकर हर्षद मेहता के जीवन से प्रेरित है । कूकी गुलाटी और अर्जुन धवन की पटकथा अधिकांश स्थानों पर प्रभावी है । लेखकों ने बेहतर प्रभाव के लिए जितना संभव हो उतना मनोरंजक और नाटकीय बनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की है । हालांकि वह सफ़ल तो होते हैं लेकिन पूरी तरह से नहीं । इसके दो कारण है । पहला, उन्होंने हेमंत शाह के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को दिखाया ही नहीं है और इसे बहुत तेज़ गति से बनाया है । दूसरा, स्कैम 1992 से होने वाली तुलना काफ़ी हद इसके प्रभाव को कम करती है । रितेश शाह के डायलॉग्स हालांकि शार्प हैं ।

कूकी गुलाटी का निर्देशन अच्छा है । उनके पास न सिर्फ जो चल रहा है उसे मनोरंजक रखने की चुनौती थी, बल्कि ये भी था कि वो आसानी से समझ आ सके । ऐसा इसलिए है क्योंकि हर कोई स्टॉक और शेयरों के कॉन्सेप्ट को नहीं समझता है । और कूकी दोनों पहलुओं पर कमांड करने में काफ़ी हद तक सफ़ल होते हैं । लेकिन वहीं इसके विपरित, कोई भी व्यक्ति इसकी तुलना स्कैम 1992 के साथ करने से खुद को रोक नहीं सकता । भले ही वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करे, लेकिन कोई भी व्यक्ति प्रतीक गांधी अभिनीत वेब सीरिज को नहीं भूल सकता क्योंकि यह बेहद यादगार थी । और इसे बहुत बेहतर तरीके से हैंडल किया गया था । ऐसा लगता है कि द बिग बुल को स्कैम 1992 से पहले रिलीज होना चाहिए था तो यह दर्शकों के लिए अधिक मनोरंजक और दिलचस्प होती । अब क्योंकि द बिग बुल की टार्गेट ऑडियंस ने पहले ही स्कैम 1992 को देख लिया है तो कमोवेश सभी को कहानी का पता है । लोगों को पहले से ही पता है कि अब आगे क्या होने वाला है । वो शुक्र है कि लेखकों ने कुछ ट्विस्ट इसमें जोड़े हैं और क्लाइमेक्स तो हैरान कर देने वाला है । यदि स्कैम 1992 की तुलना से इसे अलग कर भी दें तो इसमें एक और बड़ी खामी है इसकी स्पीड, जो कि बहुत तेज है । कुछ सीक्वंस को अच्छे से समझाया नहीं गय । संजीव कोहली (समीर सोनी) का किरदार कहानी के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन लेखक और निर्देशक उसे उतना स्कोप नहीं देते जितना देना चाहिए था ।

द बिग बुल की शुरूआत औसत है । अभिषेक बच्चन का एंट्री सीन प्रभाशाली होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं होता है । वो सीन काफ़ी अच्छा है जहां हेमंत प्रिया के साथ रात में वॉक करता है और उस दौरान वीरेन के कर्ज के बारे में पता चलता है । हेमंत की ग्रोथ को बड़े करीने से और शीघ्रता से दर्शाया गया है और सबसे अच्छा सीन फ़र्स्ट हाफ़ से ठीक पहले आता है । 'इश्क नमाजा' गाना काफ़ी अच्छे से शूट किया गया है और फ़िल्म के लिए दिलचस्पी को बढ़ाता है । दिल्ली की पार्टी में हेमंत का अनुभव पेचीदा है । आयकर विभाग के छापे का दृश्य और हेमंत और मीरा का इंटरव्यू सीन समानांतर चलता है और यह फ़र्स्ट हाफ़ का सबसे अच्छा हिस्सा है । सेकेंड हाफ़ में, चीजें बेहतर हो जाती हैं क्योंकि मीरा सच्चाई को उजागर करने का प्रयास करती है जो उसे मिलती है । यह वह समय भी है जब हेमंत डर जाता है और गंदगी से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करता है । आखिरी 30 मिनट में फ़िल्म सबसे अच्छी होती है । प्रेस कॉन्फ्रेंस के दृश्य को नाटकीय रूप से दर्शाया जाता है और ध्यान आकर्षित करता है । क्लाइमेक्स का ट्विस्ट अनपेक्षित है ।

अभिषेक बच्चन शानदार परफ़ोर्मेंस देते हैं और कई जगह पर सधा हुआ अभिनय करते हैं । वह एक तेजतर्रार, अहंकारी व्यक्ति का किरदार अदा करते हैं लेकिन वह इसमें कहीं भी ओवर कुछ नहीं करते । दिलचस्प बात ये है कि ऐसा ही कुछ किरदार अभिषेक ने अपनी फ़िल्म गुरु में किया था लेकिन अभिनेता ने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि उनका द बिग बुल का अभिनय गुरु के अभिनय से मैच न हो । हालांकि, उनके हंसी के संक्षिप्त शॉट्स, अनजाने में मजाकिया लगते हैं जिन्हें सही मायने में हटाया जाना चाहिए था । इलियाना डीक्रूज़ के पास फ़र्स्ट हाफ़ में करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता है लेकिन सेकेंड हाफ़ में वह छा जाती हैं । वह अपने किरदार में जंचती हैं । निकिता दत्त अपने रोल में प्यारी लगती हैं और अमिट छाप छोड़ती हैं । सोहम शाह उम्मीद के मुताबिक भरोसेमंद लगते हैं और शुरू से आखिर तक एक मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं । महेश मांजरेकर और समीर सोनी अपने स्पेशल अपिरियंस में जंचते हैं । सुप्रिया पाठक शाह (अमीबेन; हेमंत और वीरेन की मां) अपने रोल में जंचती हैं । सौरभ शुक्ला (मनु मालपानी) का अभिनय अच्छा लगता है । राम कपूर (अशोक मीरचंदानी) के पास सीमित स्क्रीन टाइम है लेकिन उसमें भी वे छा जाते हैं । शिशिर शर्मा (राजेश मिश्रा; मीरा के बॉस) ठीक हैं, जबकि लेख प्रजापति (तारा; वीरेन की पत्नी) और हितेश रावल के पास सीमित स्क्रीन टाइम है । ऐसा ही कुछ सुमित वत्स (हरि) के लिए भी जाता है। कानन अरुणाचलम (वेंकटेश्वर) विशेष रूप से उस दृश्य में बहुत अच्छे लगते हैं जहाँ वह अनजाने में राज खोलते हैं । तृप्ति शंखधर (आशिमा; जो ट्रेन में मीरा से मिलती है) और रियो कपाड़िया (एनसीसी एमडी सिंह) के सिर्फ एक दृश्य के होने के बावजूद प्रभाव दर्ज करते हैं।

संगीत औसत है लेकिन अच्छी तरह से बुना गया है । 'इश्क नमाज' भावपूर्ण है और खूबसूरती से फिल्माया गया है । टाइटल ट्रैक फ़र्स्ट हाफ में कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों में बैकग्राउंड में चलता है । 'हवाओं में" अंत क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है । संदीप शिरोडकर का बैकग्राउंड स्कोर ड्रामा में इजाफा करता है ।

विष्णु राव की सिनेमेटोग्राफ़ी उपयुक्त है । दुर्गाप्रसाद महापात्रा का प्रोडक्शन डिजाइन समृद्ध है । दर्शन जालान और नीलांचल घोष की वेशभूषा 80 के दशक के अंत और 90 के दशक के शुरुआती दिनों की याद दिलाती है। NY VFXWaala का VFX प्रशंसनीय है । धर्मेंद्र शर्मा का संपादन बहुत ही धीमा और कई जगहों पर काफ़ी तेज लगता है ।

कुल मिलाकर, द बिग बुल वेब सीरिज स्कैम 1992 से तुलना का शिकार होती है । लेकिन फ़िर भी यह शानदार परफ़ोर्मेंस, ड्रामाटिक मोमेंट और अनपेक्षित अंत के कारण दिल जीत ले जाती है ।