कभी-कभी एक फ़िल्म एक कलाकार को लोकप्रिय स्टार बनाने का काम कर जाती है । बाहुबली सीरिज की दोनों फ़िल्में- बाहुबली- द बिगनिंग और बाहुबली-द कन्क्लूजन, ने फ़िल्म के लीड एक्टर प्रभास को अभूतपूर्व लोकप्रियता दिलाई । देखते ही देखते ये साउथ स्टार देश का सबसे चहेता सुपरस्टार बन गया । और ये देखते हुए प्रभास ने हिंदी सिनेमा में एंट्री ली और इस हफ़्ते रिलीज हुई फ़िल्म साहो के साथ अपना बॉलीवुड डेब्यू किया । सुजीत के निर्देशन में बनी एक्शन से भरी साहो एक साथ चार भाषाओं में रिलीज हुई है । तो क्या यह फ़िल्म उम्मीदों के मुताबिक दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल होती है, आइए समीक्षा करते है ।

साहो एक ऐसे आदमी की कहानी है जो रहस्यमयी मिशन पर है । Waaji एक ऐसा विदेशी शहर है जिस पर गैंगस्टर और अपराधियों का राज चलता है और उनका सरगना है रॉय (जैकी श्रॉफ) । वह चतुराई से भारत में एक हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए एक भारतीय मंत्री, रामास्वामी (तनिकेला भरानी) की मंजूरी लेने में सफ़ल हो जाता है । वह मुंबई पहुंचता है लेकिन यहां उसकी सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है । और अब उसकी गद्दी पर उसका बेटा विशवंक (अरुण विजय) बैठता है, और ये देवराज (चंकी पांडे) से इसलिए नाराज है क्योंकि देवराज उसके पिता की गद्दी हासिल करना चाहता है । इस बीच मुंबई क्राइम ब्रांच रॉय और अन्य संबंधित अपराधों की मौत की जांच कर रही है । और फ़िर ये केस अशोक चक्रवर्ती (प्रभास), जो एक शक्ति्शाली और बुद्धिमान ऑफ़िसर है, को सौंप दिया जाता है । अमृता नायर (श्रद्धा कपूर) भी उसकी टीम का हिस्सा बन जाती है । सीसीटीवी फुटेज को स्कैन करते समय, उन्हें एक रहस्यमय व्यक्ति (नील नितिन मुकेश) नजर आता है जिसे वह इस मामले में संदिग्ध मानते है । सबूतों के अभाव में वह उसे गिरफ़्तार नहीं कर पाते है । अशोक उससे बात करने का प्रबंध करता है फ़िर उसे कई अनकही बातें पता चलती है । यहां एक ब्लैक बॉक्स की बात सामने आती है जिसकी खोज रॉय के बेटे विशवंक को भी होती है, जबकि ये ब्लैक बॉक्स मुंबई में छिपा है । वह अपने सहयोगी कल्कि (मंदिरा बेदी) को उस बॉक्स को लेने भेजता है वह इसे लेने में कामयाब होती है और इसे ससुरक्षित बैंक में जमा करवा देती है । जब रहस्यमयी व्यक्ति उसे हथियाने की कोशिश करता है तो पुलिस उसे धर दबोचती है । हालांकि इस समय पुलिस के पैरों तले जमीन खिसक जाती है जब उन्हें पता चलता है कि उनकी टीम में भी कोई भेदी है । और वो भेदी उस ब्लैक बॉक्स को लेकर भाग जाता है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।
सुजीत की कहानी सख्ती से ठीक है । लेकिन यदि पटकथा और निर्देशन उच्च स्तर का होता तो ये एक रोमांचक एक्शन फ़िल्म बनकर उभरती । सुजीत की पटकथा फ़िल्म का मजा खराब करती है । फ़र्स्ट हाफ़ तक ठीक-ठाक है लेकिन इस के बाद फ़ि्ल्म बुरी तरह से बिखर जाती है । फ़िल्म में कई सारे विलेन हैं और बहुत सारे लोग डबल-क्रॉसिंग कर रहे हैं, कई सारे टर्न एंड ट्विस्ट हैं, ये सब कुछ दर्शकों को उलझा कर रख देता है । अब्बास दलाल और हुसैन दलाल के डायलॉग सरल हैं, लेकिन कुछ वन-लाइनर काफ़ी दमदार हैं ।
सुजीत का निर्देशन काफी कमजोर है और यह फ़िल्म के नाकाम होने की सबसे बड़ी वजह है । साहो जैसी बड़ी फ़िल्म, जो इतने बड़े पैमाने पर बनाई गई है कि इसे बनाने के लिए एक एक्सपर्ट और अनुभवी फ़िल्ममेकर की आवश्यकता थी, जो इसे सही रूप से अंजाम दे पाता । लेकिन सुजीत इसके साथ न्याय करने में असफ़ल होते है । फ़िल्म का प्लॉट कमजोर हैं लेकिन इसे शानदार निष्पादन के माध्यम से बचाया जा सकता था । सुजीत पूरी तरह से इसे बनाने में विफ़ल रहते है । इसके विपरीत, कुछ सीन ऐसे भी हैं जो अच्छे से संभाले गए है । स्पेशली फ़र्स्ट हाफ़ में, जहां विश्वांक और अशोक के एंट्री सीन, देवराज का अपने पिता पृथ्वीराज को धमकी देना और निश्चित रूप से, इंटरवल प्वाइंट । सेकेंड हाफ़ में, वह क्लाइमेक्स के एक ब्रीफ़ रूप में अच्छे से काम करते है और यहां तीन दृश्य समानांतर चल रहे हैं - एक अशोक का, दूसरा अमृता का और तीसरा कल्कि का । यदि उन्होंने समझदारी से निर्देशन किया होता, तो साहो आज उच्च स्तर की फ़िल्म होती ।
साहो की शुरूआत काफ़ी औसत स्तर की होती है । शुरूआत में देने के लिए बहुत सी जानकारी है और ये देने में ही काफ़ी समय चला जाता है । फ़िल्म अशोक की एंट्री से बेहतर लगती है । अशोक और उनकी टीम द्वारा की गई जांच-पड़ताल काफी बांधे रखने वाली है । इसके अलावा, युद्ध में गुटबाजी के बीच वाजी में खेली गई राजनीति देखने लायक है । हालांकि फ़िल्म का बेस्ट सीन इंटरवल से ठीक पहले के लिए रिजर्व है । काल्कि की कार पर हमला करने वाला सीन अच्छा है । इंटरमिशन प्वाइंट एक झटके के रूप में आता है । हालांकि इसका एक हिस्सा अनुमानित है लेकिन यहां इतने सारे टर्न एंड ट्विस्ट हैं कि यह दर्शकों को अप्रत्याशित घटनाक्रमों के लिए जिज्ञासु छोड़ता है । इंटरवल के बाद, दर्शकों को लगता है कि फ़िल्म एक अलग लेवल पर चली जाएगी, लेकिन दुख की बात है कि, इसके बिल्कुल विपरीत होता है । यहां इतनी अराजकता है कि फ़िल्म को समझना मुश्किल हो जाता है । हां एक्शन सीन अव्वल दर्जे के हैं कि लेकिन एक समय बाद दर्शक एक्शन से भी बोर हो जाते है । क्लाइमेक्स में कई ट्विस्ट हैं लेकिन अफ़सोस दर्शक यहां भी प्रभावित नहीं होते ।
अभिनय की बात करें तो, प्रभास पूरी फ़िल्म में छा जाते है । अपने किरदार के अनुसार वह शानदार परफ़ोरमेंस देते हैं और दर्शकों द्दारा पसंद भी किए जाएंगे । हालांकि हिंदी में उनकी डायलॉग डिलीवरी थोड़ी कमजोर लगती है । इसके अलावा उनका चरित्र चित्रण भी थोड़ा दोषपूर्ण है-पूरी फ़िल्म के दौरान उनका किरदार हमेशा जीतता है और दुश्मनों से आगे रहता है । शुरूआत में यह अच्छा लगता है लेकिन फ़िर समझ के परे लगने लगता है । श्रद्धा कपूर काफी प्यारी लगती हैं और 'नो-नोंसेंस अधिकारी के किरदार को बखूबी निभाती है । एक्शन सीन में वह छा जाती है । जैकी श्रॉफ़ अपने कैमियो में अमिट प्रभाव छोड़ते है । निल नितिन मुकेश काफ़ी भरोसेमंद और डेशिंग लगते है । बेगम जान के बाद एक बार फ़िर चंकी पांडे का विलेन अवतार देखने को मिलता है जो सटीक बैठता है । अरुण विजय अपने रोल में जंचते है । मुरली शर्मा (डेविड) अपनी अहम भूमिका बखूबी निभाते हैं । मंदिरा बेदी एक यादगार प्रदर्शन देती हैं । टीनू आनंद के पास एक भी संवाद नहीं है और फिर भी वह अच्छा प्रदर्शन देते है । महेश मांजरेकर (राजकुमार), प्रकाश बेलावादी (शिंदे) और वेनेला किशोर (वेनेला किशोर) अपने रोल में जंचते हैं । एवलिन शर्मा (आइशा) अपने किरदार के अनुरूप है लेकिन उनके किरदार में ज्यादा करने के लिए कुछ है नहीं । स्पेशल गाने में जैकलीन फर्नांडीज अपने जलवे बिखेरने में कामयाब होती हैं ।
फ़िल्म का म्यूजिक औसत दर्जे का है । 'साइको सैंया, जिसे बदलकर 'काईको सैंया' कर दिया गया, सभी गानों में सबसे बेहतर है । इसे बहुत ही अच्छी तरह से शूट और कॉरियोग्राफ़ किया गया है । 'इनी सोनी' और 'बेबी वॉंट यू टेल मी' कहानी में जबरन जोड़े गए लगते है । 'बेड बॉय' देखने में बहुत सुंदर लगता है । घिबरन का बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा लाउड है । कुछ स्थानों पर, यह डायलॉग्स को कमजोर कर देता है । राजू सुंदरम और वैभवी मर्चेंट की कोरियोग्राफी पहली उत्तम दर्जे की है ।
मैडी की सिनेमैटोग्राफी मनोरम है । कुछ दृश्यों को अच्छे से कैप्चर किया गया है । कैमरामैन ने मुंबई के बर्ड आई व्यू को खूबसूरती से कैप्चर किया है । केनी बेट्स, पेंग झांग, बॉब ब्राउन, स्टीफन रिक्टर, धिलप शुब्बारायण, राम लक्ष्मण, स्टंट सिल्वा, परवेज शेख और स्टंट जशवा के एक्शन बेहतरीन है जब व्यक्तिगत रूप से देखे जाते हैं । लेकिन फिल्म में, उनमें से कुछ अनावश्यक लगते हैं । कुछ दृश्य जो अच्छी तरह से काम करते हैं, वे हैं मुंबई ट्रैफ़िक स्क्रफ़ल (स्टंट सिल्वा द्वारा), प्रभास की एंट्री (पेंग झांग द्वारा) और क्लाइमेक्स से पहले के चेज सीन (केनी बेट्स) ।
साबू सिरिल का प्रोडक्शन डिजाइन महत्वाकांक्षी और लार्जर देन लाइफ़ है, खासकर वाजी शहर के हिस्से के दौरान । लेकिन यह प्रामाणिक नहीं लगता है । आर सी कमलाकन्नन के वीएफएक्स इसे वास्तविक बनाने में मदद कर सकते थे, लेकिन यह भी कई जगह नाकाम रहते है । थोटा विजय शंकर और लेपाक्षी एलावादी की वेशभूषा अपील कर रही है, विशेष रूप से प्रभास, श्रद्धा कपूर और गाने में जैकलीन फर्नांडीज द्वारा पहनी गई । ए श्रीकर प्रसाद का संपादन उथल-पुथल भरा है जबकि यह और ज्यादा सरल हो सकती थी ।
कुल मिलाकर, साहो कमजोर स्क्रिप्ट और नीरस पटकथा से ग्रस्त फ़िल्म है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म, अपनी जबरदस्त शुरूआत, लंबे वीकेंड व लीड एक्टर्स की जबरदस्त फ़ैन फ़ोलोइंग के चलते अच्छा बिजनेस करने में कामयाब होगी लेकिन फ़िर वीकेंड के बाद इसे काफ़ी संघर्ष करना पड़ेगा ।
















