/00:00 00:00

Listen to the Amazon Alexa summary of the article here

पिछले कुछ वर्षों से, बॉलीवुड में एजेंट विनोद [2012], फैंटम [2015], बेबी [2015], बैंग बैंग [2014], एक था टाइगर [2012], टाइगर जिंदा है [2017], डी-डे [ 2013] इत्यादि, जैसी कुछ बहुत ही रोमांचक जासूसी फिल्में देखने को मिली है । इनमे में से अधिकतर फ़िल्मों में महिला जासूस ने लीड रोल निभाया । इसका जीता-जागता उदाहरण है कैटरीना कैफ़ जिसने टाइगर सीरिज में एक जबरदस्त महिला जासूस का किरदार अदा किया । लेकिन एक सलवार कमीज पहनने वाली, लंबे बालो वाली पूरी तरह से महिलावादी, महिला का जासूस किरदार निभाना वाकई अकल्पनीय है । अनिल शर्मा ने कुछ-कुछ इस तरह का किरदार बनाने की कोशिश की थी अपनी फ़िल्म द हीरो ; लव स्टोरी ऑफ़ स्पाई [2003] में । और अब एक बार फ़िर मेघना गुलजार ने अपनी फ़िल्म, राज़ी के साथ एक ऐसे ही किरदार को बनाने की कोशिश की है । तो क्या यह फ़िल्म अन्य जासूसी फ़िल्मों की तरह दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होती है या यह अपने प्रयासों में नाकाम होती है ? आइए समीक्षा करते है ।

फ़िल्म समीक्षा : राज़ीराज़ी, एक ऐसी भारतीय लड़की की कहानी है जो पाकिस्तान एक अंडरकवर एजेंट के रूप में भेजी जाती है । यह साल 1971 है । पाकिस्तान भारत पर एक सरप्राइज हमला करने की तैयारी कर रहा है और भारतीय खुफिया एजेंसी इस बारें में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे है । हिदायत (रजत कपूर) श्रीनगर में रहता है और व्यापार के लिए पाकिस्तान यात्रा करता है । वह भारतीय खुफिया एजेंसी का हिस्सा हैं लेकिन उसने पाकिस्तानी ब्रिगेडियर सैयद (शिशिर शर्मा) को आश्वस्त किया है कि वह उनके लिए काम करता है । हिदायत काफ़ी बीमार है इसलिए वह सैयद से पूछता है कि क्या वह उसकी बेटी सहमत (आलिया भट्ट) से अपने छोटे बेटे इकबाल (विक्की कौशल) से शादी कर सकता है । सैयद इसके लिए राजी हो जाती है और हैरानी की बात है कि सहमत भी इस शादी के लिए राजी हो जाती है । सहमत सैयद के घर इकबाल से शादी जासूसी करने के लिए राज़ी होती है । इस खतरनाक मिशन के लिए शादी से पहले भारतीय खुफिया एजेंसी के खालिद मीर (जयदीप अहलावत) से उसे पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाता है । सहमत इकबाल से शादी रचाने के बाद इकबाल, जो उसे किसी भी काम केलिए फ़ोर्स नहीं करता है और उसे उसके तरीके से रहने की इजाजत देता है, के करीब आ जाती है । इस बीच सहमत ने अपनी छानबीन शुरू करती है और उसके हाथ भारत के खिलाफ़ पाकिस्तान द्दारा रचाई गई खुफ़िया साजिश हाथ लगती है जिसमें भारतीय नौसेना पर हमला बोलने की प्लानिंग थी । हालांकि इस दौरान सहमत के सामने कई सारी चुनौतियां आती है और एक गलत कदम उसके लिए घातक साबित हो सकता है । लेकिन इसके बाद क्या होता है, यह पूरी फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

राज़ी, हरिदंर सिक्का के उपन्यास 'कॉलिंग सहमत' पर बेस्ड है । फ़िल्म की कहानी काफ़ी अनूठी है और बाकी की जासूसी फ़िल्मों से बेहतरीन है क्योंकि फ़िल्म का लीड केरेक्टर अपनी नैतिकता को ताक पर रखते हुए किसी भी हद तक जाती है । यह बहुत अच्छी तरह से सामने आती है । भवानी अय्यर और मेघना गुलजार की पटकथा विभिन्नता का मिश्रण है । ज्यादातर दृश्यों में, यह सरल और मनोरंजक है ।

राज़ी एक हाई-नोट पर शुरू नहीं होती है लेकिन फ़िर भी दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है । किरदार काफ़ी अच्छी तरह से स्थापित किए जाते है और सहमत का खतरनाक मिशन के लिए राज़ी हो जाना, विश्वासनीय नहीं हो सकता था । लेकिन शुक्र है ऐसा हुआ नहीं । सहमत के ट्रेनिंग सेशन सीन काफ़ी दिलचस्प हैं लेकिन जैसे ही ये फ़िल्म पाकिस्तान की ओर मुड़ती, यह और बेहतर हो जाती है । कुछ समय के लिए फ़िल्म फ़िसल जाती है, लेकिन इंटरमिशन के दौरान यह फ़िर से रफ़्तार पकड़ती है जब सहमत जीप चलाती है । तर्कसंगत रूप से यह फिल्म का सबसे अच्छा हिस्सा है । इंटरवल के बाद, फिल्म में कुछ आकर्षक क्षण हैं लेकिन साथ ही, फिल्म धीमी होने लगती है । इसमें धोखा-पीछा करने जैसे और कुछ सीन होने चाहिए थे, लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं होता है । जैसे, सहमत कई बार संदेह से बचने में कामयाब होती है, यह एकदम समझ के परे है । फ़िल्म के अंत में हालांकि एक हद तक कमी है । हालांकि कुछ दृश्य जटिल हो जाते हैं । उदाहरण के लिए, सहमत के प्रशिक्षण के दौरान खालिद द्वारा प्रदान किए गए कुछ विवरणों को संसाधित करना मुश्किल है क्योंकि इसे बहुत जल्दी प्रस्तुत किया जाता है । कुछ सीन में दिलचस्पी खत्म होती है । मेघना गुलजार के डायलॉग साधारण और साफ़ है जिन्हें बहुत ही कलात्मक रूप से लिखा गया है । मेघना गुलजार का निर्देशन प्रभावपूर्ण है । फ़िल्म का कंटेंट उत्तम होने के नाते, मेघना इसे कमर्शियल फ़ोरमेट में कहने की कोशिश करती है । वह कहीं-कहीं भटक सी जाती है लेकिन कुल मिलाकर, वह कहानी के साथ न्याय करती है ।

आलिया भट्ट बेहद शानदार प्रदर्शन करती है और निश्चितरूप से यह उनके बेहतरीन कामों में से एक है । आलिया का किरदार दोहरी जिंदगी जीता है और वह दोनों ही किरदारों को शानदार ढंग से बिना किसी कमी के अदा करती है । इमोशनल और टूट जाने वाले सीन में वह काफ़ी जंचती है । विक्की कौशल का स्क्रीन टाइम काफ़ी सीमित है लेकिन इसमें भी वह एक अमिट छाप छोड़ते है । उनका किरदार निश्चितरूप से पसंद किया जाता है । रजत कपूर काफ़ी प्यारे लगते है । जयदीप अहलावत अपने किरदार में बहुत अच्छे है । यह प्रतिभावान अभिनेता और अधिक फ़िल्मों में आने के हकदार है । जब वह सहमत के साथ बातचीत करते है लेकिन एकदम से उनका अपने जॉब के बारें में बात करना काफ़ी ध्यान देने योग्य है । अमृता खानविलकर (मुनीरा) प्यारी लगती है । आरिफ जकरिया (अब्दुल) मनोहर ढंग से अपनी दमदार भूमिका निभाते है । अश्वथ भट्ट (मेहबूब) की एक छोटी भूमिका है लेकिन प्रभावी है । सोनी रजदान (तेजी) अच्छी है । अन्य कलाकार अपने-अपने किरदार के साथ न्याय करते हैं ।

शंकर-एहसान-लॉय का संगीत मधुर है लेकिन 'ए वतन' को छोड़कर कुछ भी याद रखने योग्य नहीं है । यह गाना राष्ट्रगान की फ़ील देता है और काफ़ी लंबे समय तक देश में आजादी और गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान प्ले किया जा सकता है । शीर्षक ट्रैक ध्यान आकर्षित करता है जबकि 'दिलबरो' पूरी तरह से बैक ग्राउंड में प्ले किया जाता है ।

शंकर-एहसान-लॉय और टब्बी का बैक ग्राउंड स्कोर काफी उत्साहजनक है । जय आई पटेल का छायांकन बड़े स्तर पर काम करता है । कश्मीर के बाहरी शॉट लुभावने लगते हैं । नितिन बैड का संपादन अच्छा है लेकिन और अधिक शार्प होना चाहिए था । सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे का प्रोडक्शन डिजाइन बहुत प्रामाणिक है । मैक्सिमा बसु गोलानी की पोशाक काफ़ी आकर्षक हैं । हरपाल सिंह के एक्शन सूक्ष्म है और बहुत विस्तृत नहीं है ।

कुल मिलाकर, राज़ी एक दिलचस्प थ्रिलर फ़िल्म है जो मेघना गुलजार द्वारा शानदार ढंग से बनाई गई एक परिपक्व देखने लायक फ़िल्म है । यह एक ऐसी फिल्म है जो राष्ट्रवाद का जश्न मनाती है जो धर्म के रंगों से रहित है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म, सकारात्म मुंह जुबानी के चलते ग्रोथ करने की क्षमता रखती है और इसके मेकर्स को खुश करती है ।