जब से आयुष्मान खुराना ने साल 2012 में अपरांपरागत फ़िल्म विकी डोनर से अपने फ़िल्मी करियर की शुरूआत की, तब से वो ऐसी अपरांपरागत शैली की फ़िल्मों,जो टैबू विषय को दर्शाती है, के पोस्टर बॉय बन गए है,जो दर्शकों व सिनेप्रेमियों को खूब पसंद आता है । जहां आयुष्मान की पहली फ़िल्म स्पर्म डोनेशन को लेकर थी, वहीं उनकी पिछले साल रिलीज हुई फ़िल्म शुभ मंगल सावधान स्वप्नदोष जैसी समस्या को मजेदार ढंग से पर्दे पर दर्शाया था । और अब एक बार फ़िर आयुष्मान खुराना ऐसी ही एक अपरांपरागत शैली की फ़िल्म लेकर आए हैं, बधाई हो, जो बड़ी उम्र में गर्भधारण के बारें में बतलाती है । तो क्या बधाई हो, भी आयुष्मान की अन्य हिट फ़िल्मों की तरह दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी । आइए समीक्षा करते हैं ।

बधाई हो एक ऐसे परिवार की कहानी है जो असामान्य स्थिति का सामना करती है । नकुल कौशिक (आयुषमान खुराना) अपनी दादी (सुरेखा सीकरी), पिता जीतेन्द्र उर्फ जीतू (गजराज राव), मां प्रियंवदा (नीना गुप्ता), और छोटे भाई गुलर (शारदुल राणा) के साथ दिल्ली में रहता है । नकुल को अपनी सहकर्मी रेने (सान्या मल्होत्रा) से मोहब्बत होती है । एक दिन जीतू और प्रियंवदा इंटीमेट हो जाते हैं और फ़िर 19 हफ़्तों बाद प्रियंवदा गर्भवती हो जाती है । नकुल और गुलर के लिए यह खबर काफ़ी चौंकाने वाली होती है । प्रियंवदा इस बच्चे को गिरवाना भी चाहती हैं लेकिन डॉक्टर्स उन्हें कहते हैं कि उन्हें 3-4 दिनों में ही ऐसा करना होगा । लेकिन प्रियंवदा गर्भपात कराने की हालत में नहीं होती है इसलिए वह इस बच्चे को पैदा करने का फ़ैसला करती है । इसके बाद क्या होता है, यह बाकी फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।
अक्षत घिल्डियाल शांतनु श्रीवास्तव और ज्योति कपूर की कहानी बहुत ही सरल और संबंधित है । यह आश्चर्य की बात है कि किसी ने इस विषय पर फिल्म नहीं बनाई और लेखकों ने इसके साथ अच्छे तरीके से न्याय किया है । अक्षत घिल्डियाल की पटकथा थोड़ी सूक्ष्म है । यह कुछ सीन में फ़िल्म के खिलाफ़ चली जाती है लेकिन फ़िर तुरंत इसकी भरपाई कर लेती है । फ़िल्म में दिखाई गई हर एक स्थिती काफ़ी सटीक लगती है और इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो ओवर हो । अक्षत घिल्डियाल के डायलॉग्स बहुत मजेदार और हास्यास्पद हैं और उन्हें दर्शकों द्दारा खूब पसंद किया जाएगा । इसी के साथ दर्शकों के बीच भी ये काफ़ी लोकप्रिय होंगे ।
अमित शर्मा का निर्देशन अच्छा है लेकिन फ़र्स्ट हाफ़ में वह लड़खड़ा सा जाता है । इसके अलावा उन्हें रोमांटिक सीन को भी अच्छे से पेश करना चाहिए था । नकुल और रीना का ट्रेक, काफ़ी ठंडा है लेकिन वहीं बुजुर्ग कौशिक कपल व दादी लाइमलाइट चुरा ले जाती है । लेकिन सकारात्मक रूप से देखें तो पाएंगे कि, अमित शर्मा कई सारे सीन में इमोशंस को काफ़ी अच्छे से दर्शाते है । फिल्म में कुछ सबप्लॉट भी हैं और नकुल का गुलर के स्कूल में धौंस दिखाने जाना, अनचाहा लग सकता है । लेकिन यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समझाने में मदद करता है कि विभिन्न दर्जे की पीढ़ियां जीवन में इस प्रकार के विकास पर कैसी प्रतिक्रिया देती है ।
बधाई हो अपने ट्रेलर और प्रोमो के कारण कॉमेडी से भरी फ़िल्म लग सकती है, लेकिन ऐसा नहीं है । फ़नी मोमेंट्स फ़िल्म में निश्चितरूप से है लेकिन इसी के साथ इस फ़िल्म में इमोशनल और टचिंग पल की भरमार है । अपनी उम्मीदों को सही दिशा में रखें तो निश्चितरूप से आप इस फ़िल्म का एंजॉय कर पाएंगे । हालांकि,फिल्म की शुरुआत और किरदारों का परिचय थोड़ा कमजोर है । फ़िल्म रफ़्तार तभी पकड़ती है जब,कौशिक कपल अपने दोनों बेटों नकुल और गुलर को 'गुड न्यूज' के बारे में बतलाते हैं । इस मोड़ पर दादी का रिएक्शन निश्चितरूप से पसंद किया जाएगा । इसके बाद फ़िल्म थोड़ी सी फ़िसल जाती है और इंटरमिशन पॉइंट पर यह एक आर्टहाउस फिल्म की तरह दिखती है । सेकेंड हाफ़ में जहां से फ़िल्म सबसे ज्यादा आकर्षित करती है । मेरठ में दादी का गुस्सा प्रशंसा के काबिल है । नकुल की प्रतिक्रिया जब उसके माता-पिता मेरठ से लौटते हैं, काफ़ी बेशकीमती है । एक और सीन जो बहुत शानदार है वो है जब नकुल रीना की मां(शीबा चढ्ढा) से माफ़ी मांगता है । फाइनल सीन हालांकि फिल्म का सबसे अच्छा हिस्सा है और निश्चित रूप से दर्शक की आंखों को नम कर देगा ।
आयुष्मान खुराना जबरदस्त परफ़ोरमेंस देते हैं और फ़िल्म में वो देखने लायक है । चाहे वो सीन जहां वह एक अनाड़ी की तरह अभिनय कर रहे हों या वो सीन जहां वह नशे की एक्टिंग कर रहे हों,सब कुछ अव्वल दर्जे का है और वह हर सीन में छा जाते हैं । एक सीन जहां वह रीना की मां से माफ़ी मांगते हैं,वह निश्चितरूप से सभी का दिल जीत ले जाते है । सान्या मल्होत्रा काफ़ी अच्छी लगती है लेकिन उनकी स्क्रीन मौजूदगी काफ़ी कम है । नीना गुप्ता पूरी फ़िल्म की जान है और इसमें उन्होंने काफ़ी प्यारी और सटीक परफ़ोरमेंस दी है । कई सीन में वह अपनी आंखों और चुप्पी के साथ बहुत कुछ बयां कर जाती है । गजराज राव अपनी टॉप फ़ॉर्म में होते हैं और कई सीन में सारी लाइमलाइट चुरा ले जाते है । वह फ़िल्म में दूसरे लीड हीरो की तरह लगते है और काफ़ी योग्यता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं । सुरेखा सीकरी अपने रोल में हर सीन में छा जाती है और निश्चितरूप से वह अपने कई सीन में तालियों और सिटियों की हकदार होंगी । शार्दुल राणा एक शानदार प्रदर्शन देते हैं और सेकेंड हाफ़ में आयुष्मान के साथ उनका एक सीन उल्लेखनीय है । शीबा चड्डा एक छोटी भूमिका में जबरदस्त प्रभाव डालती है । वह अपनी खामोशी के माध्यम से बहुत कुछ कह जाती है । अन्य कलाकार अपने-अपने रोल में काफ़ी जंचते है ।
फ़िल्म के संगीत की बात करें तो, 'बधाईयां तेनु' सभी गानों में सबसे बेहतर है और काफ़ि आकर्षित करता है । 'साजन बड़े सेंटी' औसत है लेकिन इसे काफ़ी अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया गया है । 'नैना न जोड़ें" काफ़ी दिल को छू लेने वाला है लेकिन उतना असर नहीं डालता है, रोमांटिक गाना इतना मजबूत नहीं है । 'मोरनी बनके' अंत क्रेडिट में प्ले होता है और ठीक है । अभिषेक अरोड़ा का पृष्ठभूमि स्कोर मनोरंजक है जो शरारतभरा खिंचाव रखता है,और यह फ़िल्म के एकदम अनुरूप है ।
सानू जॉन का छायांकन उपयुक्त है । राठेश यूके का प्रोडक्शन डिजाइन उत्तम कोटी का है । कौशिक का घर देखने में एकदम प्रामाणिक दिखता है । कीर्ति कोलवाँकर और मारिया थारकान की वेशभूषा विशेष रूप से प्रमुख जोड़े द्वारा पहनी हुई,आकर्षित करती है । देव राव जाधव का संपादन कुछ स्थानों पर क्रिस्पी हो सकता था ।
कुल मिलाकर, बधाई हो कॉमेडी से भरी फ़िल्म नहीं है लेकिन ये भावनाओं के साथ एक पारिवारिक मनोरंजक फ़िल्म बनकर उभरती है । यह फ़िल्म आपके चेहरे पर स्माइल लेकर आती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म विस्तारित वीकेंड के फ़ायदे के चलते बड़ी संख्या में परिवारों को आकर्षित करेगी । निश्चितरूप से फ़िल्म के मेकर्स और निवेशकों के लिए यह 'बधाई हो' कहने का समय है ।
















