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निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव ने अपने निर्देशन की पहली फिल्म टर्निंग 30 [2011] के साथ भले ही अपनी छाप न छोड़ी हो लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म लिपस्टिक अंडर माइ बुर्का ने एक बेहतरीन निर्देशक की श्रेणी में खड़ा कर दिया । और अब अलंकृता श्रीवास्तव एक बार फ़िर महिला केंद्रित फ़िल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें लेकर आई हैं जो ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर आज रिलीज हुई है । तो क्या डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाती है । आइए समीक्षा करते हैं ।

Movie Review: कैसी है कोंकणा और भूमि की फ़िल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें, यहां जानें

डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें की कहानी दो चचेरी बहनों की कहानी है जो एक उभरते शहर में खुद को सेट करने की कोशिश करती हैं । राधा उर्फ डॉली (कोंकणा सेनशर्मा) की शादी अमित (आमिर बशीर) से हुई और उसके दो बच्चे हैं - पप्पू (कल्पना सिंह) और भरत (हार्दिक सिंह)। डॉली और अमित ने एक निर्माणाधीन इमारत में एक फ्लैट में निवेश किया है । लेकिन इसके बाद उन्हें पैसों की कमी महसूस होती है । डॉली अपने ऑफ़िस के बैंक अकाउंट से गलत तरीके से किसी न किसी तरह से पैसा अरेंज कर लेती है । इसी बीच, शादी से बचने के लिए डॉली की चचेरी बहन, काजल (भूमि पेडनेकर) दरभंगा में अपने घर से भाग कर डॉली के घर आ जाती है । एक अच्छी नौकरी पाने में असफल होने के बाद, डॉली के पास फ्रेंडशिप क्लब के कॉल सेंटर में रोजगार पाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है । यहाँ, उसका नाम किट्टी हो जाता है । अमित द्वारा अनुचित तरीके से छूने के बाद काजल डॉली के घर से भी चली जाती है । इसके बाद काजल की जिंदगी में कई लोग आते हैं और फ़िल्म आगे बढ़ती है । इसके बाद आगे क्या होता है यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

अलंकृता श्रीवास्तव की कहानी अच्छी है । पितृसत्ता और हमारे समाज में विद्यमान विचारधारा पर टिप्पणी करने का प्रयास प्रशंसनीय है । लेकिन अलंकृता श्रीवास्तव की पटकथा कथानक के साथ न्याय नहीं करती है। लेखन में कोई उचित प्रवाह नहीं है और फिल्म में कहीं से भी कुछ भी हो जाता है । इसके अलावा, बहुत सारे सबप्लॉट हैं और उनमें से कोई भी प्रभावित नहीं करता हैं । इसके अलावा, कुछ प्लॉट का तो कोई लॉजिक ही नहीं है । अलंकृता श्रीवास्तव के संवाद तीखे और सटीक हैं ।

अलंकृता श्रीवास्तव का निर्देशन औसत है । उनकी फ़िल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का में जो उनका निर्देशन नजर आया था, यह उसके आसपास भी नहीं है । इसकी वजह स्क्रिप्ट हो सकती है । कुछ सीन वाकई प्रभाव छोडते हैं इसके अलावा इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट वॉटरटाइट नहीं है । फिल्म के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि अलंकृता इस फिल्म को जितना संभव हो उतना निंदनीय बनाने की बहुत कोशिश करती है । फिल्म में लगभग हर कोई अपने तरीके से अपनी लाइफ़ जी रहा है । फ़िल्म का लगभग हर किरदार दोहरी जिंदगी जीता है जो पचा पाना मुश्किल होता है । इसके अलावा फ़िल्म में राजनीतिक एंगल है भी जिससे चीजें समझ के परे लगती है ।

डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें की शुरूआत दिलचस्प तरीके से होती है और और कुछ ही समय में, हम डॉली और किट्टी के किरदारों और उनके आपसी रिश्ते से परिचित हो जाते हैं । फ़र्स्ट हाफ़ काफ़ी बिखरा हुआ सा लगता है लेकिन किसी को भी इसे लेकर इसलिए कोई शिकायत नहीं होगी क्योंकि उन्हें लगता है कि निर्देशक फ़िल्म की कहानी को सेट करने की कोशिश कर रहे हैं । लेकिन सेकेंड हाफ़ में भी जब ये बिखरापन जारी रहता है तब फ़िल्म से दिलचस्पी जाने लगती है । लेकिन वहीं इस फ़िल्म में कुछ अच्छे सीन भी हैं जैसे- कि्ट्टी का कॉल सेंटर में पहला दिन, डॉली का अपनी मां के साथ सामना, पुलिस स्टेशन में हुआ ड्रामा जैसे कुछ सीन काफ़ी मजेदार हैं । क्लाइमेक्स को लेकर उम्मीद बढ़ जाती है लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है इसे पचा पाना मुश्किल सा होता जाता है । फिल्म के सभी मुख्य पात्रों को एक साथ देखना, उनमें से कुछ अलग-अलग शहरों या कस्बों के कुछ हिस्सों से, एक ही स्थान पर इकट्ठे होना हँसने योग्य है । अगर यह प्रियदर्शन फिल्म होती, तो भी यह समझ में भी आती। लेकिन इस तरह एक यथार्थवादी फिल्म में, यह बहुत ज्यादा है । फिल्म का अंतिम दृश्य अच्छा है लेकिन प्रभाव को बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है ।

Movie Review: कैसी है कोंकणा और भूमि की फ़िल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें, यहां जानें

अभिनय की बात करें तो, इस फ़िल्म को अभिनय की बदौलत देखा जा सकता है । कोंकणा सेन शर्मा हमेशा की तरह शानदार प्रदर्शन देती हैं और अपने किरदार में समा जाती हैं । भूमि पेडनेकर अपना बेहतरीन प्रदर्शन देती हैं और एक अमिट छाप छोड़ती हैं । आमिर बशीर भरोसेमंद हैं । अमोल पाराशर प्यार लगते हैं जबकि विक्रांत मैसी सपोर्टिंग रोल में जंचते हैं । कुबरा सेठ अपने किरदार में जंचती हैं । करण कुंद्रा छोटे से रोल में जंचते हैं । कल्प शाह की एक चुनौतीपूर्ण भूमिका है, लेकिन इसे अच्छी तरह से निभाते हैं । हार्दिक सिंह के पास करने के लिए कुछ ज्यादा नहीं है । नीलिमा अज़ीम उत्कृष्ट है, हालांकि वह सिर्फ एक दृश्य में दिखाई देती है । पावलीन गुजराल, प्रभात रघुनंदन (बिल्ला), घनश्याम पांडे (शाहनवाज प्रधान), नूतन सूर्या (कॉल सेंटर में नैंसी; वृद्ध-वृद्ध कर्मचारी) और बृजभूषण शुक्ला (प्रॉपर्टी ब्रोकर) ठीक हैं ।

गीत भूलने योग्य हैं । 'ख्वाबीदा' थोड़ा याद रहता है जबकि 'नीट वे', 'बीमारी' और 'रैप बैटल' प्रभावित करने में विफल रहते है । मंगेश धाकड़ का बैकग्राउंड स्कोर सूक्ष्म और प्रभावी है । जॉन जैकब पेयापल्ली की सिनेमैटोग्राफी साफ सुथरी और अच्छे से की गई है । टीया तेजपाल का प्रोडक्शन डिजाइन यथार्थवादी है और फिल्म की सेटिंग के अनुरूप है । रोहित चतुर्वेदी की वेशभूषा के लिए भी फिल्म के अनुरूप है । चारु श्री रॉय का संपादन ठीक है लेकिन कई जगहों पर तेज लगता है ।

कुल मिलाकर, डॉली किट्टी और वो चमकते सितारें में एक महत्वपूर्ण संदेश है लेकिन कहानी का जबरदस्ती बढ़ाचढ़ा कर राजनीतिकरण करने से फ़िल्म का प्रभाव कम हो जाता है । इसका एक कारण ये हो सकता है कि शायद ऐसा करने से यह फ़िल्म चर्चा का विषय बन जाती ।