फ़िल्म :- बागी 4
कलाकार :- टाइगर श्रॉफ, संजय दत्त, हरनाज़ संधू, सोनम बाजवा
निर्देशक :- ए हर्ष
रेटिंग :- 3/5

संक्षिप्त में बागी 4का प्लॉट :-
बागी 4 की कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसका अतीत रहस्यों से भरा हुआ है। नौसेना अधिकारी रणवीर प्रताप सिंह उर्फ रॉनी (टाइगर श्रॉफ) एक भयानक कार हादसे का शिकार हो जाता है। सात महीने तक कोमा में रहने के बाद जब वह ठीक होता है, तो उसका भाई जीतू (श्रेयस तलपड़े) उसकी देखभाल करता है । लेकिन जल्द ही जीतू समझ जाता है कि रॉनी अजीब व्यवहार करने लगा है। रॉनी का दावा है कि वह अलिशा (हरनाज़ संधू) नाम की एक लड़की से प्यार करता था और उसकी मौत उसके एक्सीडेंट से पहले हो चुकी है। हालांकि, जीतू और उसके आस-पास के लोग इसे उसकी कल्पना मानते हैं। रॉनी पूरी कोशिश करता है कि वह सबको सच साबित कर सके, लेकिन उसके प्रयास बेकार जाते हैं। तभी एक दिन उसे एक ऐसा चौंकाने वाला सच पता चलता है, जो उसकी ज़िंदगी को पूरी तरह हिला कर रख देता है। आगे की कहानी इसी रहस्य पर आधारित है।
बागी 4 मूवी स्टोरी रिव्यू
साजिद नाडियाडवाला की कहानी में काफ़ी दम है। उनकी लिखी पटकथा (जिसमें रजत अरोड़ा का अतिरिक्त योगदान है) शुरूआत में दिलचस्प लगती है, लेकिन कुछ समय बाद अपनी पकड़ खो देती है। वहीं, रजत अरोड़ा के डायलॉग्स फिल्म की ख़ासियत साबित होते हैं।
ए. हर्षा का निर्देशन ठीक-ठाक कहा जा सकता है। क्रेडिट उन्हें इस बात का जाता है कि फिल्म का पहला हिस्सा बेहद एंगेजिंग है। जिस तरह से रॉनी के आस-पास के लोग उसे यह यक़ीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह पागल हो चुका है, वह हिस्सा देखने लायक बन पड़ता है। इसके साथ फिल्म में डाला गया ह्यूमर भी मज़ा बढ़ा देता है। इंटरवल प्वाइंट रोमांचक है और सेकेंड हाफ के लिए अच्छा माहौल तैयार करता है।
लेकिन जैसे ही विलेन के इरादों का सच सामने आता है, फिल्म ऑफ़ ट्रेक चली जाती है। मेकर्स ने भले ही कहानी को अनप्रेडिक्टेबल बनाने की कोशिश की हो, लेकिन लेखन गड़बड़ा जाता है। क्लाइमैक्स बेतुका है और दर्शकों को कोई खास असर नहीं छोड़ता। इसके अलावा, फिल्म में कई जगह एनिमल, पुष्पा, पठान और यहां तक कि KGF जैसी फिल्मों की झलक देखने को मिलती है। अंत में, फिल्म में गानों की भी अनावश्यक भरमार है।
परफॉरमेंस :-
टाइगर श्रॉफ ने इस फिल्म में बेहद चुनौतीपूर्ण अभिनय किया है और वे शानदार तरीके से सफल भी होते हैं। एक्शन सीक्वेंस में तो वे हमेशा की तरह छा जाते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने इमोशनल दृश्यों में भी अच्छा काम किया है। संजय दत्त की एंट्री देर से होती है और उनका स्क्रीन टाइम भी सीमित है, लेकिन अपने अभिनय से वे इस कमी को पूरा कर देते हैं। हरनाज़ संधू ने आत्मविश्वास से भरी डेब्यू परफॉर्मेंस दी है। वहीं सोनम बाजवा (प्रतिष्ठा) फिल्म की बड़ी सरप्राइज़ पैकेज साबित होती हैं। श्रेयस तलपड़े ने बढ़िया सपोर्टिंग रोल निभाया है। उपेंद्र लिमये एक बार फिर अपने दमदार अभिनय से सीन चुरा ले जाते हैं। वहीं सौरभ सचदेवा (पाउलो) हमेशा की तरह भरोसेमंद नज़र आते हैं।
बागी 4 का म्यूज़िक और टेक्निकल पहलू :-
फिल्म के गाने ठीक-ठाक हैं। इनमें ‘मरजाना’ सबसे बेहतरीन है, इसके बाद ‘गेट रेडी टू फाइट – खौफ है’, ‘मार मार’, ‘रोना सिखा दिया’ और ‘तेरा ख्याल’ आते हैं। वहीं ‘अकेली लैला’ और ‘ये मेरा हुस्न’ ग्लैमर बढ़ाते हैं, लेकिन इन्हें सुनकर ‘ऊ अंटावा’ और ‘बेशरम रंग’ की याद आती है। अंकित-सचेत और श्रेय का बैकग्राउंड स्कोर जोशीला है।
स्वामी जे गौड़ा की सिनेमाटोग्राफी सलीकेदार है। व्वेनकट, केचा खामफाकडी, केविन कुमार और स्टन सिल्वा के एक्शन सीक्वेंस ज़रूरत से ज़्यादा खूनखराबे वाले हैं। तन्वी लीना पाटिल का प्रोडक्शन डिज़ाइन भव्य है। अकी नरुला, रुशि शर्मा, मनोशी नाथ, नवीन शेट्टी, चेतना रावत, मनीष मल्होत्रा और आशीष शर्मा के डिज़ाइन किए गए कॉस्ट्यूम्स बेहद ग्लैमरस नज़र आते हैं। किरण गौड़ा और नितिन FCP की एडिटिंग ठीक है, लेकिन फिल्म को 10-15 मिनट छोटी किया जाता तो बेहतर होता।
क्यों देंखे बागी 4 ?
कुल मिलाकर, बागी 4 के फर्स्ट हाफ़ में ज़बरदस्त एक्शन और दमदार ड्रामा है जिससे फ़िल्म इंप्रेस करती है । हालांकि सेकेंड हाफ़ पूरी तरह कमर्शियल ज़ोन में चला जाता है, जहां गानों और ओवरडोज़ इमोशंस पर ज़्यादा फोकस किया गया है । यह हिस्सा ज़्यादातर मास ऑडियंस को ध्यान में रखकर बनाया गया लगता है । बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की शुरुआत मज़बूत रहने की पूरी संभावना है, जिसका श्रेय इसके फ्रैंचाइज़ ब्रांड और स्टार पावर को जाता है। लेकिन फिल्म की लंबी पारी इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितना अच्छा वर्ड ऑफ माउथ मिलता है और दर्शक इसे दोबारा देखने लौटते हैं या नहीं।
















