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हम आज साल 2020 में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी ऐसे कई आपत्तिजनक मुद्दे हैं जो आज भी समाज में विद्यमान हैं । शिक्षा और तकनीकी के इस युग में भी महिलाओं के खिलाफ़ अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहे है । फ़िल्ममेकर अनुभव सिन्हा, जिन्होंने अपनी फ़िल्मों मुल्क [2018] से हिंदु-मुस्लिम एकता, आर्टिकल 15 [2019] से जातिवाद जैसे मुद्दे को उठाया था । और अब एक बार अनुभव सिन्हा लेकर आए हैं थप्पड़, जो महिलाओं पर होने वाली घरेलु हिंसा के मुद्दे को दर्शाती है । इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फ़िल्म थप्पड़ में तापसी पन्नू ने लीड रोल निभाया है । तो क्या थप्पड़ अनुभव सिन्हा की पिछली दो फ़िल्मों की तरह दर्शकों को झकझोरने में कामयाब होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।

Thappad Movie Review: तापसी पन्नू के दमदार अभिनय से सजी थप्पड़ घरेलू हिंसा पर जोरदार तमाचा है

थप्पड़ एक ऐसी महिला की कहानी है जो अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ती है । अमृता (तापसी पन्नू) एक गृहिणी है और अपने पति विक्रम (पावेल गुलाटी) के साथ हंसी-खुशी दिल्ली में रहती है । विक्रम एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करता है और एक ऐसे अवसर की तलाश में है जो उसे काम के सिलसिले में लंदन भेज दे । अमृता को पता है कि विक्रम के लिए यह कितना मायने रखता है । वह उसका सपना पूरा करने के लिए उसका साथ देती है और उसकी पूरी जिंदगी उसके और विक्रम की मां सुलोचना (तन्वी आज़मी) के इर्द-गिर्द घूमती है । फ़ाइनली विक्रम का सपना पूरा होने जा रहा है और वह लंदन जाने के लिए सलेक्ट हो गया है । और उसी रात वह एक पार्टी आयोजित करता है अपने घर पर । सब कुछ ठीक चल रहा होता है तभी इसे उसके सीनियर, थापर का कॉल आ जाता है । वह विक्रम को सूचित करता है कि उसे वह वांछित प्रोफ़ाइल नहीं मिल रही है जिसकी वह लंदन में तलाश कर रहा है और उसे वहां एक प्राधिकरण को रिपोर्ट करना होगा । ये सुनकर विक्रम परेशान हो जाता है । और अमृता उसे संभालने की कोशिश करती है तभी विक्रम अमृता को थप्पड़ मार देता है । वह इसे भूलाने की कोशिश करती है लेकिन वह कर नहीं पाती है । विक्रम को भी अफ़सोस होता है जब उसे पता चलता है कि अमृता का उसकी इस हरकत पर दिल टूट गया है । वह उसे मनाने की बहुत कोशिश करता है लेकिन कुछ भी काम नहीं करता है । नाराज होकर अमृता अपने माता-पिता (कुमुद मिश्रा और रत्ना पाठक शाह) के घर चली जाती है । विक्रम उसे रोकता है और बाद में उसे वापस लेने भी आता है । लेकिन वह नहीं मानती । विक्रम फिर उसे एक कानूनी नोटिस भेजता है । अमृता के भाई करण (अंकुर राथे) की प्रेमिका स्वाति (नैला ग्रेवाल) बताती हैं कि अमृता को यह पत्र एक प्रतिष्ठित वकील और स्वाति के बॉस नीथरा (माया सराओ) को दिखाना चाहिए । नेत्रा का सुझाव है कि अमृता को इस मुद्दे को सौहार्दपूर्वक हल करना चाहिए । अमृता तलाक पर जोर देती है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

अनुभव सुशीला सिन्हा और मृण्मयी लगू वकुल की कहानी शानदार और सराहनीय है । एक ऐसे समाज में जहां पति द्वारा पत्नियों पर की गई हिंसा का दोहराव काफी हद तक आम बात है, इसके लिए हिम्मत चाहिए कि वह एक ऐसी फिल्म लेकर आए हैं, जहां महिला को सिर्फ एक बार पति द्वारा मारा गया लेकिन उसने इसे हल्के में नहीं लिया । अनुभव सुशीला सिन्हा और मृण्मयी लगू वकुल की पटकथा (स्क्रिप्ट सलाहकार: अंजुम राजाबली) यह सुनिश्चित करने में बहुत मदद करती है कि दर्शकों को टीम का ये विजन समझ आए । वे बहुत अच्छी तरह से इस स्थिती को समझते हैं कि न केवल पुरुष बल्कि महिलाओं के दिमाग में भी गहराई पितृसत्ता बैठ गई है । अनुभव सुशीला सिन्हा और मृण्मयी लगू वीकुल के डायलॉग्स बहुत तेज हैं और फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाते है । इसमें बहुत सारे वन-लाइनर्स हैं जो निश्चित रूप से दर्शकों को हिट करेंगे और उन्हें अपने स्वयं के गलत कामों पर प्रतिबिंबित करेंगे ।

अनुभव सुशीला सिन्हा का निर्देशन शानदार है । उन्होंने न सिर्फ एक बेहतरीन स्क्रिप्ट लिखी है, बल्कि उन्होंने इसे बहुत अच्छे से हैंडल भी किया है । मुल्क और आर्टिकल 15 की तुलना में इस फ़िल्म का मूड और दुनिया सब कुछ अलग है और वह इसे अच्छे से समझती है और पूरी तरह से न्याय करती है । अमृता की दुर्दशा को अच्छी तरह से स्थापित किया जाता है । यहां कई सारे सब-प्लॉट्स हैं जिन्हें अच्छे से गूंथा गया है और फ़िल्म की मूल कहानी से मेल खाते है । कुछ दृश्य बहुत ही अच्छे हैं जैसे, शिवानी (दीया मिर्जा) का अमृता को गले लगाना,सुलोचना का थप्पड़ को इग्नोर करना और इस बात पर जोर देना कि अमृता को मेहमानों के साथ घुलना मिलना चाहिए, अमृता के पिता का स्वाति के साथ दुर्व्यवहार के लिए अपने बेटे को डांटना, अमृता की मां संध्या को अपने गायन करियर को जारी रखने के लिए समर्थन का नहीं मिलना, वकीलों आदि के बीच टकराव इत्यादि । वहीं इसके विपरीत, सेकेंड हाफ़ थोड़ा खींचा हुआ सा लगता है । मेकर्स को सुलोचना के ट्रैक को अलग कर देना चाहिए था । इसके अतिरिक्त, वे अपने पति को धोखा देने वाले वकील का ट्रैक ठीक कर सकते थे । दर्शकों को ये पचाना थोड़ा मुश्किल होगा कि, विक्रम इतना होने पर भी अमृता से माफ़ी नहीं मांगता है । यह देखना हैरानी भरा है कि, उनके विक्रम के आस-पास जितने भी लोग है उन्होंने भी उसे माफ़ी मांगने के लिए नहीं कहा । केवल क्लाइमेक्स से पहले उसके सामने ये मुद्दा उठाया जाता है ।

थप्पड़ की शुरूआत काफ़ी प्रभावशाली होती है जहां सभी सहायक किरदारों को पेश किया जाता है और उनके बीच एक आईसक्रीम की समानता है । अमृता का परिचय बेहद शानदार है । यह निशिकांत कामत की क्लासिक मराठी फिल्म डोंबिवली फ़ास्ट [2004] जैसा फ़ील देती है लेकिन यह अच्छा काम करता है । फ़िल्म का सबसे हाईप्वाइंट है पार्टी सीक्वंस, खासकर थप्पड़ । इस सीन के बाद, लगता है कि फ़िल्म धीमी हो रही है ये सब सीन बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह दिखाता है कि एक थप्पड़ के बाद अमृता का जीवन किस तरह बदल गया । इंटरमिशन प्वाइंट अच्छा है । इंटरवल के बाद, दिलचस्पी बरकरार रहती है लेकिन यहां से फ़िल्म खिंचने लगती है । पार्टी सीन के बाद कुछ धमाका होने की उम्मीद होती है लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं होता है । टकराव फ़िल्म के प्लॉट और मूड के साथ सिंक होता है, खासकर, लेकिन ये हल्का लग सकता है । फ़िल्म एक उचित नोट पर खत्म होती है ।

थप्पड़ यूं तो कई कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से सजी फ़िल्म है लेकिन बिना किसी संदेह के यह तापसी पन्नू की फ़िल्म है । तापसी पन्नू ने कई यादगार बेहतरीन परफ़ोर्मेंस दी है लेकिन निश्चित रूप से यह उनके सबसे शानदार अभिनय में से एक होगा । वह अपने किरदार में पूरी तरह घुस जाती है जिसे देखकर दर्शक उनके पहले के किरदारों को पूरी तरह भूल जाते है । जब आप उन्हें एक गृहणि के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए देखते हैं तो आप भूल जाते हैं कि यह तापसी है । पावेल गुलाटी अपना शानदार डेब्यू करते है । वह काफ़ी डेशिंग लगते हैं और अपने किरदार को बखूबी निभाते है । कुमुद मिश्रा बहुत ही शानदार लगती है । अनुभव सिन्हा ने हमेशा से ही उनसे बेहतरीन परफ़ोर्मेंस निकलवाया है और थप्पड़ भी कोई अपवाद नहीं है । रत्ना पाठक ठीक है और अपना प्रभाव छोड़ती है । तन्वी आज़मी भी अपने किरदार के साथ न्याय करती है और फ़िनाले में उनके डायलॉग देखने लायक है । माया सराओ प्रतिभा की धनी है और उनका अभिनय इसमें देखने लायक है । वह शानदार अभिनय करती हैं खासकर आनी बॉडी लैंग्वेज से । गीतिका विद्या (सुनीता) को एक यादगार भूमिका निभाने को मिलती है और वह उसे बखूबी निभाती है । दिया मिर्ज़ा का स्क्रिन टाइम सीमित है लेकिन वह इसे भी बखूबी निभाती है । ग्रेसी गोस्वामी (सानिया; शिवानी की बेटी) की एक अच्छी स्क्रीन उपस्थिति है और वह इसे अच्छे से निभाती है । नैला ग्रेवाल, मानव कौल (रोहित जयसिंह), राम कपूर (एडवोकेट गुजराल) और अंकुर राथे अच्छे हैं । हर्ष ए सिंह (थापर), संतनु घटक (विक्रम के सहयोगी सुबोध), रोहन खुराना (नीथरा का प्रेम रुचि), सुशील दहिया (विक्रम के पिता), सिद्धन कर्णिक (विक्रम का भाई), निधि उत्तम (विक्रम की भाभी) और अन्य कलाकार अपना-अपना किरदार अच्छे से निभाते है ।

अनुराग दीपाली सैकिया के संगीत की कोई जगह नहीं है । हालांकि 'एक टुकड़ा धूप का' गाना अच्छा है । मंगेश उर्मिला धाकड़ का बैकग्राउंड स्कोर शानदार है । प्रारंभिक दृश्यों में एक जैज़ शैली का संगीत है जो एक अच्छा फ़ील देता है । सौमिक सरमिला मुखर्जी की सिनेमैटोग्राफी टॉप क्लास है । विशाखा विद्या कुल्लवर की वेशभूषा आकर्षक दिख रही है, विशेष रूप से पार्टी में तापसी द्वारा पहने जाने वाली साड़ी । ज्योतिका मीरपुरी आवरा का मेकअप और बाल फ़िल्म के अनुरूप है । निखिल क्षिप्रा कोवले का प्रोडक्शन डिजाइन अच्छा है । यशपा पुष्पा रामचंदानी का संपादन और कसा हुआ हो सकता था, लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने एक सराहनीय काम किया है ।

कुल मिलाकर, तापसी पन्नू के बेहतरीन अभिनय से सजी थप्पड़ महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और पितृसत्ता पर एक मजबूत टिप्पणी करती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म अपने लक्षित दर्शकों द्दारा खूब पसंद की जाएगी, खासकर महिलाओं द्दारा ।