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भारत के मध्ययुगीन और प्रारंभिक आधुनिक इतिहास के बहादुर योद्धाओं की शौर्यगाथाओं पर बॉलीवुड ने कई फ़िल्में बनाई है और दर्शकों ने इन्हें पसंद भी किया है । मणिकर्णिका-द क्वीन ऑफ़ झांसी, पानीपत जैसी हाल ही के समय में बनाई गई फ़िल्मों ने इतिहास के ऐसे पहलू को दर्शाया जिनके बारें में आज की पीढ़ी को बताना आवश्यक था । और अब इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है ऐसे मराठा यौद्धा की कहानी जिसकी शौर्य गाथा के बारें में शायद ही किसी को पता था । ओम राउत के निर्देशन में बनी अजय देवगन और सैफ़ अली खान अभिनीत तान्हाजी-द अनसंग वॉरियर इस शुक्रवार को रिलीज होने वाली ऐतिहासिक पीरियड ड्रामा फ़िल्म है । बेहतरीन स्टार कास्ट और बड़े पैमाने पर बनी यह भव्य फ़िल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।Tanhaji – The Unsung Warrior Movie Review: कंप्लीट एंटरटेनमेंट के साथ पैसा वसूल फ़िल्म है तान्हाजी

तान्हाजी- द अनसंग वॉरियर, भारत के महान योद्धाओं में से एक की वीर गाथा को दर्शाती है । यह साल 1664 है । छत्रपति शिवाजी महाराज (शरद केलकर) ने दक्कन क्षेत्र में सम्राट औरंगजेब (ल्यूक केनी) की अध्यक्षता में मुगलों को कड़ी टक्कर दी । हालांकि, जब मराठों के लिए चीजें कठिन हो जाती हैं, तो शिवाजी महाराज एक संधि पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लेते हैं । इस संधि के अनुसार, उन्होंने रणनीतिक कोंढाना किले सहित मुगलों को लगभग 23 किले सौंपे । कुछ साल बाद, छत्रपति शिवाजी महाराज ने कोंढाना को वापस लेने की इच्छा व्यक्त की । यह विशेष रूप से तब होता है जब उसे पता चलता है कि औरंगजेब ने किले पर नियंत्रण रखने के लिए एक दुष्ट सैन्य अधिकारी उदयभान राठौड़ (सैफ अली खान) को भेजा था । छत्रपति शिवाजी महाराज को पता चलता है कि उनके बहादुर सूबेदार तानाजी मालुसरे (अजय देवगन) किले को वापस पाने के लिए सबसे उपयुक्त आदमी हैं । लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस ऑपरेशन के बारे में तानाजी को भी बताने से मना कर दिया । ऐसा इसलिए क्योंकि तानाजी अपने बेटे की शादी में व्यस्त हैं । लेकिन तानाजी को योजना के बारे में पता चल जाता है । वह छत्रपति शिवाजी महाराज को किले को हासिल करने के लिए मना लेते है । महाराज भी राजी हो जाते हैं और अपने बेटे की शादी को रोककर रखते है । वह फिर योजना बनाना शुरू कर देते है कि कैसे किले को फिर से हासिल किया जाए । इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

प्रकाश कपाड़िया और ओम राउत की कहानी उत्कृष्ट और शोधपूर्ण है । यह भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण के बारे में बात करता है और साथ ही, इसमें पर्याप्त मनोरंजन और ड्रामा है । प्रकाश कपाड़िया और ओम राउत की पटकथा प्लॉट के साथ पूरा न्याय करती है । स्क्रिप्ट को दर्शकों के अनुसार बनाया गया है जिससे फ़िल्म में रूचि बनी रहती है । सेकेंड हाफ़ के मध्य में फ़िल्म थोड़ी बिखर जाती है । इसके अलावा, फ़र्स्ट हाफ में और अधिक हार्ड हिटिंग हो सकते थे । प्रकाश कपाड़िया के संवाद सरल हैं लेकिन आवश्यकता के अनुसार तीखे भी हैं ।

ओम राउत का निर्देशन काफी सराहनीय है और वह शानदार तरीके से फ़िल्म को हैंडल करते है । वह फिल्म के पैमाने और भव्यता के साथ पूरा न्याय करते हैं । वह नेरेटिव को सरल और समझने में बहुत सरल रखते है । जब पीरियड फ़िल्मों की बात चलती है तो इस शैली की हर फ़िल्म की संजय लीला भंसाली की फ़िल्म से तुलना की जाती है लेकिन यहां निर्देशक ने एक अलग आयाम स्थापित किया है और क्लाइमेक्स में भरपूर मसाला जोड़ा है जो फ़िल्म को हाई नोट पर ले जाती है ।

तान्हाजी- द अनसंग वॉरियर की शुरूआत तानाजी के बचपन और मराठा साम्राज्य की पृष्ठभूमि से होती है । फिल्म यहां बहुत तेजी से आगे बढ़ती है लेकिन प्रभाव में कोई कमी नहीं आती है । वयस्क तानाजी का एंट्री सीन बहुत अच्छा है और दर्शक इसका ताली और सीटियों के साथ स्वागत करेंगे । यहां तक कि उदयभान का परिचय सीन भी देखने लायक है । यहां से इंटरमिशन तक, फ़िल्म बांधे रखती है लेकिन यहां फ़िल्म में एक्शन और पंचज नहीं है । लेकिन इंटरमिशन प्वाइंट अच्छा है और ये उम्मीद जगाताहै कि सेकेंड हाफ़ अच्छा होगा । और शुक्र है, इंटरमिशन के बाद के हिस्से में बहुत अधिक मनोरंजन है । तानाजी और उदयभान का आमना-सामना शानदार है । तानाजी का मराठा सैनिकों से लड़ने का आग्रह करना देखने लायक है । फ़िर फ़िल्म यहां से बिखर जाती है लेकिन मेकर्स फ़ाइनल के लिए बेस्ट सीन रिजर्व रखते है । क्लाइमेक्स की लड़ाई अविश्वसनीय है और सिंगल स्क्रीन ऑडियंस के खासकर रोमांचक रहेगी ।

तान्हाजी- द अनसंग वॉरियर पूरी तरह से अजय देवगन और सैफ़ अली खान की फ़िल्म है । अजय अपने रोल में भरपूर जंचते हैं और अपनी बॉडी लैंग्वेज व हाव-भाव से अपने किरदार में बहुत कुछ जोड़ते है । सामना करते हुए उनकी डायलॉग डिलीवरी कमाल की है । क्लाइमेक्स की लड़ाई में वह एक अलग स्तर पर चले जाते है और दर्शक इसे ज़रूर पसंद करेंगे । वह निश्चितरूप से सराहना के हकदार हैं कि उन्होंने एक ऐसा सिनेमा बनाया है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है । सैफ अली खान खलनायक की भूमिका में शानदार लगते हैं । वह अपने रोल को बखूबी निभाते है । सेकेंड हाफ़ में ब्लैक ह्यूमर सीन में वह छा जाते है । काजोल (सावित्री) के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है, लेकिन उनकी उपस्थिति फिल्म में बहुत कुछ जोड़ती है। अजय के साथ उसके दृश्य प्यारे हैं । शिवाजी महाराज के रूप में शरद केलकर छा जाते है । उनका व्यक्तित्व, शारिरीक कद काठी और शानदार आवाज इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक किरदार के लिए एकदम सटीक है । पद्मावती राव (राजमाता जीजा अऊ) की शानदार स्क्रीन उपस्थिति है । ल्यूक केनी भूमिका में फिट बैठते है और इच्छा होती है कि उनके पास और ज्यादा स्क्रीन टाइम होता । सहायक भूमिका में नेहा शर्मा (कमला) अच्छी लगती हैं । कैलाश वाघमारे (चुल्टिया) और हार्दिक भारत संगनी (गिद्या) ओवर द टॉप हैं लेकिन यह उनके संबंधित पात्रों के लिए काम करता है । अन्य अभिनेताओं में शशांक महादेव शेंडे (शेलार मामा), अजिंक्य रमेश देव (पीसल), विपुल कुमार गुप्ता (जगत सिंह), देवदत्त गजानन केगे (सूर्यजी), यूरी सूरी (मिर्जा राजे जय सिंह), निसार खान (बेशक खान) शामिल हैं। खान), आरुष नंद (रायबा; तानाजी का बेटा), प्रसन्ना विद्याधर केतकर (Ghesarnaik) और निरंजन जादो (त्रिंबक राव; जासूस) जंचते है ।

फ़िल्म का संगीत स्थितिजन्य है और चार्टबस्टर किस्म का नहीं है । 'घमंड कर ’फिल्म का थीम गीत है और काफी रोमांचक है । 'शंकरा रे शंकरा' एक बेहतरीन मोड़ पर आता है । 'माया भवानी' औसत है जबकि 'तिनक तिनक' मूविंग है । संदीप शिरोडकर का बैकग्राउंड स्कोर ड्रामा में नए आयाम जोड़ता है ।

केइको नक्कारा की सिनेमैटोग्राफी सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी की है । इतने सारे एक्शन और लड़ाई-झगड़े होने के बावजूद, कैमरावर्क निखरकर सामने आता है और हर सीन को बेहतरी से कैप्चर करता है । .. सुजीत सुभाष सावंत और श्रीराम कन्नन अयंगर का प्रोडक्शन डिजाइन गुजरे जमाने के लिए एकदम सटीक है । फ़िल्म का सेट प्रमाणिक है और यह ध्यान में रखते हुए कि यह फिल्म मराठा सैनिकों के जीवन पर केंद्रित है इसलिए उनके घर इतने भव्य कैसे हो सकते हैं, सेट बेवजह का भव्य नहीं है । औरंगज़ेब के घर को दर्शाने में डिजाइनर का काम सराहनीय है । रमज़ान बुलट और आर पी यादव के एक्शन थोड़े रक्तरंजित है, लेकिन नियंत्रित है और विजुअली अच्छे दिखते है । विक्रम गायकवाड़ का मेकअप साफ-सुथरा है । नचिकेत बर्वे और महेश शेरला की वेशभूषा यथार्थवादी हैं । NY VFXWaala का VFX शानदार है और एक क्षण भी ऐसा नहीं है, जहाँ पर इफ़ैक्ट्स कमजोर लगे । इसके अलावा, 3डी नेरेटिव के साथ पूरी तरह से मेल खाती है । धर्मेंद्र शर्मा की एडिटिंग चतुराईपूर्ण है ।

कुल मिलाकर, तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर एक मनोरंजक और पैसा वसूल फ़िल्म है जिसे आम जनता के साथ हर वर्ग का दर्शक पसंद करेगा । बॉक्सऑफ़िस के लिहाज से यह फ़िल्म महाराष्ट्र और अन्य केंद्रों में एक आंधी ला सकती है । यह फ़िल्म साल 2020 की पहली 100 करोड़ी फ़िल्म बनने का दम रखती है । इसे जरूर देखिए ।