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बढ़ती जनसंख्या देश की सबसे बड़ी समस्या है जिसके कारण देश में गरीबी और अशिक्षा पनपती है । सभी को उनके अनुसार शिक्षा का हक नहीं मिल पाता है । गरीब-अमीर वर्ग वाले इस चलन में अमीर तो अपना हक पा लेते हैं लेकिन गरीब, जो प्रतिभावान तो है लेकिन उसके पास उसके लायक पैसा नहीं है, अपनी प्रतिभा को निखारने से वंचित रह जाता है । इसलिए बिहार के आनंद कुमार ने गरीब और पिछले वर्ग के लोगों के लिए सुपर 30 नाम का एक संस्थान बनाया जो आई आई टी, जे ई ई की प्रवेश परिक्षा की तैयारी कराता है । और इस हफ़्ते सिनेमाघरों में इसी निस्वार्थ भाव वाले आदमी पर बेस्ड फ़ि्ल्म आई है, सुपर 30 । विकास बहल के निर्देशन में बनी सुपर 30 में ॠतिक रोशन ने आनंद कुमार की भूमिका निभाई है । तो क्या सुपर 30 को लोग प्यार देंगे या यह दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में नाकाम होगी ? आइए समीक्षा करते है ।Super 30 Movie Review: ॠतिक रोशन ने आनंद कुमार के संघर्ष और जीत को दिल से जिया

सुपर 30, एक ऐसे निस्वार्थ व्यक्ति की कहानी है जो सभी की शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है । साल 1996 है, आनंद कुमार (ऋतिक रोशन) ने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली है और गणित विषय को लेकर बहुत जुनुनी है । वे गणित विषय में इतने अच्छे हैं कि उन्हें शिक्षा मंत्री (पंकज त्रिपाठी) के हाथों सम्मानित किया जाता है । आनंद के पास क्वालिटी होती है कि वह जटिल से जटिल गणितीय समस्या को चुटकी में हल कर देता है और पूरी दुनिया आनंद के इस हुनर से हैरान है । उसकी काबिलियत उसे प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाने में कामयाब होती है । विदेश में पढ़ाई करने के लिए उनके पिता ईश्वर कुमार (वीरेंद्र सक्सेना) जो पेशे से एक पोस्टमैन हैं, आनंद की विदेशी शिक्षा के लिए अपना पीएफ निकालते हैं । लेकिन फ़िर भी आनंद की विदेश में पढ़ाई का खर्चा पूरा नहीं निकल पाता तब वह और आनंद शिक्षा मंत्री, जिसने उनसे मदद करने का वादा किया था, के दरवाजे पर मदद की गुहार लगाते है । लेकिन मंत्री उनकी मदद करने से इंकार कर देता है । इसी बीच, ईश्वर एक दिन अचानक गुजर जाता है । वह परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और इसलिए, आनंद विदेश में पढ़ाई करने के अपने सपने को छोड़ देता है और आजिविका चलाने के लिए पापड़ बेचना शुरू कर देता है । एक दिन, वह लल्लन सिंह (आदित्य श्रीवास्तव) से टकराता है, जो आईआईटी-जेईई परीक्षा देने वालों के लिए एक एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर चलाता है । लल्लन आनंद की प्रतिभा से पूरी तरह वाकिफ़ हैं क्योंकि जब आनंद को कॉलेज में सम्मानित किया गया था तब वह उसी कॉलेज में था । वह एक प्रीमियम शिक्षक के रूप में आनंद को अपने कोचिंग संस्थान में ले लेता है । आनंद का पढ़ाने का तरीका ऐसा है जो सफ़लता की गारंटी देता है इसलिए उसकी काफ़ी मांग है । एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर मैनेजमेंट अपने प्रचार के लिए अपने बैनर पर आनंद की तस्वीर का इस्तेमाल करता है । हालांकि इस कोचिंग से आनंद की आर्थिक हालत में सुधार तो हो जाता है लेकिन वह संतुष्ट नहीं लगता है । आनंद को इस बात को जानकर काफ़ी दुख होता है कि कुछ प्रतिभावान छात्र को सही मौका नहीं मिल रहा है क्योंकि वह अपनी गरीबी के कारण महंगे कोचिंग में पढ़ नहीं सकते । रातों रात आनंद एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर छोड़ देता है । और अपना एक अलग कोचिंग संस्थान खोलता है जहां वह 30 छात्रों को मुफ्त में IIT प्रवेश परीक्षाओं के लिए पढ़ाने का फैसला करता है । इतना ही नहीं, वह उनके आवास और भोजन की भी व्यवस्था करता है । लल्लन यह सब देखकर आग बबूला हो जाता है । और वह आनंद को मनाने की पूरी कोशिश करता है । वह आनंद को नीचा गिराने की कई मर्तबा कोशिश करता है । वहीं आनंद का हर एक विद्यार्थी आईआईटी परीक्षा में पास होता है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह पूरी फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

संजीव दत्ता की कहानी अच्छी है और काफ़ी क्षमता रखती है । हालांकि, फिल्म में दिखाई गई घटनाएं कई जगहों पर अवास्तविक सी लगती है । मेकर्स का दावा है कि ये फ़िल्म सत्य घटना पर आधारित है लेकिन सेकेंड हाफ़ में दिखाए गए कुछ सीन काल्पनिक से लगते है । संजीव दत्ता की पटकथा फ़र्स्ट हाफ़ में सशक्त और सुस्पष्ट है । यहां बहुत कुछ होता है लेकिन यह सब अच्छे से लिखा गया है । सेकेंड हाफ़ में लेखन हिल सा जाता है । इसके अलावा लेखन काफ़ी पुराना सा लगता है । इससे पहले कई फ़िल्मों में हम अच्छाई बनाम बुराई की लड़ाई देख चुके है । संजीव दत्ता के डायलॉग तेज है और सही प्रभाव छोड़ते है ।

विकास बहल का निर्देशन औसत है और बेहतर हो सकता था । फ़र्स्ट हाफ़ में उन्होंने सब कुछ काफ़ी अच्छी तरह से मैनेज किया है लेकिन सेकेंड हाफ़ में सब कुछ बि्खर सा जाता है । यहां कई सारी कमियां है जैसे- लल्लन और मंत्री ने सुपर 30 कार्यक्रम के बारे में इतना क्या कहा कि वे आनंद को खत्म करने के लिए तैयार हो गए? मजेदार बात यह है कि विकास फ़िल्म के माध्यम से पूरे शिक्षा घोटाले पर थोड़ी हिंट देते है । लेकिन एक बेहतर प्रभाव के लिए, उन्हें इस विषय पर और गहन शोध करनी चाहिए थी । विवरण की अनुपस्थिति में, यह काफी छिछला सा लगता है । दूसरी बात ये है कि कुछ विद्यार्थी अचानक ही सामने आ जाते है । महत्वपूर्ण किरदारों को प्रस्तुत करने का एक तरीका है । सुपर 30 में, रघुनाथ (अमित साध) और पुरुषोत्तम (मानव गोहिल) अचानक कहीं से सामने आते हैं और यह समझने में थोड़ा समय लगता है कि वे कौन हैं और फ़िल्म के प्लॉट से उनकी क्या प्रासंगिकता है । इसी तरह, क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ते हुए कुछ प्रमुख किरदार बिना किसी निशान के भी गायब हो जाते हैं । विकास द्वारा सबसे बड़ी नासमझी होली सीक्वंस में होती है । यह काफ़ी सपाट सा हो जाता है और कोई प्रभाव नहीं छोड़ता है । यह विकास की पि्छली फ़िल्म शानदार [2015] की याद दिला जाती है । यहां तक कि अंत में अस्पताल का दृश्य भी खिंचा हुआ सा लगता है ।

सुपर 30 की एक दिलचस्प शुरुआत है, जिसमें फुग्गा (विजय वर्मा) को एक तरह के कथाकार के रूप में दिखाया गया है, जो लंदन में दर्शकों को आनंद की कहानी सुनाता है । फ़िल्म का फ़ोकस तुरंत पटना शिफ़्ट हो जाता है लेकिन शुरूआती सीन अच्छे से निर्देशित नहीं किए गए । लेकिन साथ ही ये सब स्क्रीन से दर्शकों को चिपकाए रखते है । फ़र्स्ट हाफ़ में काफ़ी कुछ होता है- कैम्ब्रिज के लिए आनंद का चयन होना, धनवान बनने के लिए बड़े से कोचिंग संस्थान में पढ़ाना, और खुद का कोचिंग सेंटर खोलना इत्यादि । इसलिए, 75 मिनट लंबे फ़र्स्ट हाफ़ में कहीं भी बोरियत नहीं होती है । सेकेंड हाफ़ की शुरूआत अच्छे से होती है । इस बीच, उत्कृष्टता छात्रों और आनंद के छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा का क्रम प्रभावशाली है । लेकिन इस के बाद होली सीन से फ़िल्म बिखरने लगती है । फ़िल्म का मैसेज ठीक तरह से सामने नहीं आता है । कुछ दर्शकों को क्लाइमेक्स भी काफ़ी फ़िल्मी लगता है । लेकिन यह रोमांचकारी है और मूविंग भी है इसलिए इन सबका इसके प्रभाव पर इतना असर नहीं पड़ता है । फ़िल्म का फ़ाइनल सीन काफ़ी प्रेरणाप्रद है और फिल्म को समाप्त करने का एक उपयुक्त तरीका है ।

सुपर 30, पूरी तरह से ॠतिक रोशन के कंधों पर टिकी है और इसमें कोई दो राय नहीं है । वह फ़िल्म की जान है और इसलिए सेकेंड हाफ़ में बिखरने के बावजूद भी यह रोमांच जगाती है । ॠतिक अपने बिहारी लुक, अपने एक्सेंट, मेकअप, बॉडी लैग्वेज, कपड़े इत्यादि से दिल जीत ले जाते है । और एक बार फ़िर ॠतिक ये साबित करने में कामयाब रहते हैं कि वर्तमान में भी क्यों वह सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में से एक है । मृणाल ठाकुर (रश्मि) अपने रोल में जंचती है और शानदार परफ़ोरमेंस देती है । उनका काफ़ी छोटा रोल है लेकिन कहानी में अच्छे से समा जाती है । आदित्य श्रीवास्तव खलनायक की भूमिका में काफी अच्छे लगते है । पंकज त्रिपाठी बनावटी लगते है । कुछ सीन में वह काम करते हैं लेकिन कहीं-कहीं वह जंचते नहीं है । वीरेंद्र सक्सेना मनमोहक हैं और उनका किरदार दिलों को जीतने वाला है । आनंद के भाई के रूप में नंदिश सिंह (प्रणव कुमार) ठीक हैं । अमित साध (रघुनाथ) अपने रोल में बहुत जंचते हैं और बदमाश लुक उन पर बहुत फ़बता है । लेकिन अफसोस की बात है कि स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी बहुत ही कम है जिसके कारण आपको महसूस होगा कि, काश वह थोड़े और नजर आते । विजय वर्मा इंट्रो सीन में मनोरंजक हैं लेकिन बाद में उनके चरित्र के महत्व पर दर्शकों द्वारा सवाल उठाए जाएंगे । राजेश शर्मा बर्बाद हो जाते है और फ़िर आपको लगताहै कि ये किरदार आखिर फ़िल्म में था ही क्यो । मानव गोहिल नेचुरल लगते है । आइटम सॉन्ग में करिश्मा शर्मा अपने बिखेरने में कामयाब होती है । विद्यार्थियों की बात करें तो सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है । लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ते हैं- घनश्याम कुमार (छोटे फुग्गा), दीपाली गौतम (कुसुम) और राहुल राज (किशोर) हैं ।

अजय-अतुल का संगीत चार्टबस्टर किस्म का नहीं है और लेकिन ऐसा लगता है कि कम से कम एक गाना तो चार्टबस्टर होता, जैसे थीम सॉंग । 'जुगराफिया’ सभी में बेहतरीन है । "पैसा' स्थितिजन्य है । 'क्वेश्चन मार्क’ ऑन पेपर अच्छा है लेकिन अच्छे से बनाया नहीं गया । 'नियम हो' एक महत्वपूर्ण मोड़ पर प्ले किया जाता है । 'बसंती नो डांस' भयानक है । अजय-अतुल का बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा लाउड है लेकिन सही ढंग से प्रभाव डालता है ।

अनय गोस्वामी की सिनेमैटोग्राफी उपयुक्त है । एलन अमीन के एक्शन यथार्थवादी है और कुछ भी ओवर नहीं है । अमित रे और सुब्रत चक्रवर्ती का प्रोडक्शन डिजाइन काफी वास्तविक है । सुबोध श्रीवास्तव और निहारिका भसीन खान की वेशभूषा स्क्रिप्ट के अनुकूल है । फ़िल्म का कोई भी किरदार किसी भी एंगल से ग्लैमरस नहीं लगता है । विक्रम गायकवाड़ का मेकअप विशेष रूप से ऋतिक के मामले में सराहनीय है । मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग विशेष रूप से छात्रों की कास्टिंग के मामले में तालियों की हकदार है । श्रीकर प्रसाद का संपादन असम्बद्ध है और इस तरह के कैलिबर वाले संपादक से और बेहतर काम की उम्मीद की गई थी ।

कुल मिलाकर, सुपर 30 का फ़र्स्ट हाफ़ बहुत ही शानदार है लेकिन सेकेंड हाफ़ में फ़िल्म बिखर जाती है । इमोशनल सीन और ॠतिक रोशन की जबरदस्त परफ़ोरमेंस के कारण हालांकि फ़िल्म अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब होती है । बॉक्सऑफ़िस पर इस फ़िल्म को दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने के लिए सकारात्मक तारीफ़ की जरूरत होगी ।