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भारत देश में ऐसे कई जीनियस मिलेंगे जिन्होंने अपने देश को दुनियाभर में अपनी अनूठी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प से प्राउड फ़ील करवाया है । देश की इन्हीं गौरवान्वित हस्तियों में से एक हैं गणित की जादूगर शकुंतला देवी, जिन्हें ह्यूमन कंप्यूटर भी कहा जाता है । निर्देशक अनु मेनन ने इन्हीं शकुंतला देवी की जिंदगी पर बेस्ड फ़िल्म बनाई है, शकुंतला देवी, जो इस हफ़्ते ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म अमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है । तो क्या विद्या बालन अभिनीत शकुंतला देवी दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी ? या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाती है । आइए समीक्षा करते हैं ।

Shakuntala Devi Movie Review: विद्या बालन की अवॉर्ड विनिंग परफ़ोर्मेंस से सजी है शकुंतला देवी

शकुंतला देवी फ़िल्म, एक गणित की जादूगर और अपनी बेटी के साथ उनके जटिल संबंधों की कहानी है । शकुंतला देवी (अरीना नंद) 5 साल की हैं और अपने परिवार के साथ बैंगलोर में रहती हैं । उसके भाई श्रीनिवास (अहान निर्भन) को पता चलता है कि वह गणित की जटिल समस्याओं को आसानी से हल कर सकती है । शकुंतला के पिता (प्रकाश बेलावादी) को महसूस होता है कि उन्हें शकुंतला के साथ मैथ्स शोज करने चाहिए जिससे लोगों का मनोरंजन होगा और पैसा भी कमाया जा सकेगा । वह ऐसा ही करता है जिसकी वजह से शकुंतला अपनी औपचारिक स्कूली शिक्षा से दूर होने लगती है । उसके पिता अपनी बात को सही साबित करने के लिए कहते हैं कि उनकी बेटी इतनी शार्प है कि उसे स्कूली शिक्षा की क्या जरूरत । लेकिन शकुंतला इस बात से सहमत नहीं होती है और नतीजतन वह अपने पिता से नफ़रत करने लग जाती है । वह अपनी मां (इप्शिता चक्रवर्ती सिंह) से भी खफ़ा हो जाती है क्योंकि वह इस लड़ाई में उसका साथ नहीं दे रही है । शकुंतला की रिश्ते में एक बहन शारदा (जिया सिंह) भी है जो लकवाग्रस्त है लेकिन सही इलाज न मिलने के कारण एक दिन उसकी मौत हो जाती है । इसके बाद दो दशक बीत जाने के बाद शकुंतला बड़ी हो जाती है और लंदन पहुंच जाती है इस उम्मीद से कि वह यहां अपने गणित का कौशल दिखाकर पैसा कमाएगी । शुरुआती रिजेक्शनस के बाद, आखिरकार उसे एक गणितीय सोसायटी के सदस्य जेवियर (लुका कालवानी) के माध्यम से अपना एक खुद का शो करने का मौका मिलता है । वह उसकी इंग्लिश ठीक करता है और उसे शो को प्रस्तुत करने लायक बनाता है । धीरे-धीरे शकुंतला अपनी पहचान बना लेती है और अब उसके पास इतना पैसा है कि वह खुद का घर खरीद सकती है अंग्रेजों के शहर में । इसके बाद जेवियर उसे छोड़कर चला जाता है क्योंकि उसे लगता है कि अब शकुंतला को उसकी कोई जरूरत नहीं है । एक साल बाद, शकुंतला बॉम्बे में एक तलाकशुदा आईएएस अधिकारी पारितोष बनर्जी (जीशु सेनगुप्ता) से मिलती है और वह प्यार में पड़ जाते हैं । उनकी शादी हो जाती है और जल्द ही उनकी एक बेटी अनुपमा (सान्या मल्होत्रा) होती है । अब शकुंतला ने अपने काम को छोड़ दिया है और फ़ुल टाइम माँ बन गई है । लेकिन उसे अपने पुराने दिन, शोज करना सब कुछ याद आता है । परितोष उसे अपने सपनों का पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करता है और आश्वासन देता है कि वह अनुपमा की देखभाल करेगा । शकुंतला एक बार फिर शोज करने के लिए दुनियाभर के देशों में घूमती है । यहां तक सब कुछ ठीक है लेकिन जब शकुंतला को पता चलता है कि अनुपमा का पहला शब्द मां नहीं 'डैडी' है तो उसे लगता है उसे अपनी बेटी से दूर नहीं जाना चाहिए । इसलिए अब शकुंतला अनुपमा को भी अपने साथ ले जाने का फ़ैसला करती है । परितोष इसका विरोध करता है लेकिन वह नहीं सुनती है । अनुपमा, शकुंतला के साथ खानाबदोश की तरह रहने लगती है और अपने पिता और एक सामान्य दिनचर्या को याद करने लगती है । धीरे-धीरे अनुपमा अपनी मां से नफ़रत करने लगती है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह पूरी फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

अनु मेनन और नयनिका महतानी की कहानी काफी अनोखी है । बहुत से लोगों को शकुंतला देवी के निजी जीवन और उनकी बेटी के साथ उनकी अनबन के बारें में पता नहीं होगा । अनु मेनन और नयनिका महतानी की पटकथा मनोरंजक है और लेखकों ने पूरी कोशिश की है कि फिल्म यथासंभव आकर्षक, बांधे रखने वाली और मुख्य धारा के रूप में कथा-वार हो । हालांकि, कंटेंट हमारे दर्शकों के लिए काफी चौंकाने वाला और असुविधाजनक हो सकती है । ऐसा इसलिए है क्योंकि दर्शक महिला किरदार को एक विशेष तरीके से देखने के आदी हैं और इस फ़िल्म में, महिला किरदार को अत्यधिक प्रगतिशील, महत्वाकांक्षी और सभी मानदंडों को तोड़ने वाली दिखाया गया है । और ऐसा करने की वजह से वह अपने पूर्व पति और बेटी की नजरों में बुरी बन जाती है। हालाँकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक देखने लायक फ़िल्म है । इशिता मोइत्रा के संवाद शार्प और मजाकिया हैं ।

अनु मेनन का निर्देशन सराहनीय है । 2 घंटे 7 मिनट लंबी फ़िल्म के दौरान वह शकुंतला देवी की जिंदगी को संक्षिप्त तरीके से दिखाने की पूरी कोशिश करती हैं । फ़िल्म में दिलचस्पी बनाए रखने के लिए वह फ़िल्म में काफ़ी मनोरंजन, ड्रामा और हास्य को जोड़ती हैं । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह शकुंतला देवी की जीवनी नहीं बनाती है । बॉलीवुड में बायोपिक्स को आमतौर पर काफ़ी अलग ढंग से दिखाया जाता है, मसलन हमेशा अच्छाई ही अच्छाई को दर्शाया जाता है । लेकिन शकुंतला देवी इन बायोपिक्स से काफ़ी अलग है । क्योंकि इसमें शकुंतला की कमियों को भी दर्शाया गया है । वहीं इसके विपरीत, फ़िल्म का कथानक जटिल है । जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, समय के साथ-साथ बहुत कुछ होता है। कुछ विकास बहुत जल्दी होते हैं और कुछ ट्रैक तार्किक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए, परितोष का किरदार लास्ट के 30 मिनट में पूरी तरह से भूला दिया गया ।

शकुंतला देवी की शुरूआत काफ़ी नाटकिय ढंग से होती है, जिसमें दिखाया जाता है कि मैच्योर अनुपमा अपनी मां शकुंतला देवी पर मुकदमा करने जा रही हैं । इसके तुरंत बाद यह फ़िल्म ध्यान आकर्षित करती है और जिज्ञासा जगाती है । इसके बाद फ़िल्म फ़्लैशबैक मोड में चली जाती है । जिसमें दिखाया जाता है कि शकुंतला देवी का बचपन कैसा था और कैसे उनका गणितीय कौशल लोगों के सामने आया । एक लोकल स्कूल में जिस तरह से वह अपने पहले गणित के कौशल को दिखाती है, यह वाकई दिलचस्प है । जब वह लंदन पहुंचती हैं वहां से फ़िल्म और बेहतर होती है । वो सीन जिसमें वह अपने पुरुष रूममेट्स को ये कहकर डराती हैं कि उसने अपने बॉयफ़्रेंड के साथ क्या किया था, हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देगा । और जिस तरह से जेवियर और शकुंतला एक दूसरे के करीब आते हैं, यह देखेने लायक है । वो सीन भी देखने लायक है जब वह कंप्यूटर को गलत साबित करती है और परितोष के साथ उसकी पहली मुलाकात वाले सीन फ़र्स्ट हाफ़ के बेहतरीन सीन में से एक हैं । सेकेंड हाफ़ में कुछ सीन ऐसे हैं जिन्हें पचा पाना मुश्किल है । जिसमें से मां-बेटी के बीच का तनाव भी एक है । शकुंतला और अजय अभय कुमार के (अमित साध) माता-पिता पहली बार मिलना तनाव को तोड़ता है । फ़िल्म का क्लाइमेक्स नाटकीय और उचित है । हालांकि कुछ सीन में सुधार कर देते तो ये और भी बेहतरीन फ़िल्म बन सकती थी ।

बिना किसी संदेह के शकुंतला देवी पूरी तरह से विद्या बालन की फ़िल्म है । उन्होंने अपने उम्दा प्रदर्शन से कभी निराश नहीं किया और यह फ़िल्म भी कोई अपवाद नहीं है । वह अपने किरदार में इतनी समाई हुई लगती हैं कि उनकी स्टाइल, कॉमिक टाइमिंग, एक्सप्रेशन और दिल से हंसने जैसी कई चींजें उनके शानदार प्रदर्शन को अवॉर्ड विनिंग लेवल का बनाती हैं । सान्या मल्होत्रा का रोल भी इसमें काफ़ी अहम है । हालांकि कुछ जगहों पर वह थोड़ा ओवर चली जाती हैं खासकर वाद-विवाद वाले सीन में, लेकिन कहीं_कहीं तो वह शानदार प्रदर्शन करती हैं । एक अहम सीन में त ओ वह काफ़ी नेचुरल लग रही थीं जब उसे महसूस होता है कि वह भी अपनी मां की तरह बनती जा रही है । अमित साध अपने रोल में जंचते हैं और एक अमिट छाप छोड़ते हैं । जिशु सेनगुप्ता भरोसेमंद हैं । उनका एक चुनौतीपूर्ण किरदार है लेकिन वह प्रभावित करने में सफल होते हैं । लुका कलवानी प्यारी लगती है । शीबा चड्ढा (ताराबाई), प्रकाश बेलावादी, इप्शिता चक्रवर्ती सिंह, जिया सिंह और अहान निर्भन अपने रोल में जंचते हैं । अरीना नंद और स्पंदन चतुर्वेदी (12 वर्षीय शकुंतला) आश्वस्त हैं । कैमियो में नील भूपालम (धीरज) मजाकिया लगते हैं । पूर्णेंदु भट्टाचार्य (अजय के पिता) और रेणुका शर्मा (अजय की मां) अपने रोल में जंचते हैं।

सचिन-जिगर का संगीत इतना यादगार नहीं है । 'पास नहीं तो फेल नहीं' अंतिम क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है और यह आकर्षक है । 'रानी हिंदुस्तानी ’,'झिलमिल पिया’ और 'पहेली’फिल्म में अच्छी तरह से काम करते हैं लेकिन ये कोई खास असर नहीं छोड़ते । करण कुलकर्णी का बैकग्राउंड स्कोर ठीक है । Keiko Nakahara की सिनेमैटोग्राफी सरल और साफ-सुथरी है । विनती बंसल और मीनल अग्रवाल का प्रोडक्शन डिजाइन बहुत शानदार है और पीरियड लुक अच्छी तरह से निकलर कर सामने आता है । निहारिका भसीन की वेशभूषा बहुत ही शानदार है और शकुंतला की विभिन्न प्रकार की ड्रेसिंग शैलियों को सुंदर और प्रामाणिक रूप से चित्रित किया गया है । विक्रम गायकवाड़ और श्रेयस म्हात्रे की हेयर स्टाइल और मेकअप डिज़ाइन भी फ़िल्म में प्रभाव को जोड़ते है। डू इट क्रिएटिव लिमिटेड और फ्यूचर वर्क्स मीडिया लिमिटेड का वीएफएक्स बेहतर हो सकता था । अंतरा लाहिड़ी का संपादन भी थोड़ा और बेहतर हो सकता था ।

कुल मिलाकर, अपरंपरागत विषय पर बेस्ड होने के अलावा शकुंतला देवी फ़िल्म इसके सही से बने होने के कारण और विद्या बालन के अवॉर्ड विनिंग परफ़ोर्मेंस के कारण दिल जीत लेती है । इसे जरूर देखिए ।