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हिंदी सिनेमा में कई स्पोर्ट्स बेस्ड फ़िल्में देखने को मिली है । प्रियंका चोपड़ा की मैरी कॉम भी कुछ इसी तरह की फ़िल्म है जिसमें मां बनने के बाद मैरी कॉम खेल में अपनी वापसी करती है । मां बनने के बाद फ़िर से खेलों में वापसी करना किसी भी महिला के लिए आसान नहीं होता है क्योंकि इस दौरान वह न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत कठिन दौर से गुजरती है । और अब निल बट्टे सन्नाटा और बरेली की बर्फ़ी बनाने वाली फ़िल्ममेकर अश्विनी अय्यर तिवारी ने इस हफ़्ते रिलीज हुई अपनी फ़िल्म पंगा में इसी विषय को केंद्र में रखा है जिसमें कंगना रनौत ने मुख्य भूमिका निभाई है । तो क्या पंगा लोगों का मनोरंजन करने और दिल को छूने में कामयाब होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल होगी ? आइए समीक्षा करते है ।

Panga Movie Review: कंग़ना रनौत की पंगा अपने सपने को जीना सिखाती है

पंगा एक ऐसी मां की कहानी है, जो सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रही है । जया निगम (कंगना रनौत) बेहतरीन कबड्डी प्लेयर है । वह भारतीय कबड्डी टीम की कैप्टन भी बन जाती है । इसी बीच वह प्रशांत (जस्सी गिल) से शादी कर लेती है और एक बड़े टूर्नामेंट के लिए जाने के ठीक पहले गर्भवती हो जाती है । लेकिन वह अपने सिनियर्स को कहकर जाती है कि वह जल्द ही वापसी करेगी । लेकिन उसका नवजात बेटा प्री-मैच्योर है और काफ़ी कमजोर है । इसलिए डॉक्टर्स सलाह देतेहैं कि उसे कड़ी निगरानी में रखा जाए तभी उसकी सामान्य ग्रोथ होगी । और बेटे की देखभाल के लिए जया अपना सपना छोड़ देती है । वह रेलवे में नौकरी करने लगती है और अपने काम व अपने बेटे आदि (यज्ञ भसीन) के बीच अपने समय को विभाजित करती है । ऐसे करके 7 साल गुजर जाते है । अब जया को जिम्मेदारियां निभाना मुश्किल सा लगता है । फ़िर उसकी मुलाकात मीनू (ऋचा चड्ढा) से होती है, जो जया की टीम में थी और अभी भी कबड्डी खेलती है । एक दिन, आदि सुझाव देता है कि उसकी मां को भी कबड्डी में वापसी करनी चाहिए । वह इस बारे में प्रशांत को मना लेता है और दोनों जया को इसके लिए तैयार करते हैं । लेकिन जया को लगता है कि वह अब खेलने केलिए बूढ़ी हो गई है और फिट भी नहीं है । अब जया प्रेक्टिस करती है लेकिन शुरूआत में उसे मुश्किल होती है लेकिन फ़िर वह भी खूब मेहनत करती है । लंबे समय के बाद, उसे पता चलता है कि वह आखिरकार वह अब अपना जीवन जी रही है । दो महीने बीत जाते हैं और एक दिन, वह प्रशांत से कहती है कि वह अभ्यास जारी रखना चाहती है और भारतीय टीम में जाने की कोशिश करती है । आगे क्या होता है यह बाकी की फिल्म देखने के बाद पता चलता है ।

दिव्या राव का रिसर्च और कॉसेप्ट काफी अच्छा और सरल है । कहानी में बहुत क्षमता है और यह थोड़ी अनोखी भी है । बॉलीवुड में ऐसी कई खेल बेस्ड फ़िल्में हैं, लेकिन मुख्य भूमिका के रूप में एक माँ की वापसी पर फिल्म अभी तक नहीं बनाई गई है । निखिल मेहरोत्रा और अश्विनी अय्यर तिवारी की पटकथा (नितेश तिवारी की अतिरिक्त पटकथा) भी सादगी और सापेक्षता को बरकरार रखती है । लेखन कुछ मनोरंजक क्षणों से भरपूर है, जो रुचि को बनाए रखते हैं । वहीं इसके विपरीत, सेकेंड हाफ़ में ये और भी कसी हुई हो सकती थी । इतना ही नहीं फ़िल्म बहुत ज्यादा दंगल [2016] जैसी फ़ील देती है । निखिल मेहरोत्रा और अश्विनी अय्यर तिवारी के डायलॉग (नितेश तिवारी के अतिरिक्त संवाद) हाईपॉइंट में से एक हैं । कुछ वन-लाइनर, विशेष रूप से बाल अभिनेता द्वारा बोले गए, हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देंगे ।

अश्विनी अय्यर तिवारी का निर्देशन अच्छा है । यह देखा गया है कि, उनका अपना पर्सनल अनुभव उनकी फ़िल्मों में झलकता है । कुछ सीन तो उन्होंने बहुत ही सूझबूझ से हैंडल किए है । फ़ाइनल सीन तो बहुत ही अच्छा है इसे तालियों और सीटी से सराहा जाएगा । इसकी सुंदरता यह है कि आप जानते हैं कि क्या होने वाला है और फ़िर भी, आप फ़िल्म में दिलचस्पी लेते हैं और जब परत-दर-परत खुलती है तो आप रोमांचित होते है । और यह भी देखना दिलचस्प है कि कैसे जया को अपने पति, अपने बेटे, अपनी मां, अपनी दोस्त और यहां तक की अपने पड़ौसियों से सपोर्ट मिलता है । इसे महिलाएं खासकर पसंद करेंगी । वहीं ठीक इसके विपरीत, फ़िनाले के अलावा स्क्रिप्ट की अनुमान लगाने वाली बात फ़िल्म के प्रभाव को कम करती है साथ ही इसकी लंबाई भी । जया का फ़्लैशबेक ठीक तरह से स्पष्ट नहीं करता है कि उसने स्टारडम की इतनी ऊंचाइयों को कैसे हासिल किया । इसके अलावा, जब जया ने वापसी करने की अपनी योजना की घोषणा की तो प्रशांत दुखी लग रहा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जैसा कि बाद में पता चला । यह थोडा हतप्रभ करने वाला था और इसे बेहतर तरीके से दूर किया जा सकता था ।

जया के परिवार और उनके दिन-प्रतिदिन के कार्यों पर फ़ोकस करने के साथ छोटे शहर के जीवन को दिखाने के लिए पंगा एक अच्छी शुरुआत है । फ़र्स्ट हाफ़ में काफ़ी कुछ देखने को मिलता है-मीनू का अपनी जिंदगी में वापस आना, जया का अपने स्पोर्ट्स के दिनों का याद करना, जया को आदि से मिली फटकार, जया का फ़्लैशबैक और जया का प्रैक्टिस । फ़र्स्ट हाफ़ महज 51 मिनट लंबा है । जबकि सेकेंड हाफ़ लगभग 1 घंटा 18 मिनट लंबा है, जिसे छोटा किया जा सकता था । यह देखना दिल छू लेने वाला है कि कैसे जया अपने पेशन और अपनी फ़ैमिली को बैलेंस करती है और यह भी कि टीम के चयन पर कैसे राजनीति होती है । लेकिन यहा फ़िल्म की गति थोड़ी स्लो है साथ ही ट्रेनिंग सेशन भी खिंचा हुआ लगता है ।जया को ज्यादातर मैच में खेलने का मौका नहीं मिलता है, यह दोहराया हुआ लगता है । लेकिन शुक्र है, फ़िल्म का क्लाइमेक्स काफ़ी दमदार है जो फ़िल्म को एक उच्च नोट पर खत्म होने में मदद करता है ।

पंगा पूरी तरह से कंगना के कंधों पर टिकी है, हालांकि अन्य कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है । हमेशा की तरह कंगना दमदार अभिनय करती है और एक सेकेंड के लिए भी अपने किरदार से अलग नहीं होती है । जया मां के रूप में कंगना काफ़ी प्यारी और आश्वस्त लगती है । यहां तक की जया प्लेयर के रूप में वह काफ़ी सहज लगती है । जस्सी गिल पूरी योग्यता से अपना बेहतरीन परफ़ोर्मेंस देते है और उनके किरदार को काफ़ी पसंद भी किया जाएगा । लेकिन वह कुछ ज्यादा ही बनावटी हंसी दिखाते हैं, विशेष रूप से फ्लैशबैक भागों में, और यह उन्हें एक हास्य चित्र की तरह दिखाता है । यज्ञ भसीन एक रॉकस्टार है । वह शानदार भूमिका निभाते हैं और कई जगह फ़िल्म के मूड को बढ़ाते हैं । ऋचा चड्ढा की मौजूदगी को स्पेशल अपीरियंस क्रेडिट दिया गया है और जिसे उन्होंने उम्दा तरीके से निभाया है । वह सिर्फ कॉमेडी के लिहाज से ही नहीं, बल्कि जया के लिए बहुत जरूरी नैतिक समर्थन के लिहाज से भी फिल्म में अहम योगदान देती हैं । मेघा बर्मन (निशा दास) की देर से एंट्री होती है, लेकिन वह एक बड़ी छाप छोड़ती है । नीना गुप्ता (जया की माँ) ठीक है । राजेश तैलंग (भारतीय राष्ट्रीय कोच) अच्छे हैं और एक अभिनेता के रूप में उन्हें देखना अच्छा लगता है । स्मिता द्विवेदी (स्मिता तांबे, टीम की कप्तान), कुसुम शास्त्री (जया के पड़ोसी), सुधन्वा देशपांडे (भारतीय रेलवे कोच) और शांतनु दास (पूर्वी रेलवे कोच) अपने रोल में जंचते हैं ।

शंकर-एहसान-लॉय का संगीत भावपूर्ण है, लेकिन यादगार नहीं है । 'बिब्बी सॉन्ग', टाइटल ट्रैक और 'जुगनू' ठीक हैं जबकि 'दिल ने कहा' और 'वही हैं रास्ते' भूलने योग्य हैं । संचित बलहारा और अंकित बलहारा का बैकग्राउंड स्कोर सूक्ष्म है, लेकिन उन दृश्यों में लाउड है जहां आदि प्रशांत से कहता है कि जया को वापसी करनी चाहिए ।

जय पटेल की सिनेमैटोग्राफी महत्वपूर्ण कबड्डी दृश्यों में अच्छी है, लेकिन कुछ दृश्यों में, यह ठीक है । संदीप मेहर का प्रोडक्शन डिजाइन स्ट्रेट ऑफ़ लाइफ़ है । रूशी शर्मा, मनीषी नाथ और भाग्यश्री राजुरकर की वेशभूषा भी प्रामाणिकता में इजाफा करती है । सुनीता विश्वास राव (कबड्डी को-ऑर्डिनेटर), गौरी वाडेकर (कबड्डी कोच और कोरियोग्राफर) और अब्दुल सलाम अंसारी (कबड्डी एक्शन डायरेक्टर) को कबड्डी के दृश्यों को इतना समृद्ध और वास्तविक बनाने के लिए स्पेशल उल्लेख मिलना चाहिए । बल्लू सलूजा का संपादन धीमा होना चाहिए था ।

कुल मिलाकर, पंगा एक प्रगतिशील और दिल को छू लेने वाली स्पोर्ट्स ड्रामा फ़िल्म है जो अपनी शानदार कहानी, निष्पादन, कुछ उम्दा परफ़ोर्मेंस और निंसंदेह कंगना रनौत की शानदार बेजोड़ परफ़ोर्मेंस की बदौलत काम करती है । बॉक्सऑफ़िस पर इसे स्ट्रीट डांसर 3डी से कड़ा मुकाबला करना पड़ेगा साथ ही तान्हाजी-द अनसंग वॉरियर की लगातार बढ़ती फ़ुटफ़ॉल के बीच सकारात्मक तारीफ़ों से टिकट विंडो पर अपनी अलग जगह बनानी होगी ।