बजरंगी भाईजान, किक, एक था टाइगर, बॉडीगार्ड, दबंग और वॉंटेड जैसी फ़िल्मों में सलमान खान की अद्दितीय मौजूदगी के अलावा ये सभी फ़िल्में ईद के पाक त्यौहार के दौरान रिलीज की गई । अब तक, हर ईद सलमान खान कि फिल्म रिलीज का पर्याय बन गई है । और इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस साल भी ईद के दिन सलमान खान की फ़िल्म ट्यूबलाइट रिलीज होती है । ट्यूबलाइट, मैक्सिकन फिल्म निर्माता अलेजांड्रो गोमेज़ मोंटेवेर्दे की युद्ध पर आधारित फिल्म लिटिल बॉय की ऑफ़िशियली रूपांतर है । क्या ट्यूबलाइट बॉक्सऑफ़िस पर अपनी चमक बिखेरेगी या कोई नए रिकॉर्ड्स बनाएगी, आइए समीक्षा करते हैं ।

ट्यूबलाइट एक आदमी के अटूट विश्वास की कहानी है । 'विश्वास से चट्टान भी हिल जाती है' कहावत पर आधारित यह फ़िल्म एक सरल जीवन जीने वाले लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है । अपने बेहद भुलक्कड़ नेचर और दूसरों की तरह चीजों को समझने, समझाने व उनका विश्लेषण करने में असमर्थता के कारण, उसका नाम 'ट्यूबलाइट' पड़ जाता है । फ़िल्म की शुरूआत लक्ष्मण के परिचय के साथ होती है जहां वह दर्शकों को अपने बचपन से व्यस्कता तक ले जाते हैं । भले ही दुनिया उसे गंभीरता से न लेती हो लेकिन एक व्यक्ति है जो हमेशा लक्ष्मण के पास रहता है और उस पर पूरा विश्वास रखता है, और वो है उसका छोटा भाई भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान) । एक दिन, भारत-चीन युद्ध के मद्देनजर, भारतीय सेना युवा भारतीयों से सेना में शामिल होने और संकट के समय देश की सेवा करने के लिए आमंत्रित करती है । दोनों भाई सेना की प्रवेश प्रक्रिया में जाते हैं लेकिन लक्ष्मण रिजेक्ट हो जाता है और भरत का चयन हो जाता है । भरत को चीनी सेना के खिलाफ जंग लड़ने के लिए सीमा पर जाने के लिए भारतीय सेना के एक हिस्से के रूप में चुना जाता है । लक्ष्मण ये जानकर टूट जाता है जब उसे पता चलता है कि भरत के साथ कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है और हो सकता है कि युद्ध में उसकी मृत्यु भी हो गई हो । तब बेंनी चाचा (दिवंगत ओम पुरी) लक्ष्मण को विश्वास रखने के लिए कहते हैं जिससे उसका भाई भरत वापस आएगा । क्या लक्ष्मण सिंह बिष्ट का विश्वास समय की परीक्षा से लड़ पाता है, क्या भरत सिंह बिष्ट सुरक्षित रूप से घर वापस आ पाता है, और अंततः भारत-चीन युद्ध का क्या होता है, यह सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चल पाता है ।

ट्यूबलाइट के प्रोमो ने फ़िल्म के लिए सभी की उत्सुकता को बढ़ा दिया था, लेकिन फ़िल्म अपने शीर्षक को जीने में नाकाम रहती है और अंततः पूरी तरह से मुंह के बल गिरती है । फिल्म की कहानी (कबीर खान) कच्ची है, बेहद अधपकी और पूरी तरह से जटिल है । फिल्म की पटकथा (कबीर खान, परवेज शेख) बहुत सुगम है और बहुत हल्की कहानी पर टिकी है जिसे जबरदस्ती खींचा गया है, और इस प्रकार, फिल्म की नवीनता को एक बड़े पैमाने पर खराब कर देती है । लगता है पटकथा को बांधे रखने वाली बनाने के बजाए आरामयुक्त बना दिया है । भले ही यह फ़िल्म लोकप्रचलित कहावत 'विश्वास से तो चट्टान भी हिल जाती है' पर आधारित हो लेकिन ट्यूबलाइट में किसी भी प्रकार का ठोस कंटेंट नजर नहीं आता है जो फ़िल्म के पक्ष में इस कहावत को सही साबित करे । यह फ़िल्म युद्ध की पृष्ठभूमि के संदर्भ में सख्ती से नहीं बनाई गई है और दर्शकों के साथ इमोशनली कनेक्ट नहीं हो पाती है । फिल्म के संवाद (मानुर्शी चड्ढा) लगभग औसत हैं और एक विशिष्ट 'सलमान खान फिल्म' के विपरीत ।

डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों से अपने करियर की शुरुआत करने वाले निर्देशक कबीर खान धीरे-धीरे फ़िल्म काबुल एक्सप्रेस, न्यू यॉर्क, एक था टाइगर, बजरंगी भाईजान और फ़ैंटम जैसी फ़िल्मों से बॉलीवुड में प्रगति कर रहे थे । फिल्म निर्माण की अपनी विशिष्ट शैली और कलाकारों से उनके शानदार अभिनय को निकलवाने के लिए जाने जाने वाले कबीर खान से उम्मीद थी कि वो सलमान खान की ट्यूबलाइट में भी इसी परंपरा को कायम रखेगे । लेकिन दुख की बात है कि इस बार वह निराश करते हैं । हालांकि कबीर के पास बहुत ही दिलचस्प आधार था, लेकिन फ़िर भी वह इसे बांधे रखने वाली मनोरंजक फ़िल्म में रूपांतरित करने में विफल रहते है । हालांकि फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ काफ़ी अच्छा था, वहीं फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ बेहद धीमी गति से आगे बढ़ता है जिसमें कोई कहानी नहीं होती है । हालांकि फ़िल्म में कई एलिमेंट्स ऐसे हैं जिन्हें कमतर आंका गया और वो हैं सिनेमाई स्वतंत्रता, कुछ भावशून्य दृश्य जो कि सेकेंड हाफ़ में जबरदस्ती खींचे गए ।

देखने लायक दृश्यों के बारें में बात करें तो, जो सीन आपको बिल्कुल मिस नहीं चाहिए वो हैं -जब सलमान खान आर्मी में शामिल होने के लिए प्रवेश प्रक्रिया से गुजरते हैं और उसी के साथ-साथ शाहरुख खान का कैमियो ।

किक, बजरंगी भाईजान और सुल्तान जैसी बेहतरीन सुपर-डुपर हिट फ़िल्म देने के बाद सलमान खान की ट्यूबलाइट से काफ़ी ज्यादा उम्मीदें लगाईं गई थी । सलमान खान बेहद ईमानदारी और समर्पण के साथ अपना किरदार निभाते है लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनकी मेहनत बेकार कर देती है । हालांकि सलमान खान भोले और मिलनसार बनने की कोशिश करते है, लेकिन फिल्म का खराब लेखन उन्हें विफ़ल कर देता है । ठीक ऐसा ही होता है चीनी अभिनेत्री झु झु, जिसने ट्यूबलाइट के साथ अपना बॉलीवुड डेब्यू किया, के साथ । हालांकि फ़िल्म में उनकी मौजूदगी काफ़ी अच्छी लगती है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनकी परफ़ोरमेंस को खराब कर देती है । भारतीय दर्शक फ़िल्म में उनको उनके अधपके किरदार से जोड़ नहीं पाएंगे । वहीं छोटे स्टार मतीन रे टैंगु अपने किरदार में बहुत जंचते हैं और बहुत प्यारे भी लगते हैं लेकिन फ़िल्म में उनके करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है । वहीं दूसरी तरफ़ सोहेल खान, अपने विस्तारित कैमियो रोल में काफ़ी जंचते हैं और अपना किरदार काफ़ी ईमानदारी से भी निभाते है । दिवगंत अभिनेता ओम पुरी ने अपना यादगार परफ़ोरमेंस दिया है, वहीं शाहरुख खान का कैमियो भी काफ़ी प्रभावपूर्ण रहा । बाकी के किरदारों ने फ़िल्म को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया ।

ट्यूबलाइट का संगीत (प्रीतम) बहुत औसत है । 'रेडियो' गाना ही केवल फ़िल्म में चार्टब्स्टर है । वहीं दूसरी तरफ़ फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर (जूलियस पैकैम) अच्छा है ।

फिल्म का छायांकन (असीम मिश्रा) उत्कृष्ट है । जिस तरह से उन्होंने लोकेशन को शूट किया है वह वाकई काबिलेतारिफ़ है । फिल्म का संपादन (रामेश्वर एस भगत) अच्छा हैं ।

कुल मिलाकर, ट्यूबलाइट विशाल निराशा के रूप में सामने आती है और अपनी कमजोर कहानी के कारण दर्शकों का ध्यान खींचने में विफ़ल रहती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म सलमान खान की स्टार पावर के दम पर अच्छी शुरूआत करेगी और वीकेंड पर व ईद की छुट्टी के दौरान इसकी कमाई में इजाफ़ होगा, लेकिन इसके बाद, इसकी कमाई में भारी गिरावट आएगी ।