
यह सब कुछ शुरू हुआ साल 2008 में जब अभिषेक कपूर द्दारा निर्देशित फ़िल्म रॉक ऑन के जरिए सिनेमाप्रेमियों (विशेषरूप से नौजवान) को एक अलग पंथ और संगीत की दुनिया से रु-ब-रु कराया गया । और अब 8 साल बाद, फ़िल्म के मेकर्स इसका सीक्वल लेकर आए हैं जिसका नाम है रॉक ऑन!! 2 । क्या रॉक ऑन!! 2 बॉक्सऑफ़िस पर एक हिट म्यूजिकल फ़िल्म साबित होगी या यह अपने सुर के तार खो देगी, आइए समीक्षा करते हैं ।
रॉक ऑन 2 की शुरूआत होती है, केडी उर्फ़ धमाकेदार ड्रमर उर्फ केदार जवेरी (पूरब कोहली) के वॉइसओवर कथानक के साथ । 'रॉक ऑन' की कहानी जहां खत्म होती है, वहीं से इसका सीक्वल शुरू होती है । आदित्य श्रॉफ़ उर्फ़ आदि (फरहान अख्तर) कुछ गलती पर 'पश्चाताप' के रूप में एक अलग जीवन जीने के लिए शिलांग में बस जाता है । यहां वह बहुत शांति पाता है और यहां वह खेती-किसानी करता है और गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाता है । हालांकि वह खेती कर किसानों के लाभ के प्रति नि: स्वार्थ काम करता है,इसलिए यह उस क्षेत्र के स्थानीय शासकिय अधिकारी को नागवार गुजरता है । वहीं दूसरी तरफ़, जोसेफ़ मैस्करेनहास उर्फ (अर्जुन रामपाल) एक सफ़ल उद्यमी बन जाता है और इसी के साथ-साथ एक टीवी रियलिटी शो में जज भी बन जाता है । एक दिन, आदि की बर्थडे के दिन, पूरी 'मागिक' टीम आदि को सरप्राइज देने के लिए शिलांग आती है । उस दिन खुशी का माहौल होने के बजाय वहां हर किसी के बीच तनाव, क्रोध, पश्चाताप और चिंता का माहौल बन जाता है । फ़िर एक दिन, 'मागिक' टीम को अपने नए सदस्यों के रूप में एक संघर्षरत संगीतकार उदय (शशांक अरोड़ा) के साथ-साथ जिया शर्मा (श्रद्धा कपूर) मिलती है । परफ़ोरमेंस के दिन, जिया डर के कारण स्टेज पर न जाने का निर्णय
लेती है और स्टेज पर परफ़ोर्म करने में असमर्थ हो जाती है क्योंकि उसके पिता पश्चिमी संगीत का विरोध करते हैं । वहीं दूसरी तरफ़, आदि ने शिलांग में एक गांव को गोद लिया था जो जंगल की आग में जल जाता है । और आग से प्रभावित किसानों को केंद्र सरकार द्वारा दी गई कल्याण सहायता शिलांग में एक भ्रष्ट सरकारी अधिकारी गटक जाता है । और यही चीज आदि को झकझोर देती है और फ़िर आदि और उसका बैंड शिलांग में असहाय ग्रामीणों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए एक रॉक कॉंसर्ट आयोजित करने की योजना बनाते हैं । मागिक टीम का कभी न खत्म होने वाला अपराध बोध का ऐसा क्या कारण था, क्या आदि और उसके बैंड के सदस्य रॉक शो जैसे कठिन काम को कर पाते हैं जबकि उनके क्षेत्र का ऑफ़िसर पूरी तरह से उनके विरुद्ध खड़ा है, क्या जिया के पिता उसकी आधुनिक गायिकी को स्वीकार कर पाते हैं, और क्या था जो आदि जिया से छुपा रहा था । ये सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
जब रॉक ऑन 2 के प्रोमो रिलीज हुए, इसने पहले वाली रॉक ऑन की यादों को ताजा कर दिया । असल में, रॉक ऑन 2 पहले वाली फ़िल्म से बेहद अलग धुन गाती (शाब्दिक अर्थ में) है यानी पहले वाली रॉक ऑन से बेहद अलग है रॉक ऑन 2 । सबसे पहली बात तो, फ़िल्म की कहानी (पुबाली चौधरी, अभिषेक कपूर) बिना सिर-पैर वाली है । फ़िल्म में उलझा देने वाली ऐसी कई सारी चीजें हैं जो उलझाती हैं । एक मजबूत और ठोस कहानी की कमी की वजह से, फ़िल्म बिना किसी निर्देशन के किसी भी दिशा में जा रही है । फ़िल्म का कोई भी किरदार अच्छी तरह से उकेरा या पारिभाषित नहीं किया गया है और इसलिए वे दर्शकों के साथ किसी भी भावनात्मक बंधन का निर्माण करने में विफल हो जाते हैं यानी ये फ़िल्म भावनात्मकरूप से दर्शकों से जुड़ नहीं पाती । इसके परिणामस्वरूप,दर्शक किसी भी किरदार के प्रति अपनी सहानुभूति या हमदर्दी महसूस नहीं करते । फ़िल्म इतनी घिसट-घिसट के चलती है, कि दर्शकों को स्क्रीन पर होने वाली हलचल से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । फ़िल्म की कहानी में कई सारे सामाजिक मुद्दोंको शामिल करने के प्रयास में फ़िल्म के लेखक कहानी में कई सारे एंगल व्यर्थ ही जोड़ देते हैं जैसे,पूर्वोत्तर भारत की सामाजिक स्थिति, भारतीय संगीत और शास्त्रीय संगीत के बीच की खाई, पिता-बेटी के बीच का रिलेशनशिप संघर्ष, पति पत्नी और यहां तक कि एक स्टॉकर और उसका लक्ष्य । फ़िल्म के संवाद बिना किसी अद्भुत वनलाइनर के बहुत ज्यादा औसत हैं ।

विज्ञापन में हाथ आजमाने के बाद, शुजात सौदागर ने रॉक ऑन 2 के साथ बॉलीवुड में निर्देशन के क्षेत्र में अपना डेब्यू किया है । शब्दों को बिना तोड़े-मरोड़े, ये कहना पड़ता है कि वह एक विश्वसनीय कहानी को पेश करने में नाकाम रहे । उनके पास किरदारों को आगे बढ़ाने के लिए स्टोरी का कोई आइडिया नहीं था । कई सारे लीड किरदार अपनी लाइफ़ में आगे बढ़ चुके हैं और जबरदस्ती उन्हें फ़िल्म में सीक्वल के लिए लाया गया है । जहां तक फ़ीचर फ़िल्म में कहानी बयां करने का सवाल है शुजात सौदागर को निश्चित रूप से एक लंबा रास्ता तय करना है ।
फ़िल्म में अभिनय की बात करें तो, फिल्म पूरी तरह से फरहान अख्तर पर केंद्रित है । वह फ़िल्म को खींचने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन एक मौके पर आकर वह भी सब कुछ छोड़ते हुए नजर आते हैं । फ़िल्म में फ़रहान का किरदार इतना भ्रांतिमूलक है कि उन्हें असल में एक थेरेपी की जरूरत है बजाए गिटार के । आप ध्यान दें, जब हम यह कहते हैं तो हम मजाक नहीं कर रहे हैं । रॉक ऑन 2 केवल फरहान अख्तर के किरदार पर केंद्रित है, जो सदा उलझन में है और वो भी... कोई विश्वसनीय कारण के लिए नहीं ! फ़िल्म में उनका किरदार निराशाजनक और विसंगत हो जाता है, कि यहां तक की उनकी ऑन स्क्रीन पत्नी (प्राची देसाई) भी इसे और आगे तक ले जाने से इंकार कर देती है । वहीं दूसरी तरफ़, अर्जुन रामपाल, फ़िल्म में पूरी तरह से व्यर्थ हुए हैं और इस फिल्म में पूरी तरह से उदासीन लग रहे हैं । यह बहुत ज्यादा अफ़सोस की बात इसलिए है क्योंकि अर्जुन रामपाल ने रॉक ऑन के लिए नेशनल अवॉर्ड प्राप्त किया
था । पूरब कोहली कुछ वास्तविक इमोशंस लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन, उन्हें ये सब दिखाने की जगह कम मिली और उनके सभी प्रयास विफ़ल हो जाते हैं । वहीं दूसरी तरफ़, श्रद्दा कपूर, फ़िल्म में खो सी गईं । वह अपने खराब लिखे गए किरदार जिया, जो सिर्फ फिल्म में चारों ओर घूम रही है, को कभी भी थाम नहीं पाती हैं । इन सबने मिलकर रॉक ऑन 2 को अव्यवस्थित बना दिया । अन्य कलाकार जैसे, शशांक अरोरा, प्राची देसाई, शहाना गोस्वामी और कुमुद मिश्रा ने मुश्किल से इस उलझन भरी स्क्रिप्ट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई ।
रॉक ऑन 2 से , लोगों को उम्मीद है कि इसमें चार्टबस्टर गानों के साथ अद्भुत म्यूजिक (शंकर-एहसान-लॉय) एलबम है । अफसोस की बात है, फ़िल्म में ऐसा एक भी गाना है नहीं है जिसे आप बाद तक याद रख सके । फिल्म की गति इतनी धीमी है, कि फ़िल्म का म्यूजिक भी उसमें मदद नहीं करता है । फिल्म का बेकग्राउंड स्कोर संगीत औसत है ।
फिल्म का छायांकन (मार्क) औसत है, एडिटींग (आनंद सुबाया) मजबूत हो सकती थी ।
कुल मिलाकर, रॉक ऑन 2 की कोई कहानी नहीं है, न ही अच्छा संगीत है और न ही एंटरटेंमेंट वेल्यू है । अपनी धीमी कहानी, सीमित प्रमोशन, सरकार द्दारा नोट बैन करने के साथ यह फ़िल्म बॉक्सऑफ़िस पर असफ़ल साबित होगी ।
















