
भारत के पूर्व प्रधान मंत्री ने एक बार घोषित किया था कि नक्सलवाद भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है । नक्सलवाद के बढ़ते खतरे की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, और पिछले दस सालों में चौंका देने वाले परिणामों के मद्देनजर बॉलीवुड में इस विषय पर कई फ़िल्में बनीं जैसे-चक्रव्यू, रेड अलर्ट: द वॉर विदिन, चमकू इत्यादि । अमित मसूरकर, जो कम बजट वाली फ़िल्म, सुलेमानी कीड़ा बनाकर सुर्खियों में आ गए थे, नक्सलवाद से संबंधित मुद्दें की गंभीरता को इस्तेमाल करते हुए लेकर आए हैं फ़िल्म न्यूटन, इस फ़िल्म ने कई विदेशी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में अपनी छाप छोड़ी । तो क्या यह फ़िल्म के पक्ष में साबित होगा या भूला देने वाली फ़िल्म साबित होगी, आइए समीक्षा करते हैं ।
न्यूटन एक ऐसे सरकारी अधिकारी की कहानी है जो सभी मुश्किलों के खिलाफ़ निष्पक्ष चुनाव कराने की कोशिश कर रहा है । न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) छत्तीसगढ़ के एक छोटे से शहर में रहने वाला एक सच्चा सरकारी अधिकारी हैं । चुनावों के दौरान उसकी ड्यूटी ऐसी नक्सलवादी क्षेत्र में लग जाती है जहां उसे बाधाओं के बावजूद वोटिंग करानी है । आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) को न्यूटन और उसकी टीम की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौपी जाती है । आत्मा सिंह उस क्षेत्र की कठिनाइयों को भलीभांति समझता हैं और अपने तरीके से उनसे निपटने का तरीका भी । लेकिन न्यूटन उससे सहमत नहीं होता है और ये बात दोनों के बीच तनाव पैदा करती है । वोटिंग वाले दिन आखिर क्या होता, क्या न्यूटन अपने प्रयासों में सफ़ल होता है, यह सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
अमित मसुरकर द्वारा लिखी गई कहानी कमजोर धुरी पर केंद्रित है । यह दिलचस्प विचार पर बेस्ड है, लेकिन कुल मिलाकर, कहानी में कुछ भी रोमांचक नहीं है । मयंक तिवारी और अमित मसुरकर की पटकथा काफी फ़ीकी है, खासकर सेकेंड हाफ़ में । कुछ दृश्यों को अच्छी तरह से लिखा गया है लेकिन अच्छे दृश्यों के प्रभाव को हल्का करने के लिए फ़िल्म अवांछित रूप से खींची जाती है । मयंक तिवारी और अमित मसुरकर के संवाद मजेदार और मजाकिया हैं । अमित मसुरकर का निर्देशन सरल है । लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण यह प्रभावी होने में विफल रह्ती है ।
न्यूटन की शुरूआत काफ़ी अच्छी तरह से होती है और अपने पहले सीन- चुनाव के उम्मीदवार की क्रूर हत्या, के साथ मूड सेट करती है । यह उस विशिष्ट क्षेत्र में किसी भी लोकतांत्रिक से जुड़े खतरे को स्थापित करता है । न्यूटन और उसकी ईमानदारी के चरित्र को भी अच्छी तरह से चित्रित किया गया है । निंसंदेह फ़िल्म में मजा तभी शुरू होता है जब न्यूटन संघर्ष प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचता है । न्यूटन का पहली बार आत्मा सिंह से मिलना फ़िल्म में मनोरंजन को बढ़ाता है और टीम न्यूटन को मतदान केंद्र पर पहुंचना और ज्यादा मजे की उम्मीद पैदा करता है । अफसोस की बात है कि अगले पंद्रह मिनट के लिए फिल्म में कुछ भी नहीं होता है! मध्यांतर के बाद भी, फिल्म वास्तव में कहीं भी नहीं जाती है । लगता है कि फ़िल्म के फ़ाइनल में कुछ रोमांचक होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है । इसके अलावा, न्यूटन एक बहुत ही खूबसूरत फिल्म है और सिनेप्रेमियों के लिए कोई कमर्शियली वैल्यू नहीं रखती है ।
राजकुमार राव हमेशा से ही दमदार अभिनय देते है । जिस तरीके से वह अपने किरदार में घुसते है वह अविश्वसनीय है । नैतिकता के साथ एक नौसिखिए सरकारी अफ़सर के रूप में वह काफ़ी जंचते है । यह उनकी सबसे बड़ी जीत है - वह अपने पात्रों को विश्वसनीय बनाते है । पकंज त्रिपाठी, वो दूसरे अभिनेता है जो फ़िल्म को उच्च स्तर पर ले जाते है, खासकर शुरूआत में । वह जिस सहजता से अपने किरदार को निभाते हैं वह फ़िल्म के लिए काफ़ी काम करता है । अंजली पाटिल (माल्को), जिसने संयोग से एक और नक्सली फिल्म चक्रव्यू में भी काम किया था, काफ़ी मनोहर ढंग से परफ़ोर्म करती है । वह गोंडी भाषा में बोलती है और जिसमें वह काफ़ी जंचती है । रघुवीर यादव (लोकनाथ) को राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी की विशाल उपस्थिति में थोड़ी अधिक शक्ति प्राप्त हो जाती है । लेकिन वह कुछ सीन में छा जाते है । जब वह अपने उपन्यास को बयां करते है और दावा करते हैं रावण भारत का पहला पायलट था, उस दौरान वह काफ़ी लाजवाब लगते है । मुकेश प्रजापति (शंभू) अपने किरदार में जंचते हैं और जहां वह जमीन की कीमत पूछते हैं उस सीन में अपनी छाप छोड़ जाते है । ओपेर दास मानिकपुरी (स्थानीय पुलिस अधिकारी), जो पीपली [लाइव] में प्रमुख अभिनेता थे, उनकी बहुत ही छोटी और महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन वो भी अच्छी है । संजय मिश्रा (चुनाव अधिकारी) उम्मीद के मुताबिक शानदार रहे ।
रचिता अरोड़ा के संगीत में कोई गुंजाइश नहीं है । 'पंछी उड़ गया' एकमात्र गीत है जिसे बैकग्राउंड में रखा गया है । नरेन चंदावरकर और बेनेडिक्ट टेलर का पृष्ठभूमि स्कोर बहुत प्रभावशाली है और फिल्म को एक अनूठा स्पर्श देता है ।
स्वप्निल एस सोनवणे का छायांकन संतोषजनक है । श्वेता वेंकट मैथ्यू का संपादन क्रिस्पी है सिर्फ़ कुछ ही सीन खींचे गए हैं । लेकिन एडिटर की तुलना में यह गलती लेखक की है >एंजेलिका मोनिका भौमिक का प्रोडक्शन डिजाइन स्पष्ट है ।
कुल मिलाकर, न्यूटन दमदार अभिनय से सजी एक फ़िल्म है । क्योंकि यह अलग तरह की फ़िल्म है इसलिए यह पारंपरिक सिने प्रेमियों के लिए सीमित मनोरंजन वैल्यू रखती है । प्रमोशन की कमी और एक साथ कई फ़िल्मों का रिलीज होने के कारण इस फ़िल्म के लिए प्रभावित नंबर जुटाना मुश्किलभरा रहेगा ।
















