
हाल के वर्षों में हिट गानों के नाम पर कई सारी फ़िल्मों के नाम रखे गए । उदाहरण के तौर पर, जाने तू या जाने ना, बचना ए हसीनो, कभी अलविदा न कहना, माई नेम इज एंथनी गोस्लविजी, ये जवानी है दीवानी इत्यादि । इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई मेरी प्यारी बिंदु, जो पुरानी फ़िल्म पड़ौसन का हिट गाना है । क्या मेरी प्यारी बिंदु अपने टाइटल की तरह प्यार करने योग्य होगी या इसे दर्शकों से प्रतिरोध मिलेगा, आइए समीक्षा करते हैं !
मेरी प्यारी बिंदु आवश्यकरूप से दो प्रेमियों के बीच की एक प्रेम कहानी और उनके जीवन में आए उतार-चढ़ाव की कहानी है । फ़िल्म की शुरूआत होती है उपन्यासकार अभिमन्यु रॉय उर्फ़ बुब्ला (आयुष्मान खुराना) के खुदकुशी करने के प्रयास के साथ, क्योंकि वह उस लड़की नहीं भूला पा रहा है जिससे वह निस्वार्थभाव से प्रेम करता था । और वो लड़की आजाद, जिंदादिल, उत्साही बिन्दू शंकरनारायणन (परिणीति चोपड़ा) है, जो अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने के बावजूद जीवन में बहुत कुछ अपूर्ण छोड़ देती है । चूंकि अभिमन्यु लंबे समय तक अपने माता-पिता से दूर रह रहा था, इसलिए उसके माता-पिता उसके तलाक को फर्जी करार करते हैं और उन्हें कोलकाता अपने घर वापस बुला लेते हैं । हालांकि वह इस बात से अपने माता पिता पर बेहद नाराज होता है, लेकिन उसका घर, जहां उसने बचपन बिताया था, वहां उसकी बचपन की यादें ताजा होने लगती हैं और उसे यादा आता है कि बचपन की उसकी पड़ौसी बिंदु ने उसे एक ऐसा गिफ़्ट दिया था जिसे देकर उसने दावा किया इससे उसकी लाइफ़ हमेशा के लिए बदल जाएगी । यहां से फ़िल्म फ़्लैशबेक में चली जाती है और अभिमन्यू बिंदु के लिए वो सब करता है और हर संभव मदद करता है जो उसे खुश करे । इस मदद में बिंदु को महसूस होता है कि उसका सपना एक गायक बनने और अपनी खुद की एक एलबम रिलीज करने का है या रोने के लिए एक कंधा चाहिए जो चीज उसके फ़ेवर में नहीं हुई । एक दिन, जब उसकी मां उसके पिता द्दारा नशे में ड्राइविंग करने की वजह से मर जाती हैं, तो वह टूट जाती है । और यहीं से वह ऑस्ट्रेलिया शिफ़्ट होने का फ़ैसला करती है, यह खबर हर किसी को हैरान कर देती है, यहां तक की अभिमन्यु को भी, जिसने उसके लिए अपने लेखन के करियर को गंवा कर बैंकर बनता है । क्या बिंदु कभी भारत लौटेगी और अभिमन्यु की जिंदगी में फ़िर से आएगी, दोनों की अनकही प्रेम कहानी के बीच क्या होगा, क्या बिंदु कभी अपने पिता को माफ़ कर पाएगी, जो उसकी मां की मौत का जिम्मेदार था, और अंत में अभिमन्यु की 'प्यारी बिंदु' के साथ आखिरकार क्या होता है, यह सब कुछ बाकी की फ़िल्म देखकर ही पता चलता है ।
भले ही मेरी प्यारी बिंदु के प्रोमो को अद्वितीय बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन उसमें दुखद बात ये थी कि उन प्रोमो ने दर्शकों को फ़िल्म के प्लॉट के बारें में सिर्फ़ भ्रमित किया । इस फ़िल्म ने, वहीं दूसरी तरफ़, दर्शकों को कंफ़्यूज ही किया । फिल्म की कहानी और पटकथा (सुप्रतीम सेनगुप्ता) बहुत भ्रामक और जटिल है, खासकर जबरदस्ती के खींचे हुए सेकेंड हाफ़ में । फिल्म में दिखाई गई अनियमित समय-सीमाएं पहले से ही गड़बड़ी की साजिश को और बढ़ाती हैं । हालांकि फ़िल्म में कुछ हंसाने वाले पल भी हैं,डायलॉग (सुप्रतीम सेनगुप्ता, सौमिक सेन) वन लाइनर्स के रूप में कुछ एक जगह पर अच्छे हैं ।
द नेमसेक, वॉटर और वेनिटी फ़ेयर जैसी फ़िल्मों में बतौर अस्टिटेंट डायरेक्टर काम कर तारीफ़ें बटोर चुके अक्षय रॉय ने मेरी प्यारी बिंदु से बतौर निर्देशक अपना डेब्यू किया । हालांकि उनका निर्देश कड़ाई से ठीक है, लेकिन फ़िर भी एक कसी हुई पटकथा का अभाव है, जो उनके निर्देशन को बाधित करती है । फिल्म में सभी खामियों के बावजूद, अक्षय रॉय फिल्म के माध्यम से अपना रास्ता बनाने में कामयब होते हैं । फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ रुचिकर, उत्साही और प्रसन्नचित्त कर देने वाला है जो हर किसी को तुरंत पसंद आ जाएगा । फ़िल्म के फ़र्स्ट हाफ़ की रफ़्तार तेज है और आज के समय से ताल मिलाकर चलती है, और दर्शक फ़िल्म के रफ़्तार से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे । फ़िल्म का सेकेंड हाफ़, ताश के पत्तो की तरह धराशाही हो जाता है ।

ये वो पल है जिन्हें फिल्म में आसानी से निचोड़ा जाता है । उदाहरण के तौर पर वो सीन हैं:-जहां सभी पिछले घटनाओं के बाद परिणीती शादी करती है । ये ऐसा कुछ है जहां दर्शक इस बात को हजम नहीं कर पाते हैं कि अतीत में कई लड़कों को धोखा देने के बाद पिछले ट्रेक रिकॉर्ड्स को मद्देनजर रखकर शादी रचाना । दूसरा, फ़िल्म में मिश्रित टेप बनाने का पहलू ऐसा लगता है सुविधा के लिए फ़ेंका गया, इस बात पर विचार करते हुए कि मिश्रित टेप किसी भी तरह से फिल्म का एक अभिन्न अंग नहीं बनता है । यह हर कोई आसानी से कह सकता है कि फ़िल्म के मेकर्स ने फ़िल्म में प्रभावपूर्ण ऑरिजनल म्यूजिक की कमी के कारण शायद रेट्रो गाने के 'मिश्रित टेप' को इस्तेमाल किया । साथ ही, फिल्म में कई अनावश्यक दृश्यों की भरमार है जो फिल्म में जबरदस्ती के फ़ंसाए हुए लगते हैं, और वो हैं जब परिणीति को घर की तलाश होती है और अर्थहीन रूप से फ़िल्म के क्लाइमेक्स को खींचना । न तो फ़िल्म के मुख्य किरदारों की इच्छा पूरी हो पाती है, यहां तक की जो मैसेज फ़िल्म देने की कोशिश कर रही थी, वो भी गूढ बनकर रह जाता है । कुल मिलाकर, यह फिल्म प्यार से बढ़कर दोस्ती को हाइलाइट करती है और दोस्ती की तरफ़ ज्यादा झुकी है ।
जैसा की फ़िल्म के टाइटल मेरी प्यारी बिंदु से पता चलता है, यह फ़िल्म पूरी तरह परिणीति चोपड़ा से संबंधित है । अपनी पिछली फ़िल्म किल दिल (डिशूम में कैमिया भी),को करने के बाद, परिणीति चोपड़ा ने मेरी प्यारी बिंदु में दमदार अभिनय किया है । हमेशा की तरह इस फ़िल्म में भी वह जीवंत, चुस्त और ऊर्जावान दिखीं है और अपने किरदार को सहजता और आसानी के साथ निभाती है । यह कहना गलत नहीं होगा कि वह इस फ़िल्म की आत्मा है । वहीं दूसरी तरफ़, आयुष्मान खुराना ने फ़िल्म में बेहतरीन प्रदर्शन किया है जैसा कि उनसे अपेक्षा की गई थी । बाकी के कलाकार (प्रकाश बेलावाडी, रजतवा दत्ता, अपराजित अध्या, खराज मुखर्जी) ने अपने हिस्से की भूमिका बखूबी निभाई है ।
दोनों, संगीत और बैकग्राउंड स्कोर (सचिन-जिगर) बेहद औसत हैं । फ़िल्म का लोकप्रिय ट्रेक 'हारयां मैं दिल हारयां' फ़िल्म में से नदारद हैं । फिल्म का छायांकन (तुषार कांति रे) भी औसत है । फ़िल्म की एडिटिंग (श्वेता वेंकट मैथ्यू) को निश्चित रूप से और तेज व कड़कीला होना चाहिए, विशेषरूप से सेकेंड हाफ़ की ओर । कुछ अवांछित दृश्यों को हटाना फ़िल्म के हित में होता ।
कुल मिलाकर, मेरी प्यारी बिंदु एक बार देखने लायक फ़िल्म है क्योंकि यह अपनी भ्रामक । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म औसत साबित होगी । निराशाजनक ।
















