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इस हफ़्ते रिलीज हुई है विद्युत जामवाल की एक्शन ड्रामा फ़िल्म खुदा हाफिज । फ़ारुक कबीर के निर्देशन में बनी विद्युत जामवाल अभिनीत खुदा हाफिज क्या दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब हो पाएगी, या यह अपने प्रयास में विफ़ल होती है, आइए समीक्षा करते हैं ।

Khuda Haafiz Movie Review: एक्शन फ़िल्मों के शौकिनों के लिए है विद्युत जामवाल की खुदा हाफिज

खुदा हाफिज, एक साधारण व्यक्ति की कहानी है, जिसकी पत्नी विदेश में रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो जाती है । साल अक्टूबर 2007 है, लखनऊ स्थित समीर (विद्युत जामवाल), एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, नरगिस (शिवालिका ओबेरॉय) के साथ अरेंज मैरिज करता है । सब ठीक चल रहा है लेकिन दुनिया में मंदी आते ही समस्या शुरू होती है । समीर को अपना कारोबार बंद करना पड़ा । यहां तक कि नरगिस को भी उसके ऑफ़िस से निकाल दिया जाता है । दोनों नौकरी तलाशते हैं लेकिन नाकाम होते हैं । जब कोई ऑप्शन नहीं मिलता है तो वे हारकर नदीम (विपिन शर्मा) नामक एक एजेंट के माध्यम से मध्य-पूर्वी देश नोमान में नौकरी के लिए आवेदन करते हैं। नरगिस को पहले काम मिलता है और अगले ही दिन उन्हें नोमान के लिए रवाना होने के लिए कहा जाता है । समीर आशंकित है लेकिन नदीम उसे कहता है नरगिस वहां सुरक्षित रहेगी । नरगिस अकेली ही जॉब के लिए चली जाती है लेकिन अगले दिन वह समीर को फोन करती है और दुखी सी लगती है । वह रोते हुए समीर को बताती है कि ये वो काम नहीं है जिसके लिए उसे बताया गया था । इससे पहले कि वह कुछ और कह पाती, फोन कट जाता है । समीर परेशान होकर नदीम के ऑफ़िस में पुलिस लेकर पहुंचता है लेकिन वहां उसे कुछ हासिल नहीं होता है । समीर तुरंत नोमान रवाना होने की तैयारी करता है । समीर तुरंत ही नोमान की राजधानी नूर अस सबा पहुंच जाता है जहां नरगिस को जॉब के लिए कहा गया था । हवाई अड्डे के बाहर, समीर एक दयालु टैक्सी चालक, उस्मान अली मुराद (अन्नू कपूर) से मिलता है और वह उसे नरगिस के कार्यस्थल के पते पर ले जाने के लिए कहता है । उस्मान उससे कहता है कि यह पता गलत है । नूर अस सबा की पुलिस भी समीर की मदद करने से इंकार कर देती है । समीर के पास अब बस एक ही सुराग बचता है वो फ़ोन नंबर जिससे नरगिस ने फ़ोन किया था । समीर कैसे नरगिस को एक अंजान शहर में ढूंढता है और इस दौरान उसे किन-किन परेशानियों का सामना करना होता है, ये आगे की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

फारुख कबीर की कहानी एक कमर्शियल फिल्म के लिए काफी दिलचस्प और फिट है । शुरूआत के 30-35 मिनट बागी 3 [2020] की याद दिला सकते हैं क्योंकि उसमें भी परिवार का एक सदस्य मध्य-पूर्वी देश में गायब हो जाता है । लेकिन जब समीर नोमान पहुंचता है, तो ये फिल्म टाइगर श्रॉफ की बागी 3 के समान नहीं लगती है । फारुख कबीर की पटकथा आकर्षक है । फिल्म एक शानदार गति से आगे बढ़ती है और शुरू से अंत तक प्लॉट पर फ़ोकस करती है । लेकिन कहीं कहीं ऐसा भी लगता है कि यह फिल्म बहुत तेजी से आगे बढ़ रही जिसकी वजह से फ़िल्म के किरदारों से कोई भी इमोशनली जुड़ नहीं पाता है । फारुक कबीर के संवाद अच्छे हैं ।

फारुख कबीर का निर्देशन काफी अच्छा है । सकारात्मक पक्ष पर देखें तो, यह फिल्म फ़ुल स्पीड से आगे बढ़ती है । फ़िल्म में कई दिलचस्प और नाटकिय एक्शन मोमेंट्स हैं जो दिलचस्पी बरकरार रखते हैं । इस तथ्य के बावजूद कि यह फिल्म मानव तस्करी और यौन व्यापार से संबंधित है, निर्देशक ने इसे जरा भी सुस्त और बोरिंग नहीं बनाया है । इसके अलावा, फ़िल्म में कोई आइटम गीत नहीं जोड़ा गया है । वहीं दूसरी ओर, फिल्म में कई सीन लॉजिक के परे लगते हैं- मसलन, समीर जिस तरह से वेश्यालय से भागने में कामयाब होता है और यहां तक कि एयरपोर्ट से भी, यह तर्कहीन लगता है । समीर की फ़ाइनल लड़ाई को और बेहतर बनाया जा सकता था । अंत में यही कहा जाएगा कि समीर और नरगिस की रिलेशनशिप को थोड़ा और दिखाना चाहिए था फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाने के लिए ।

खुदा हाफ़िज की शुरूआत एक पेचीदा नोट पर होती है । समीर पहले से ही विदेशी धरती पर पुलिस के कब्जे में है और समीर भारतीय दूतावास के अधिकारी को अपनी कहानी सुनाता है इस दौरान फिल्म फ्लैशबैक मोड पर चली जाती है । समीर और नरगिस के बीच प्यार कब पनपता है और दोनों कैसे शादी के बंधन में बंधते है, ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जाता । निर्देशक जल्द ही उस बिंदु पर आता है जहां नरगिस नोमान के लिए निकलती है और अचानक वह कैसे गायब हो जाती है । समीर नोमान पहुँचता है और अपनी लापता पत्नी का पता लगाने की कोशिश करता रहता है । सेकेंड हाफ़ में फ़िल्म बिखरी हुई सी लगती है लेकिन फ़िनाले के दौरान फ़िल्म दिलचस्प हो जाती है ।

विद्युत जामवाल एक आम आदमी की भूमिका निभाते हैं और अपना किरदार बखूबी निभाते हैं । अभिनय की बात करें तो, वह अपने किरदार में जंचते हैं और इमोशनल सीन्स में छा जाते हैं । लेकिन कुछ सीन में वह उतना निखरकर नहीं आ पाते । शिवालिका ओबेरॉय के पास करने के लिए ज्यादा कुछ होता नहीं है लेकिन स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी अच्छी लगती है । अन्नू कपूर बेहतरीन और काफी मंझे हुए लगते हैं । शिव पंडित अपनी देर से एंट्री के बावजूद भी अपने शानदार प्रदर्शन और एक्सेंट से एक छाप छोड़ते हैं । अहाना कुमरा भी जंचती हैं । इखलाक खान ठीक हैं । नवाब शाह ने खलनायक की भूमिका अच्छी तरह से निभाई है । विपिन शर्मा हमेशा की तरह भरोसेमंद हैं । गौहर खान, शाहनवाज़ प्रधान (समीर के पिता), गार्गी पटेल (समीर की माँ), मोहित चौहान (नरगिस के पिता), सुपर्णा मारवाह (नरगिस की माँ), रियो कपाड़िया (आईएसए कमिश्नर अली आज़म गाज़ी), तमारा मिर्मासुदोवा (उस्मान की पत्नी) और काइल मुशाल (सोनिया सिंह; भारतीय दूतावास में कर्मचारी) ठीक हैं ।

मिथुन का संगीत कुछ खास नहीं है । फिल्म में संगीत की कोई गुंजाइश नहीं है । अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर काफी बेहतर और प्राणपोषक है । जीतन हरमीत सिंह की सिनेमैटोग्राफी शानदार है और उज्बेकिस्तान के विभिन्न स्थानों को अच्छी तरह से कैप्चर किया गया है । बिजोन दास गुप्ता, रंजीत सिंह और प्रेरणा कथूरिया की प्रोडक्शन डिजाइन प्रामाणिक है । दिव्या गंभीर और निधि गंभीर की वेशभूषा आकर्षक और किरदार के अनुरूप है । इवानोव विक्टर और एंड्रियास न्गुयेन के एक्शन बहुत ही हिंसक और रक्तरंजित है । कमजोर दिल वाले इसे न देखे । NY VFXWaala का VFX उचित है । संदीप फ्रांसिस का संपादन फ़ास्ट स्पीड का है ।

कुल मिलाकर, खुदा हाफ़िज एक अच्छे से तैयार की गई एक्शन थ्रिलर फ़िल्म है जो मुख्य रूप से विद्युत जामवाल और अन्नू कपूर के उम्दा प्रदर्शन, निर्देशन और पटकथा के कारण काम करती है ।