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रंगीला, मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी कई फ़िल्मों में मुंबई की ‘मुंबईया’ लहजे की भाषा ने एक अलग छाप छोड़ी । लेकिन पिछले कुछ समय से बॉलीवुड में ‘मुंबईया’ लहजे वाली फ़िल्में कम ही देखने को मिली । लेकिन इस हफ़्ते रिलीज हुई फ़िल्म खाली पीली में ‘मुंबईया’ लहजे की भाषा बहुत सुनने को मिलेगी । सुल्तान और टाइगर जिंदा है जैसी फ़िल्में डायरेक्ट करने वाले अली अब्बास जफ़र ने खाली पीली के साथ बतौर प्रोड्यूसर अपना डेब्यू किया है । ईशान खट्टर और अनन्या पांडे अभिनीत खाली पीली क्या दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब हो पाएगी या नहीं ? आइए समीक्षा करते हैं ।

Khaali Peeli Movie Review: कैसी है ईशान खट्टर और अनन्या पांडे की खाली पीली, यहां जानें

खाली पीली, एक लड़के और लड़की की एक क्रैजी नाइट की साहसिक कहानी है । ब्लैकी (ईशान खट्टर) मुंबई में एक कैब ड्राइवर है जो मुंबई की प्रसिद्ध काली-पीली टैक्सी चलाता है । एक रात, टैक्सी चालकों की हड़ताल चल रही होती है । उस दौरान एक गर्भवती महिला और उसके पति को किसी भी हालत में अस्पताल पहुंचना है तो ऐसे में ब्लैकी उन्हें अस्पताल पहुंचाता है और बदले में ब्लैकी को 5 हजार रु मिलते हैं । जब वह लौट रहा होता है तो उसे कुछ कैब ड्राइवर्स रंगे-हाथों पकड़ लेते हैं और उसकी शिकायत अपने यूनियन लीडर (आशीष वरंग) से कर देते हैं । इन सबसे खुद को बचाते हुए ब्लैकी से गलती एक कैब ड्राइवर के चाकू लग जाता है और इसके बाद वह किसी भी तरह वहां से भाग निकलने में कामयाब होता है । मामला शांत होने तक वह कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर रहने का फ़ैसला करता है । इसी दौरान वह पूजा (अनन्या पांडे) से टकराता है । पूजा, जो यूसुफ चिकना (जयदीप अहलावत) द्वारा चलाए गए वेश्यालय में रहती है । यहां यूसुफ़ उसकी शादी अपने एक ग्राहक से करवाता है , अपनी इसी शादी से बचने के लिए पूजा वहां से भाग निकलती है । पूजा भागकर ब्लैकी की टैक्सी में आ जाती है फ़िर ब्लैकी उसे शहर से बाहर छोड़ने के लिए राजी हो जाता है बदले में पूजा उसे मुंह-मांगी कीमत देने का वादा करती है । ब्लैकी को पता चल जाता है कि पूजा के बैग में बहुत पैसा है । वह हमेशा अमीर बनना चाहता था और इसलिए, वह उसे यूसुफ के गुंडों को सौंपने की योजना तैयार करता है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

सिमा अग्रवाल और यश केसवानी की कहानी एक कमजोर पटकथा पर टिकी हुई है । सिमा अग्रवाल और यश केसवानी की पटकथा फिल्म को एक हद तक पुराना फ़ील देने से बचाती है । हालाँकि, स्क्रिप्ट सेकेंड हाफ़ में अपना चार्म खो देती है क्योंकि एक बिंदु के बाद कुछ भी रोमांचक नहीं होता है । सिमा अग्रवाल और यश केसवानी के डायलॉग (सूरज जियानी के अतिरिक्त संवाद) स्मार्ट, टपोरी स्टाइल के वन-लाइनर से सजे हैं ।

मक़बूल ख़ान का निर्देशन शैलीबद्ध और साफ-सुथरा है और वह साधारण पटकथा को भी देखने लायक बनाने की पूरी कोशिश करते हैं । और ऐसा करने में वह फ़र्स्ट हाफ़ तक सफ़ल भी रहते हैं । लेकिन निर्देशन कब तक फ़िल्म को संभाल सकता है जब कंटेंट ही कुछ खास नहीं हो ? इसके अलावा फ़िल्म में ढेर सारी सिनेमाई स्वतंत्रता ली गई है । शुरूआत में कोई इन पर ध्यान नहीं देता लेकिन बाद में इन्हें पचा पाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है । हालांकि यह एक मसाला फ़िल्म है इसलिए इसमें डार्कनैस है लेकिन यह दर्शकों को नापसंदगी का कारण बन सकती है ।

तर्कहीन होने के बावजूद खाली पीली का फ़र्स्ट हाफ़ काफ़ी मनोरंजक है । ट्रेडमार्क मसाला फिल्म स्टैम्प कुछ दृश्यों में दिखाई देता है, विशेष रूप से ब्लैकी एक बच्चे से एक वयस्क में बदल जाता है । ब्लैकी और पूजा के बीच मजेदार बातचीत और फ़्लैशबैक हिस्सा फ़िल्म में मनोरंजन जोड़ता है । इंटरमिशन प्वाइंट काफ़ी नाटकिय है । सेकेंड हाफ़ छोटा है लेकिन यहां से फ़िल्म पूरी तरह से बिखर जाती है । फ़िल्म का फ़ाइनल सीन भी इतना स्पेशल नहीं है बल्कि इसके विपरीत काफ़ी लंबा और अनुमानित है ।

अभिनय की बात करें तो, ईशान खट्टर काफी कॉन्फिडेंट लगते हैं । वह हर लिहाज से मुंबईकर फ़ील देते हैं और फ़िल्म में काफ़ी हद तक मनोरंजन जोड़ते हैं । अनन्या पांडे भी काफ़ी स्टनिंग लगती हैं और अपनी पिछली दो फ़िल्मों से कहीं बेहतर काम करती हैं । वह अपने एक्शन सीन में भी काफ़ी जंचती हैं । जयदीप अहलावत अपने रोल में जंचते हैं लेकिन स्क्रिप्ट की वजह से मात खा जाते हैं । स्वानंद किरकिरे ठीक हैं और उनका ट्रेक किसी भी लॉजिक पर नहीं पहुंचता है । सुयश तिलक और जाकिर हुसैन (इंस्पेक्टर तावड़े)अच्छे हैं । सतीश कौशिक की कॉमिक टाइमिंग स्पॉट-ऑन है लेकिन फिल्म में उनके किरदार को सिर्फ इसी के लिए जोड़ा गया है । वेदांत देसाई (युवा ब्लैकी) और देशना दुग्गड़ (युवा पूजा) बहुत अच्छा करते हैं । आशीष वारंग, अनूप सोनि (ब्लैकी के पिता रवि), वैशले ठक्कर (खाला) और कस्तूरी बनर्जी (डांसर) सभ्य हैं ।

विशाल-शेखर का संगीत बहुत निराशाजनक है । फिल्म में एक चार्टबस्टर होना चाहिए। 'दुनीया शर्मा जाएगी' ठीक है । 'शाना दिल' बैकग्राउंड में प्ले किया जाता है और यह भूलने योग्य है । 'तहस नहस' जबरदस्ती का जोड़ा हुआ है लेकिन अच्छी तरह से कोरियोग्राफ किया गया है । संचित बलहारा और अंकित बलहारा का बैकग्राउंड स्कोर काफी बेहतर है ।

कुछ दृश्यों में आदिल अफसर की सिनेमैटोग्राफी स्टाइलिश है । लेकिन सीन्स को और ब्राइटर होना चाहिए था । परवेज शेख के एक्शन देखना अच्छा लगता है । नताशा चरक और निकिता मोहंती की वेशभूषा ग्लैमरस है, खासकर अनन्या पांडे द्वारा पहनी गई । दुर्गाप्रसाद महापात्रा का प्रोडक्शन डिजाइन यथार्थवादी है । रामेश्वर एस भगत की एडिटिंग धीमी हो सकती थी, खासकर सेकेंड हाफ़ में।

कुल मिलाकर, खाली पीली बहुत ही कमजोर प्लॉट पर टिकी हुई फ़िल्म है जो ढेर सारी सिनेमाई स्वतंत्रता से भरी हुई है जिसकी वजह से फ़िल्म उतना प्रभाव नहीं छोड़ती है। इसके अलावा फिल्म को ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर भी पे-पर-व्यू मॉडल, वो भी इतनी ज्यादा कीमत के साथ, पर रिलीज़ करने का निर्णय भी काफ़ी हद तक फ़िल्म के खिलाफ़ जा सकता है ।