आप 'सामान्य’ मानव व्यवहार को कैसे परिभाषित करेंगे ? 'सामान्य' होने के लिए क्या मापदंड होते है ? ये शायद किसी को भी नहीं पता । सामान्य और असामान्य पर बेस्ड बॉलीवुड में कई फ़िल्में बनी है, जैसे- माई नेम इज खान, तारे जमीं पर इत्यादि । इन फ़िल्मों में लीड कलाकार का व्यवहार 'सामान्य' नहीं था [लोगों के अनुसार] लेकिन उनमें एक अलग ही खूबी थी जो उन्हें ओरों से अलग बनाती थी । और निर्देशक प्रकाश कोवेलामुड़ी और लेखिका कनिका ढिल्लन इस हफ़्ते इसी थीम और विषय पर आधारित फ़िल्म लेकर आए हैं- जजमेंटल है क्या । यह फ़िल्म एक मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने के लिए इर्द-गिर्द घूमती हुई नजर आती है । तो क्या जजमेंटल है क्या, दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाती है ? आइए समीक्षा करते है ।

जजमेंटल है क्या, एक ऐसी महिला की कहानी है जो मेंटल होने के बावजूद एक अपराध को सुलझाने की कोशिश कर रही है । बॉबी बटलीवाला ग्रेवाल (कंगना रनौत) एक अनाथ है जिसने कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया । उनके निधन के लिए वह आंशिक रूप से जिम्मेदार हैं । बॉबी अपने मेंटल इश्यू के साथ बड़ी होती है और उसके दादा (ललित बहल) उसकी देखरेख करते है । हालांकि वह अपने दादा के साथ नहीं रहती है और अलग रहकर साउथ फ़िल्मों के लिए एक डबिंग आर्टिस्ट के रूप में काम करती है । वह अपने मेंटल इश्यू के लिए दवाईयां लेती हैं लेकिन वह इन्हें खाती नहीं है । वह वरुण (हुसैन दलाल) के साथ एक तरह के रिश्ते में है, जो उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए बेताब है । लेकिन वह उसे ऐसा करने का एक भी अवसर नहीं देती है । इस मोड़ पर बॉबी को एक नया किरायेदार मिल जाता है - केशव (राजकुमार राव) और उसकी पत्नी मीना (अमायरा दस्तूर) । दोनों एक दूसरे के साथ गहराई से प्यार करते हैं । बॉबी उन पर जासूसी करती है और वह खुद को केशव के साथ जोड़कर कल्पना करने लगती है । मीना के सामने, वह एक धूम्रपान न करने वाला और शाकाहारी होने का दिखावा करता है लेकिन बॉबी ने उसे रंगेहाथों धूम्रपान करते और चिकन खाते हुए पकड़ा । बॉबी उन्हें परेशान करने लगती है हालात ये हो जाती है कि केशव और मीना अलग जाकर रहने का फ़ैसला करते है । लेकिन ऐसा होने से पहले, उनकी रसोई में एक गैस विस्फोट होता है और मीना की मृत्यु हो जाती है । पुलिस (सतीश कौशिक, बृजेन्द्र काला) अपनी जाँच शुरू करते हैं । बॉबी उन्हें साफ़-साफ़ बताती है कि मीना की हत्या केशव ने की है लेकिन उसके पास इसका ठोस सबूत नहीं है । पुलिस अधिकारी केहसव से पूछताछ करते हैं, लेकिन यह महसूस करते हैं कि यह आकस्मिक मौत का मामला था । इसलिए, वे मामले को बंद करने का निर्णय लेते हैं । गुस्से में बॉबी केशव को सताती है फ़िर उसे कुछ समय के लिए पागल खाने भेज दिया जाता है । दो साल बाद, बॉबी की हालत कंट्रोल में लगती है । अब बॉबी नियमित रूप से दवा लेना शुरू कर देती है और उसके दादा उसे लंदन में उसकी चचेरी बहन मेघा (अमृता पुरी) को रामायण पर एक मंच निर्माण में मदद करने के लिए भेज देते है । सब कुछ ठीक चल रहा होता है तभी उसे केशव दिखाई देता है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
कनिका ढिल्लन की कहानी अपरंपरागत और काफी आशाजनक व मनोरंजक है । कनिका ढिल्लन की पटकथा दिलचस्प है लेकिन कुछ हिस्सों में वह लड़खड़ाती है । सेकेंड हाफ़ में फ़िल्म बुरी तरह से लड़खड़ा जाती है और समझ के परे लगती है । हालांकि वह सामान्य दिखाने के लिए कई बिंदुओं को उठाती है और रामायण के साथ दर्शाती है । यदि ये सभी चीजें एक साथ आती तो फ़िल्म का प्रभाव डबल हो जाता है । कनिका ढिल्लन के डायलॉग्स फ़िल्म के साथ मेल खाते है, खासकर कंगना द्दारा बोले गए ।
प्रकाश कोवेलामुड़ी का निर्देशन उचित है और वह अपने तकनीकी ज्ञान का अच्छी तरह से उपयोग करते है । फिल्म को बहुत ही स्टाइलिश तरीके से बयां किया गया है जो इसकी थीम और टाइटल के साथ परफ़ेक्टली मैच करता है । कुछ सीन में वह अपनी प्रतिभा को बखूबी दर्शाते हैं लेकिन सेकेंड हाफ़ में खासकर, क्लाइमेक्स से थोड़ा पहले उनकी प्रतिभा निकलकर सामने आती है । वहीं कुछ सीन ऐसे भी हैं जिन्हें हजम करना थोड़ा मुश्किल है, विशेषकर वह दृश्य जहाँ बॉबी केशव का सामना करता है । वह इस फिल्म के साथ सही जा रहे थे लेकिन कहीं-कहीं वह नाकाम रहते हैं जिससे फ़िल्म का प्रभाव कम हो जाता है ।
जजमेंटल है क्या, का इंट्रो सीन छोटा है और संक्षिप्त तरीके से बॉबी के अशांत बचपन को दर्शाता है । एक बार जब बॉबी बड़ी हो जाती है, तो फिल्म को अपनी स्पीड पकड़ने में थोड़ा समय लगता है । ऐसा इसलिए है क्योंकि यह किरदार अपरंपरागत है जबकि इससे पहले हमने जो किरदार देखे है वह काफ़ी सामान्य से होते है । इसलिए उसके तरीके, कार्य, जीवन जीने का तरीका आदि बिल्कुल 'सामान्य' नहीं हैं । केशव और मीना किरायेदारों के रूप में जब रहने आते हैं तो फ़िल्म दिलचस्प हो जाती है । केशव उस सीन में काफ़ी रहस्यमयी लगता है जब वह वह आधी रात को फ़्यूज ठीक कर रहा होता है । यह सीन काफ़ी अच्छी तरह से फ़िल्माया गया है । लोनावला सीक्वेंस भी मजेदार है । लेकिन जब मीना मर जाती है तो चीजें बदलने लग जाती है । इंटरमिशन प्वाइंट हैरान कर देता है । इंटरवल के बाद कुछ अप्रत्याशित घटनाक्रमों के साथ फ़िल्म में दिलचस्पी बरकरार रहती है । लेकिन इसी के साथ फ़िल्म थोड़ी विचित्र सी होने लगती है । कोई यह तर्क दे सकता है कि फ़र्स्ट हाफ में विचित्र सीक्वंस देखने को मिलते है लेकिन सेकेंड हाफ़ में मेकर्स कुछ ज्यादा ही विचित्रता दिखा देते है । यह फ़िल्म अप्रत्याशित है । यह फ़िल्म शहरी इलाकों में मल्टीप्लेक्स सिनेप्रेमियों को ज्यादा आकर्षित करेगी ।
अभिनय की बात करें तो, कंगना रनौत एक बार फ़िर अपनी शानदार परफ़ोरमेंस से छा जाती है । यह शायद उनका अभी तक का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार हो सकता है और वह सभी उम्मीदों पर खरी उतरती है । इस किरदार में यदि उनकी जगह कोई और अभिनेत्री होती तो उसे इस किरदार को शानदार बनाने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ती लेकिन कंगना ने इस किरदार को काफ़ि सहजता के साथ निभाया । राजकुमार राव अपने किरदार में बहुत जंचते है । वह रहस्यमयी केशव के किरदार में बहुत अच्छे लगते है । लेकिन वह दो सीन में तो पूरी लाइमलाइट चुरा ले जाते है । अमायरा दस्तूर बहुत क्यूट लगती है और अपने सपोर्टिंग रोल को अच्छे से निभाती है । अमृता पुरी भी अपने रोल में जंचती है । सतीश कौशिक और बृजेन्द्र काला अपने-अपने रोल के लिए एकदम परफ़ेक्ट है । हुसैन दलाल फ़िल्म में देखने लायक है । वह काफ़ी फ़नी किरदार हैं और फ़िल्म में हास्य लेकर आते है । जिमी शेरगिल (श्रीधर) स्पेशल अपीरियंस में प्यारे लगते है । ललित बहल सभ्य हैं । कनिका ढिल्लों (सीता), जो फिल्म की लेखिका भी हैं, स्टनिंग लगती हैं और फिल्म में एक अच्छी भूमिका निभाती हैं ।
गाने वास्तव में उतना प्रभाव नहीं डालते हैं । टाइटल गीत अच्छा है लेकिन यह तब सामने आता है जब फ़िल्म विचित्र सी हो जाती है । 'किस रास्ते है जाना' ठीक है । 'वाखरा गीत' एंड क्रेडिट के दौरान प्ले किया जाता है । डैनियल बी जॉर्ज का बैकग्राउंड स्कोर हालांकि बेहतर है और फिल्म की थीम से मेल खाता है ।
पंकज कुमार की सिनेमैटोग्राफी पारंपरिक है और फिर भी इस तरह की फिल्म में काम करती है । शीतल शर्मा की वेशभूषा काफी विचित्र लगती है, खासकर कंगना रनौत द्वारा पहनी गई लेकिन वह इसमें बहुत जंचती है और उनकी वेशभूषा उनके किरदार को और शानदार बनाती है । विशेषकर रामायण नाटक के लिए रवि श्रीवास्तव का प्रोडक्शन डिजाइन सराहनीय है । वीएफएक्स औसत है और कॉकरोच शॉट और अधिक यथार्थवादी हो सकता था । श्वेता वेंकट का संपादन (प्रशांत रामचंद्रन और शिबा सहगल द्वारा अतिरिक्त संपादन के साथ) ठीक है । फिल्म की अवधि सिर्फ 116 मिनट है और यह फ़िल्म की सबसे अच्छी बात है ।
कुल मिलाकर, जजमेंटल है क्या, कंगना रनौत और राजकुमार राव, दोनों की दमदार परफ़ोरमेंस के साथ एक अच्छे से बनाई गई बेहतरीन फ़िल्म है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म मुख्य रूप से मल्टीप्लेक्स सिनेप्रेमी दर्शकों को ज्यादा आकर्षित करेगी ।
















