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फ़िल्ममेकर लव रंजन ने बॉलीवुड को कई बेहतरीन कलाकार दिए हैं और उन्हीं में से एक हैं कार्तिक आर्यन । उन्होंने अपनी कुछ फ़िल्मों में वही स्टारकास्ट को रिपीट भी किया जो उनके लिए लकी साबित हुए । प्यार का पंचनामा उन्हीं फ़िल्मों में से एक है । इसके बाद प्यार का पंचनामा की स्टार कास्ट कार्तिक आर्यन, सनी सिंह निज्जर और नुसरत भरूचा साल 2018 में आई फ़िल्म सोनू की टीटू में नजर आई । और अब लव फ़िल्म्स लेकर आई है सनी सिंह निज्जर और सोनाली सैगल के साथ दिल्ली फ़्लेवर वाली फ़िल्म जय मम्मी दी, जो इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । तो क्या जय मम्मी दी लव फ़िल्म्स की बाकी की फ़िल्मों की तरह हिट साबित होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।

Jai Mummy Di Movie Review: हंसाती नहीं निराश करती है जय मम्मी दी

जय मम्मी दी, ऐसे दो लवबर्ड्स की कहानी है जिनकी मां एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन हैं । दिल्ली स्थित इंजीनियरिंग के छात्र, पुनीत खन्ना (सनी सिंह) और सांझ भल्ला (सोनली सैगल) एक-दूसरे के प्यार में गिरफ़्त हैं । सांझ ने पुनीत को प्रपोज करती हैं वहीं पुनीत भी सांझ के साथ सेटल डाउन होना चाहता है लेकिन अपनी मां से डरता है । ऐसा इसलिए है क्योंकि पुनीत की मां लाली (सुप्रिया पाठक) और सांझ की मां पिंकी (पूनम ढिल्लों) एक-दूसरे से बहुत नफरत करती हैं । किसी जमाने में दोनों एक दूसरे की अच्छी दोस्त हुआ करती थी और आस-पास ही रहती थी । और अब हालत ये है कि, दोनो एक दूसरे की कट्टर दुश्मन बन गई है । पुनीत अपनी मां को ये बताने से डरता है कि उसे अपनी मां की दुश्मन की लड़की से प्यार है । इसी चक्कर में सांझ पुनीत से ब्रेक अप कर लेती है । वह शादी के लिए उपयुक्त वर की तलाश शुरू कर देती है और यहां तक कि देव (भुवन अरोड़ा) से शादी के लिए राजी हो जाती है । उनकी शादी 16 अक्टूबर को नोएडा के डायमंड हॉल में तय होती है । जब पु्नीत की मां लाली को पता चलता है कि पिंकी ने अपनी बेटी की शादी तय कर दी है वह उससे जलने लगती है । आनन फ़ानन में वह अपने बेटे पुनीत के लिए एक लड़की तलाशती है जिसका नाम है साक्षी । अब पुनीत की शादी भी 16 अक्टूबर को होना तय होता है वो भी नोएडा के डायमंड हॉल में । वहीं पुनीत और सांझ को भी लगता है कि वह एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते । इसलिए वह अपनी मांओ को मिलाने का फ़ैसला करते है । लेकिन जब दोनों इसमें नाकाम रहते हैं तो वह चुपके से शादी करने का फ़ैसला करते है । इसके बाद आगे क्या होता है, यह आगे की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

नवजोत गुलाटी की कहानी बहुत बारीक प्लॉट पर टिकी है । जो कि एक अच्छा आइडिया है और इसे एक मनोरंजक फ़िल्म बनाई जा सकती थी । लेकिन नवजोत गुलाटी का स्क्रीनप्ले इसका सबसे बड़ा दोषी साबित होता है । फ़िल्म में कई खराब क्षण है जिन्हें बुरी तरह से लिखा गया है । साथ ही, दृश्यों का प्रवाह सुचारू नहीं है । नवजोत गुलाटी के संवाद नकारात्मक प्रभाव को भी जोड़ते हैं । कुछ वन लाइनर्स को छोड़कर, कोई भी उतना प्रभाव नहीं बना पाता ।

नवजोत गुलाटी का निर्देशन खराब है । स्क्रिप्ट के साथ तो पहले ही गड़बड़ हो चुकी लेकिन वह अपने निर्देशन से इसे सुधार सकते थे । लेकिन उनका निर्देशन बहुत बुरा है । फ़िल्म कभी भी हाई नोट पर नहीं जाती न ही ये फ़नी लगती है जो कि इसे होना चाहिए थ । क्लाइमेक्स बहुत ही ठंडा है क्योंकि लोगों को लगता है कि अंत में कुछ बड़ा आमना सामना होगा और फ़िर पैच अप होगा । फ़िल्म का सबसे बुरा सीन क्लाइमेक्स के लिए रिजर्व रहता है और यह फ़िल्म के प्रभाव को एकदम खराब कर देता है ।

जय मम्मी दी की शुरूआत काफ़ी अजीब तरीके से होती है क्योंकि इस दौरान दो महिलाओं के बीच की दुश्मनी को दर्शया जाता है । यह सीन कागजों पर दिलचस्प लग सकता है लेकिन स्क्रीन पर कुछ भी मजा नहीं देता है । 'मम्मी नु पसंद' गाना फ़िल्म में दिलचस्पी बढ़ाता है लेकिन उसके बाद फ़िर से फ़िल्म निराश करने लगती है । कुछ दृश्य तो भयावह हैं । उदाहरण के लिए, पिंकी गाजियाबाद में शिफ्ट क्यों होती है, वह भी लाली के घर के बगल में । फिल्म में हास्य की कमी बहुत है । यदि कोई और प्रतिभाशाली निर्देशक या लेखक होता तो वह दोनों प्रेमियों द्दारा अपनी-अपनी मां को साथ लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते । लेकिन इस फ़िल्म के लव बर्ड्स बमुश्किल ऐसी कोशिश करते हुए नजर आते है । इंटरमिशन प्वाइंट भी ड्रामा से भरा है लेकिन ये भी काम नहीं करता है । इंटरवल के बाद, फ़िल्म दर्शकों के धीरज को परखती है । हालांकि फ़िल्म का रन टाइम महज 105 मिनट है लेकिन फ़िर भी यह काफ़ी लंबी लगती है ।

अभिनय की बात करें तो, सनी सिंह अपने रोल में जंचते है । उनका अभिनय इतना बेहतरीन नहीं है लेकिन वह अपने रोल से निराश नहीं करते है । सोनाली सैगल, अपने अभिनय को बखूबी दिखाती है । प्यार का पंचनामा [2015] में वह अन्य अभिनेताओं के बीच निकलकर सामने नहीं आ पाई लेकिन यहां उनका अभिनय निखरकर सामने आता है खासकर फ़र्स्ट हाफ़ में । वह शानदार परफ़ोर्म करती है । सुप्रिया पाठक और पूनम ढिल्लन सख्ती से ठीक है । चौंकाने वाली बात यह है कि इस फ़िल्म को असल में इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द घूमना चाहिए था लेकिन उन्हें उतना स्क्रीन स्पेस नहीं मिलता जिसकी वो हकदार थी । राजेंद्र सेठी (त्रिलोचन खन्ना) और दानिश हुसैन (गुरपाल भल्ला) कुछ खास नहीं है । वीर राजवंत सिंह (विनीत) पुनीत के भाई के रूप में जंचते हैं । आलोक नाथ (संजोग लूथरा) बेकार चले जाते है । ये देखकर हैरानी होती है कि आखिर वो फ़िल्म में थे ही क्यों । भुवन अरोड़ा फिल्म का सबसे मजेदार हिस्सा हैं । सखी का किरदार निभाने वाली अदाकारा ठीक है । नीरज सूद (जसबीर भुल्लर) हमेशा की तरह अच्छे हैं । नुसरत भरूचा, इशिता राज और वरुण शर्मा अच्छा करते हैं लेकिन उनका कैमियो उस समय आता है जब दर्शक फिल्म से बोर हो चुके होते है ।

'मम्मी नु पसंद नहीं" के सिवाय कोई भी गाना याद रखने योग्य नहीं है । 'लेम्बोर्गिनी' अंत क्रेडिट में प्ले किया जाता है । हितेश सोनिक का पृष्ठभूमि स्कोर मनोरंजक है, लेकिन यह दृश्यों के साथ जंचता नहीं है ।

संकेत शाह की सिनेमैटोग्राफी और तर्पण श्रीवास्तव की प्रोडक्शन डिजाइन उपयुक्त हैं । जिया भागिया, अरुण जे चौहान और मल्लिका चौहान की वेशभूषा आकर्षित कर रही है, विशेष रूप से फिल्म के विभिन्न विवाह दृश्यों में लीड एक्टर्स द्वारा पहनी गई पोशाकें । देव राव जाधव और चेतन एम सोलंकी का संपादन कई जगहों पर बेतरतीब है और ऑर्गेनिक नहीं है ।

कुल मिलाकर, जय मम्मी दी कमजोर स्क्रिप्ट, निर्देशन और हास्य की कमी के कारण निराश करती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म दर्शक जुटाने में काफ़ी संघर्ष करेगी क्योंकि टिकट विंडो पर इसके पास महज एक हफ़्ते का ही समय है ।