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बहुत कम लोगों को पता है कि साल 2010 में आई फ़िल्म अंतरद्वन्द दुल्हे का अपरहरण कर शादी कराने पर बेस्ड थी लेकिन इस फ़िल्म को ज्यादा लाइमलाइट नहीं मिली । और अब इस मुद्दे को नवोदित निर्देशक प्रशांत सिंह ने एक नए तरीके से उठाया और बनाई फ़िल्म, जबरिया जोड़ी, जो इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । हल्की-फ़ुल्की मनोरंजन से भरी जबरिया जोड़ी फ़िल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा ने लीड रोल निभाया है । तो क्या यह फ़िल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।

Jabariya Jodi Movie Review: फ़नी वन-लाइनर्स के साथ चटपटे अंदाज में दिखाया 'जबरिया शादी' का गंभीर मुद्दा

जबरिया जोड़ी ऐसे दो लोगों की कहानी है जो अलग-अलग दुनिया से आते हैं । साल 2005 में, दो बच्चे - अभय सिंह (आर्यन अरोरा) और बबली यादव (गुरमीत कौर) - बिहार के माधोपुर गाँव में रहते हैं और एक दूसरे से प्यार करते है । लेकिन बबली की मां उन्हें रंगे हाथों पकड़ लेती है । इसके कारण वह और बबली के पिता दुनिया लाल (संजय मिश्रा) बबली को लेकर माधोपुर छोड़कर पटना शिफ़्ट होने का फैसला करते हैं । अभय सिंह (सिद्धार्थ मल्होत्रा) अब एक वयस्क है और अपने पिता हुकुम देव सिंह (जावेद जाफ़री) के साथ काम करता है । अभय का काम दूल्हे का अपहरण करना और उनकी 'जबरिया शादी’ करवाना है । अभय, हुकुम और गिरोह के बाकी सदस्यों का मानना है कि वे इन जबरन विवाह के साथ सामाजिक कार्य कर रहे हैं । आखिरकार, दुल्हन के पिता को इस प्रकार के विवाह में दहेज नहीं देना पड़ता है । ऐसे ही एक 'जबरिया जोड़ी' बनाते वक्त, अभय बबली (परिणीति चोपड़ा) से मिलता है, जो दुल्हन श्रेया (कीर्तिका बुडेन) की दोस्त है । दोनों एक-दूसरे को पहचान जाते हैं । अभय और बबली एक बार फ़िर प्यार में गिरफ़्त हो जाते है । लेकिन अभय थोड़ा आशंकित सा रहता है । इसके अलावा, उसकी कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं- जैसे वह एक विधायक बनना चाहते हैं और अगले साल चुनाव में खड़े होने की तैयारी कर रहा है । इस बीच, दुनिया लाल को पता चलता है कि बबली को अभय से प्यार है । वह अभय का पता लगाता है, क्योंकि वह एक गुंडा है और उसकी शादी कथित रूप से सभ्य और शिक्षित साथी, पप्पू (रशुल टंडन) से करने का फैसला करता है । लेकिन पप्पू के माता-पिता हास्यास्पद रूप से उच्च दहेज की माँग करते हैं । हाथ में कोई विकल्प न होने के कारण, दुनीया लाल और उनके करीबी पाठक जी (नीरज सूद) हुकुम देव सिंह से संपर्क करते हैं और बबली और पप्पू की 'जबरिया शादी' कराने के लिए अनुरोध करते हैं । बबली को लगता है कि उसकी शादी अभय से होने वाली है । इसलिए वह शादी के फ़ंक्शन में खुशी-खुशी शामिल होती है । इसी बीच अभय परेशान हो जाता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि बबली की शादी किसी और से हो । इस मोड़ पर, शक्तिशाली और अच्छी तरह से जुड़े दद्दन यादव (शरद कपूर) हुकुम देव सिंह से संपर्क करते हैं । वह उससे अनुरोध करता है कि वह पुनिया के करीबी रिश्तेदार होने के कारण दुनीया लाल के साथ किए गए सौदे को जाने दे और वह पप्पू की शादी की योजना कहीं और बनाए । बदले में, दद्दन हुकुम देव को गया की सीट से चुनाव का टिकट देंगे । हुकुम देव सहमत हो जाते हैं और वह अभय को दूनिया लाल द्वारा दिए गए शुल्क को अपने निवास पर लौटाने के लिए कहते हैं । यह तब है जब बबली सच्चाई जानती है और वह टूट जाती है । नाराज बबली अब अभय के साथ ‘जबरिया शादि’ करने का फैसला करती है । आगे क्या होता है यह बाकी की फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

संजीव के झा की कहानी एक दिलचस्प विचार पर आधारित है । देश में बहुत से लोग 'पकड़वा विवाह' से वाकिफ़ नहीं थे इसलिए लेखक इस बात को मनोरंजक तरीके से दिखाने में सफल होते है । साथ ही, वह इस तरह के विवाह के नकारात्मक पक्ष पर भी प्रकाश डालते है । लेकिन अंतर्निहित प्रेम कहानी कमजोर है और इसमें कई कमियां है । संजीव के झा की पटकथा (राज शांडिल्य और नीरज सिंह की अतिरिक्त पटकथा के साथ) इन कमियों को छिपाने में वास्तव में सफल नहीं हो पाते । कुछ दृश्यों को अच्छी तरह से लिखा और सोचा गया है । इसके अलावा, लेखन में व्यापक खिंचाव है । लेकिन एक लेखक और अतिरिक्त पटकथा लेखकों ने असंबद्ध कथानक बिंदुओं के बारे में बहुत कुछ किया है । राज शांडिल्य के डायलॉग (नीरज सिंह के अतिरिक्त संवादों के साथ) फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत है । फ़िल्म के वन-लाइनर्स का ताली और हूटिंग के साथ स्वागत किया जाना निश्चित है । वास्तव में, यह एक दुर्लभ फिल्म है जहां संवाद फिल्म की कमियों को छिपाने में मदद करते हैं । भावनात्मक दृश्यों में, संवाद बड़े स्तर पर काम करते हैं ।

प्रशांत सिंह का निर्देशन एक नवोदित निर्देशक के रूप में बहुत अच्छा है । वह जानते हैं कि फ़िल्म की कहानी पैन-इंडिया अपील रखती है और उन्होंने इसके साथ पूरा न्याय किया है । 144 मिनट की अवधि के बावजूद यह फ़िल्म दर्शकों को शुरूआत से लेकर अंत तक बांधे रखती है और जरा भी बोर नहीं करती है । लेकिन जब फ़िल्म में अटपटे पल भी देखने को मिलते हैं जिन्हें उन्होंने अच्छे से नहीं संभाला । फिल्म में अभय सिंह के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि उसके मन में यह डर है कि वह अपने पिता की तरह सख्त बनेगा और अपनी पत्नी को परेशान करेगा और इस तरह उसकी पत्नी भी उसकी मां (शीबा चड्ढा) की तरह अपने भाग्य को कोसेगी । यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था और इसे आगे एक्सप्लेन किया जाना चाहिए था । केवल बचपन का हिस्सा हुकुम देव सिंह को व्यभिचार में लिप्त दिखाता है जिसमें पता चलता है कि वह कितना सख्त है । लेकिन यह पर्याप्त नहीं है और निर्देशक को हुकुम देव और उनकी पत्नी के बीच के समीकरण को और दिखाने की कोशिश करनी चाहिए थी । इसके अलावा फ़िल्म में कई शार्प डायलॉग्स रिपीट हुए जिससे फ़िल्म का असर फ़ीका लगा । इतना ही नहीं हुकुम देव का अचानक हृदय परिवर्तन होता है जिससे दर्शक कन्फ़्यूज हो जाते है ।

जबरिया जोड़ी की शुरूआत काफ़ी अच्छे नोट पर होती है जिसमें दो किशोरों के बीच प्रेम कहानी को दिखाया जाता है । ये दो किशोर, व्यस्क हो जाते हैं और फ़िल्म में फ़नी पल जारी रहते हैं । जब व्यस्क बबली अपने बॉयफ़्रेंड को इस बात को लेकर सुनाती है कि उसने रेलवे स्टेशन पर पलट कर नहीं देखा, मजेदार लगता है । अभय का परिचय भी काफ़ी मजेदार तरीके से होता है । फ़िल्म के सपोर्टिंग किरदार भी फ़िल्म मेम बहुत मनोरंजन लेकर आते है । जिस तरह से बबली पूरी तरह से बेखबर है कि उसकी शादी पप्पू से हो रही है न कि अभय से, यह पचा पाना थोड़ा मुश्किल है । क्या उसके आस-पास घूम रहे किसी भी शख्स ने एक बार भी दुल्हे का नाम नहीं लिया ? पोस्ट-इंटरवल का हिस्सा एक आशाजनक नोट पर शुरू होता है क्योंकि बबली अभय से जबरन शादी करने का फैसला करती है । जिस तरह से इस सीन को फ़िल्माया है, बहुत ही मजे्दार है । लेकिन इसके बाद फ़िल्म बिखरने लगती है । एक्शन से भरे क्लाइमेक्स के कारण फ़िल्म हर चीज की भरपाई कर जाती है और दर्शकों को खुश कर उचित नोट पर समाप्त होती है ।

सिद्धार्थ मल्होत्रा अच्छी फ़ॉर्म में नजर आते है और ये रोल उन पर बहुत जंचता है । एक सीन, जहां बबली के दोस्त अभय का अपहरण करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जिस मिनट वे उसे देखते हैं उससे डर जाते हैं, वह सीन देखने लायक है । कुछ सीन में सिद्धार्थ की परफ़ोरमेंस थोड़ी कमजोर लगती है । उन्हें कुछ सीन में और निखरकर सामने आना चाहिए था । परिणीति चोपड़ा अपने रोल को बेहतरीन ढंग से करती है और बबली के रूप में वह परफ़ेक्ट लगती है । सेकेंड हाफ़ में, वह सरप्राइजिंगली नरम प।द जाती है, जो उनके किरदार से मेल नहीं खाता है । लेकिन इस पल वह अपनी अमिट छाप छोड़ती है । जब अभय बबली को लेने आता है उस सीन में परिणीति अपनी छाप छोड़ती है । अपारशक्ति खुराना (शंकु) बहुत ही सहजता के साथ अपने किरदार में समा जाते है । संजय मिश्रा निष्पक्ष हैं और विशेष रूप से उस सीन में हंसी लेकर आते हैं जहां वह 'प्रतिबंधित' शराब का सेवन करते है । चंदन रॉय सान्याल (गुड्डू) अपने रोल में जंचते है । मोहित बघेल (हल्ला) काफी मजाकिया हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं । राशुल टंडन ओवरबोर्ड जाते हैं और फिर भी भरपूर मनोरंजन करते हैं और खूब हंसाते हैं । जावेद जाफ़री सख्त पिता के रूप में अच्छे लगते है । शीबा चड्ढा को इतना अच्छा स्पेस नहीं मिलता है । नीरज सूद के कुछ मज़ेदार संवाद हैं इसलिए लगता है कि उनकी मौजूदगी स्क्रीन पर और होती, लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं होता है । शरद कपूर सख्ती से ठीक हैं । गोपाल दत्त (इंस्पेक्टर तिवारी) कैमियो रोल में बहुत अच्छे लगते हैं । आर्यन अरोरा और गुरमीत कौर क्रमशः युवा अभय और बबली के रूप में प्यारी लगती हैं । एली अवराम आइटम सॉन्ग में सिजलिंग लगती हैं ।

संगीत इतना अच्छा नहीं है क्योंकि यह फ़िल्म की थीम से मेल नहीं खाता है । जिला हिलेला' एकमात्र ऐसा गीत है जो फ़िल्म की थीम और सेटिंग से मेल खाता है । 'खड़के ग्लासी' भी एक अच्छा गीत है और अंत में प्ले होता है । चित्रांकन के कारण 'ढूंढे अखियां' अच्छा लगता है । 'ख्वाबफरोशी', 'की होंडा प्यार' और 'मच्छरदानी' निराशाजनक हैं । जोएल क्रस्टो की पृष्ठभूमि स्कोर नाटकीय है । बॉस्को मार्टिस की कोरियोग्राफी ('खड़के ग्लासी') और आदिल शेख की कोरियोग्राफी ('जिला हिलेला') अच्छी है ।

विशाल सिन्हा की सिनेमैटोग्राफी निष्पक्ष है और छोटे शहरों के कुछ सीन बहुत अच्छे से कैप्चर किए गए है । रजत पोद्दार का प्रोडक्शन डिजाइन यथार्थवादी है । मालविका काशीकर, निहारिका जॉली और अक्षय त्यागी की वेशभूषा स्टाइलिश है । लेकिन परिणीति चोपड़ा का क्रॉप टॉप्स थोड़ा हटकर लग रहा है और पटना में फिल्म बेस्ड है इसलिए यह यहां अटपता लगता है । विक्रम दहिया के एक्शन यथार्थवादी है । देव राव जाधव का संपादन कुछ दृश्यों से क्रिस्प हो सकता था ।

कुल मिलाकर, जबरिया जोड़ी एक अच्छी मनोरंजक फ़िल्म है । पकड़वा विवाह जैसे गंभीर मुद्दे पर बेस्ड होने और फ़नी डायलॉग्स के कारण यह फ़िल्म पसंद आती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म, स्वतंत्रता दिवस पर बड़ी फ़िल्मों से टकराने से पहले अच्छा कारोबार करेगी ।