पिछले कुछ हफ़्तों से बॉक्सऑफ़िस काफी सुस्त नजर आया है । इस हफ़्ते बॉक्सऑफ़िस पर रिलीज हुई अमिताभ बच्चन अभिनीत पिंक, ए कोर्टरुम ड्रामा, जो कि समाज में युवा महिलाओं की स्थिती के संवेदनशील पहलू को दर्शाती है । क्या पिंक बॉक्सऑफ़िस पर एक रंग़ीन फ़िल्म साबित होगी या ये अपने सारे रंग खो देगी, आइए समीक्षा करते हैं ।

सुजीत सरकार के पिंक अनिवार्य रूप से भारतीय महिलाओं द्दारा हर दिन झेली जाने वाली असमानता और पाखंड जैसी तमाम जटिल समस्याओं की एक बहुत सरल कहानी है । इस फ़िल्म की शुरूआत होती है  मीनल अरोड़ा (तापसी पन्नू), फलक अली (कीर्ति कुल्हाड़ी) और एंड्रिया (एंड्रिया तेरियांग) के एक 'परेशान' परिचय के साथ और इन्हीं के साथ एक सेवानिवृत्त वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) के मूक परिचय के साथ । मीनल, फ़लक, एंड्रिया दिल्ली में पेइंग गेस्ट के रूप में एक साथ रहती हैं, और खुद की जरूरतों को पूरा करने लायक कमा लेती हैं । एक भयानक हादसे के कारण ये तीनों लड़किया अपनी हंसी और मन की शांति खो बैठती हैं । एक रात राजवीर (अंगद बेदी) और उसके दोस्त शराब पीकर मीनल (तापसी पन्नू) और उसकी दो दोस्तों के साथ छेड़छाड़ करते हैं और यह एक दुर्घटना का कारण बनता है । अपने बचाव में मीनल राजवीर पर एक बोटल से हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर देती है । इस घटना के बाद, चूंकि राजवीर एक राजनीतिज्ञ का भतीजा है, तीनों लड़कियों पर चौतरफ़ा हमले होने लगते हैं । जल्द ही राजवीर के दोस्त उन लड़कियों को धमकी देना शुरु कर देते हैं । जब ये घटना पुलिस में दर्ज हो जाती है, तब जांच, पूछताछ और तीन लड़कियों के चरित्र हनन की बातों की श्रृंखला शुरू होती है । जहां इन लड़कियों का केस कोई भी वकील लेने को तैयार नहीं होता है वहीं इन तीनों को एकमात्र किरण के रूप में दिखाई देते हैं रिटायर्ड वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन), जिसने काफ़ी साल पहले वकालात छोड़ दी थी, एक स्वयंसेवक के रूप में उनका केस लड़ने के लिए तैयार हो जाते है । एक शक्तिशाली विपक्ष के खिलाफ लड़कियां अपनी बेगुनाही कैसे साबित करेंगी और क्या दीपक सहगल केस जीतने में उन लड़कियों की मदद कर पाते हैं और उनका नाम उस केस से निकलवा पाते हैं, ये सब बाकी की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चल पाता है ।

पिंक के प्रोमो को देखकर ऐसा लगा कि ये फ़िल्म काफ़ी तीक्ष्ण और यथार्थवादी है । प्रोमो को देखकर लोगों ने एक तीक्ष्ण और एक यथार्थवादी सिनेमा की उम्मीद लगाई थी । तथ्त यह है कि पिंक इस पहलू में बिल्कुल भी निराश नहीं करती है । इसकी मनोरंजक पटकथा अंत तक आपका ध्यान आकर्षित करती है । फ़िल्म के धीमे कथानक होने के बावजूद, विशेषरूप से फ़र्स्ट हाफ़ में, ये फ़िल्म आपको बांधे रखती है और सम्मोहित करती है । फ़िल्म के कुछ संवाद (रितेश शाह) काफ़ी दमदार है, जो स्थिती विशेष और संबधित कारकों को उभारने में सफ़ल रहे हैं । हमारी सलाह है कि दर्शक कोर्टरूम ड्रामा को मिस न करें, खास तौर पर जब अमिताभ बच्चन  तापसी पन्नू और अगंद बेदी से पूछताछ करते हैं, और तब भी जब कीर्ती कुल्हाड़ी अदालत में बिलख पड़ती है ।

फ़िल्म के निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी, जो बंगाली सिनेमा का एक बड़ा नाम है, ने एक मास्टर कथाकार के रूप में पिंक के साथ अपना बॉलीवुड डेब्यू किया है । हालांकि फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ फ़िल्म को स्थापित करने में इस्तेमाल होता है, वहीं फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ बहुत बांधे रखने वाला है जो फ़िल्म को तेजी से आगे बढ़ाने में बहुत मदद करता है । जिस तरीके से अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने फिल्म के अभिनेताओं से यथार्थवादी प्रदर्शन को निचोड़ा है वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है । दमदार कंटेट होने के बावजूद ये फ़िल्म  अपने विषय के कारण काफ़ी गंभीर/कठोर लगती है । इसके अलावा, ये फिल्म कुछ तत्वों की स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं करती है जैसे, अमिताभ बच्चन और सारा नाम की एक बीमार महिला के बीच का रिश्ता ।  दूसरी बड़ी कमी ये थी कि तापसी पन्नू का कार में दूसरी बार छेड़छाड़ होने के बावजूद अदालत में इस केस की इस तरह की एक बड़ी घटना का कोई जिक्र नहीं हुआ । इसके अलावा, कीर्ति कुल्हाड़ी का नकली 'अश्लील पोस्टर' वाला सीन, फ़िल्म में जबरदस्ती का घुसाया हुआ लगता है ।

फ़िल्म पिंक निस्संदेह और निर्विवाद रूप से अत्यंत उत्कृष्ट अमिताभ बच्चन, जिसने पूरी फ़िल्म को चुरा लिया, के साहसपूर्ण प्रदर्शन से अलंकृत है । यद्यपि ऐसा पहली बार नहीं है जब अमिताभ बच्चन ने फ़िल्मी पर्दे पर एक वकील की भूमिका निभाई हो, लेकिन फ़िर भी अमिताभ पिंक में कुछ अलग कर दिखाने में कामयाब रहे । यह कहना गलत नही होगा कि, पिंक में अमिताभ बच्चन ने केवल बेहतरीन अभिनय का परिचय दिया है बल्कि ये उनके करियर की सबसे बेहतरीन अभिनयों में से एक सर्वश्रेष्ठ परफ़ोरमेंस है । दूसरे नंबर हैं तापसी पन्नू, जिसने बहुत ही ईमानदारी के साथ मीनल के किरदार को दर्शाया है, और फ़िल्म में अपनी जगह बनाने में सफ़ल रहीं । तापसी पन्नू निश्चित रूप से इस साल अनेक पुरस्कारों की एक गंभीर दावेदार होंगी । कीर्ति कुल्हाड़ी, जिसकी पिछली फ़िल्म जल भूलने योग्य थी, ने भी पिंक में शानदार अभिनय किया है । फ़िल्म में जितनी जगह उन्हें दी गई उसमें भी उन्होंने जान डाल दी । वहीं दूसरी तरफ़, एंड्रिया तेरियांग ने भी बहुत अच्छा काम किया है । हालांकि, अंगद बेदी मुश्किल से  विश्वसनीय लगे, लेकिन पीयूष मिश्रा और उनका 'कोर्टरुम ड्रामा' असाधारण है । जज की भूमिका में ध्रीतिमन चटर्जी काफ़ी विश्वसनीय लगे हैं । फ़िल्म की बाकी की कास्ट फ़िल्म को सफ़लतापूर्वक आगे बढाने में मददगार साबित हुई है ।

हालांकि फ़िल्म में संगीत (शांतनु मोइत्रा) के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन इसका बेकग्राउंड स्कोर (शांतनु मोइत्रा) अत्यंत रूप से बार-बार याद आने वाला है और जो फिल्म के लिए एक माहौल बनाता है । फिल्म का छायांकन (अवीक मुखोपाध्याय) अच्छा है । फिल्म का संपादन (बुधादित्य बनर्जी ) औसत है ।

कुल मिलाकर, पिंक एक सम्मोहक फिल्म है जो हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ दोहरे मापदंड और पाखंड को उजागर करती है । कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के साथ ये फ़िल्म आपको हैरान, अवाक और दंग करती है । बॉक्सऑफ़िस पर ये दर्शकों द्दारा सराही जाएगी और उनके द्दारा किया गया सकारात्मक मौखिक प्रचार से फ़िल्म को देखने के लिए निंसंदेह भीड़ उमड़ेगी । एक मजबूत संदेश देने वाली इस फ़िल्म को मिस मत कीजिए ।

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