खेलों पर बनने वाली बायोपिक अक्सर क्रिकेट, बॉक्सिंग जैसे खेलों की मुख्यधारा पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं । फ़्रीकी अली ने नजरअंदाज किए हुए खेल, गोल्फ़ को चुनकर कुछ अलग करने की हिम्मत जुटाई है । खेल में ह्यूमर का तड़का लगाते हुए फ़िल्म में एक साधारण, गरीब आदमी से, अमीरों का खेल माने जाने वाले खेल के विश्व चैम्पियनशिप विजेता बनने की कहानी को दर्शाया गया है । क्या यह प्रयोग बॉक्सऑफ़िस पर कमाल कर पाएगा या नहीं । आइए समीक्षा करते हैं ।

मुंबई की गलियों में पला-बढ़ा, अली (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) एक गोद लिया हुआ अनाथ बच्चा है जो कुछ अलग तरह का काम करने की कोशिश करता है जैसे पुरुषों के अंडरगारमेंट्स बेचना । एक सेल्समेन होने की वजह से उसकी सगाई टूट जाती है और इस वजह से वो इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करने वाली अपनी मां (सीमा विश्वास) की आंखों में आंसू देखता है जो उसे झकझोर कर रख देती है । और यहीं से अली किसी भी तरह से अमीर बनने का फ़ैसला करता है । अली अपने सबसे अच्छे दोस्त मकसूद (अरबाज खान ),एक छोटे समय सोहेल खान उर्फ डेंजर भाई (निकेतन धीर) के साथ धन उगाही करने के लिए हाथ मिलाता है । इसके अलावा, अली सिर्फ़ एक खेल को लेकर बहुत जुनूनी है वो है क्रिकेट, और यहां तक की गली किक्रेट में वह हर बॉल पर छक्का मारने का चैलेंज भी जीत चुका है । उसकी जबरन वसूली के कार्य के दौरान, वह गोल्फ़िंग चैलेंज लेने का फ़ैसला ले बैठता है और उस चैलेंज को जीत भी जाता है ।  अली के इस कारनामे को उसका पड़ौसी और हितैशी किशन लाल (आसिफ़ बसरा) पहचान जाता है और उसको लगता है कि अली गोल्फ़ की दुनिया में तहलका मचा सकता है । अली की किस्मत उसको नए लक्ष्य, सपने के साथ एक नई जिंदगी की ओर ले जाती है और एक नई दोस्त और प्यार मेघा (एमी जैक्सन) मिलती है, साथ ही उसे विक्रम राठौड़ (जस अरोरा) जैसे दुश्मन भी मिलते हैं ।

इसके बाद बहुत सारे मैच होते है जहां पर अली को अपने कोच किशन लाल के सामने अपने आपको साबित करना होता है और इसी दौरान अली को जीत के भूखे विक्रम राठौड़ और स्वार्थी डेंजर भाई का भी सामना करना पड़ता है, जो टूर्नामेंट में अली की हार सुनिश्चित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है , और भले ही इसके लिए उसको अली की गर्लफ़्रेंड को उसके खिलाफ़ ही क्यों न खड़ा करना पड़े।

फ़्रीकी अली के साथ एक नए खेल को प्रकाश में लाने के लिए हमें अभिनेता से निर्माता बने सोहेल खान की सराहना करनी चाहिए । ये हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में क्रिकेट पूरा ध्यान अपनी ओर ले जाता है और दूसरे खेल जैसे गोल्फ़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है । ये फ़िल्म हमें कई बार एडम सैंडलर अभिनीत फिल्म हैप्पी गिलमोर की याद दिलाती है । और इसका फ़र्स्ट हाफ़ काफ़ी पिछड़ा और हास्य से भरा है और अली की हरकतों के चलते आप हंसते -हंसते लोटपोट हो जाएंगे । सेकेंड हाफ़ के दौरान फ़िल्म से उम्मीदें बढ़ जाती हैं, लेकिन यहां आकर जल्द ही निराशा हाथ लगती है क्योंकि निर्देशक सोहेल खान जो फ़िल्म के शुरूआती क्षणों में फ़िल्म को लेकर जो उत्साह जगाते हैं, उस बैंचमार्क को बनाए रखने में असफ़ल साबित होते हैं । सेकेंड हाफ़ में एक दलित व्यक्ति की ही जीत होती है, ये एक प्रीडिक्टबल कहानी है । हास्य के मामले में फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ मात खा जाता है वनस्पत फ़र्स्ट हाफ़ के जिसमें शानदार पंचलाइन देखी जा सकती है ।

विशेष उल्लेख, संवाद लेखक राज शांड्याल के लिए, जो नवाजुद्दीन सिद्दीकी को सबसे अच्छे संवाद देने में कामयाब रहे, विशेषरूप से उनके परिचय सीन में जहां वह पुरुषों के अंडरगारमेंट्स बेचते हैं । काश सेकेंड हाफ़ में उनके इन हास्यपद संवादों की सीरिज को बनाए रखा जा सकता था । राज के साथ सोहेल खान द्वारा लिखित पटकथा अच्छी है लेकिन औसत से परे कुछ भी नहीं है । ये फ़िल्म उन फ़िल्मों के बीच अपनी जगह बना पा रही है जिसमें एक दलित व्यक्ति अपने लक्ष्य को आखिरकार प्राप्त कर ही लेता है और हालांकि इस फ़िल्म में करो या मरो जैसी कुछ ऐसी परिस्थितियां भी दिखाईं गई हैं जो आसानी से नजरअंदाज करी जा सकती थी ।

जहां तक अभिनय की बात है तो फ़्रीकी अली पूरी तरह से अकेले नवाजुद्दीन सिद्दीकी के कंधों पर विराजमान है । इसमें कोई अनुमान लगाने वाली बात नहीं है कि नवाज ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है । हमेशा से गंभीर भूमिका निभाने वाले नवाज का इस फ़िल्म में कॉमेडी से भरा रोल है जिसमें वो खूब जंचे हैं । नवाज के अलावा फ़िल्म में जान डाली है अरबाज खान ने, जिसकी हास्यपद संवाद खूब हंसाते हैं । अरबाज खान ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है ।  वहीं दूसरी तरफ़, ग्लैमरस और खूबसूसरत एमी जैक्सन अच्छी लगीं लेकिन उनका किरदार नवाज के साथ थोड़ा अपरिपक्व लगा । नवाज की मां के किरदार में सीमा विश्वास ने बेहतरीन अभिनय किया है । इसके अलावा नवाज के कुंवारे अंकल का भी विश्वसनीय अभिनय रहा । बाकी के कलाकार फ़िल्म को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं । फ़िल्म के अंत में जैकी श्रॉफ़ का कैमियो जबरदस्ती का घुसाया हुआ लगता है । यहां तक की उनका 'भिड़ु' शब्द भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाया ।

फिल्म के संगीत (साजिद - वाजिद अली) को लेकर घमंड करने जैसा कुछ भी नहीं है और संपादन (प्रशांत सिंह और राठौर) बिल्कुल ही औसत है । फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी  (महेश लिमये) अच्छी   है ।

कुल मिलाकर, फ़्रीकी अली में फ़र्स्ट हाफ़ में ह्यूमर को बहुत संभाल कर रखा गया है और फ़िल्म की शुरूआत में कई सारे गुदगुदाने वाले पल आते है लेकिन सेकेंड हाफ़ में ह्यूमर फ़िसलता हुआ नजर आता है और इसी के साथ फ़िल्म की कहानी बहुत प्रीडेक्टेबल हो जाती है जो कि काफ़ी निराश करती है ।

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