रितेश देशमुख ने साल 2003 में फ़िल्म तुझे मेरी कसम से अपने बॉलीवुड करियर की शुरूआत की थी और आज वो जिस ऊंचाई तक पहुंचे हैं, इस दरमियां वो अपने आपको बहुमुखी और काफ़ी सुलझे हुए अभिनेता के रूप मे साबित करने में सफ़ल रहे हैं । हालांकि इसमें कोई दो राय भी नहीं कि उन्होंने अपने करियर की ज्यादातर हिट फ़िल्में मल्टी स्टारर फ़िल्मों में दी हैं । इस हफ़्ते बॉक्सऑफ़िस पर रिलीज हुई रितेश देशमुख की सोलो हीरो वाली फ़िल्म बैंज़ो, जिसमें रितेश के अपोजिट नरगिस फ़ाखरी नजर आईं हैं । क्या बैंजो, दोनों के लिए इसके मेकर्स और रितेश देशमुख दोनों के लिए संगीतमय साबित होगी,या ये फ़िल्म अपने सुर के तार खो देगी, आइए समीक्षा करते हैं ।

बैंजो आवश्यकरूप से एक म्यूजिकल एक्शन फ़िल्म है जो एक म्यूजिशियन की रोजी-रोटी और उसके आत्म-सम्मान को लेकर कोई समझौता किए बगैर इस दुनिया में उसके अस्तित्व को बनाए रखने की कहानी है । फ़िल्म की शुरूआत मुम्बई के रहने वाले बैंजो प्लेयर नन्द किशोर उर्फ तरात (रितेश देशमुख), जो अतिरिक्त पैसे की खातिर दो-दो काम एक साथ करता है, के म्यूजिकल परिचय के साथ होती है ।  तरात के बैंजो बैंड में तीन सदस्य होते हैं पेपर, ग्रीस  (धर्मेश येलेंडे) और वाजा । वहीं दूसरी तरफ़, न्यूयॉर्क बेस्ड क्रिस (नरगिस फाकरी) एक प्रतिष्ठित संगीत चैम्पियनशिप में प्रवेश करना चाहती है । विश्वस्तर की म्यूजिक चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए वह सही म्यूजिक की तलाश करती है, और इसमें उसकी मदद करता है उसका मुंबई बेस्ड दोस्त (ल्यूक केनी) । वह मदद के रूप में नरगिस को गणेशोत्सव त्योहार के दौरान तरात की बैंजो परफ़ोरमेंस की एक रिकॉर्डिंग भेजता है । नरगिस तरात की परफ़ोरमेंस देखकर बहुत प्रभवित हो जाती है । इसे देखने के बाद नरगिस मुंबई आती है और तरात और उसके प्रतिभाशाली टीम मेंबर्स की खोज करती है ताकि वो उनके साथ मिलकर विश्वस्तर की म्यूजिक चैम्पियनशिप में भाग ले सके । तरात अनजाने में मुंबई में क्रिस का गाइड और दोस्त बन जाता है । और, ऐसा करते समय वह क्रिस के प्यार में पड़ जाता है । और इसी समय तरात और उसके साथी कलाकार क्रिस के सामने ये खुलासा करते हैं कि वे बैंजो प्लेयर हैं, लेकिन अपमान और अस्वीकृति के डर से बचने के कारण बताते नहीं हैं । उन्हें फ़िर भी ये पता नहीं होता कि क्रिस उनके ही बैंड को ढूंढने के लिए भारत आई है । एक दिन का किस्सा है जब क्रिस को तरात और उसके बैंजो बैंड के बारें पता चलता है तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है और वह तुरंत अपने गाने के लिए उनके साथ जुड़ जाती है । इन सबके बीच, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित होती है जो पूरी तरह से तरात, उसके बैंड के सदस्य और क्रिस की जिंदगी को बदलकर रख देती है । क्या तरात क्रिस के सामने अपने दिल की बात कहने का साहस जुटा पाएगा, ऐसा क्या दुर्भाग्यपूर्ण हुआ था जिसने तरात और उसके साथी कलाकारों को जुदा कर दिया और क्या तरात क्रिस की उसके म्यूजिक चैम्पियनशिप में पहुंचने में मदद करने में सफ़ल होता है, ये सब बाकी की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

बैंजो का प्रोमो स्ट्रीट म्यूजिशियन के जीवन का संक्षिप्त चित्रण बहुत खूबसूरती से करती है, फ़िल्म इस पर पूरी तरह प्रकाश डालने में सफ़ल रही है । फिल्म की कहानी का सेटअप (कपिल सावंत, निखिल मेहरोत्रा और रवि जाधव) सम्बद्ध है । एक ठोस शुरुआत लेने के बाद, ये फ़िल्म उन लोंगो के (गुमनाम प्रतिभाओं), जो मलिन बस्तियों में रहते हैं,  के जीवन, जीवनशैली और उनके सपनों पर प्रकाश डालती है । यह फ़िल्म बैंजो प्लेयर नन्द किशोर उर्फ तरात (रितेश देशमुख) और उनके बैंड मेंबर्स के किरदार को स्थापित करने में सफ़ल साबित होती है । इस फ़िल्म में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के जीवन और उनकी जीवनशैली को बहुत ही अच्छी तरह से चित्रित किया गया है । फिल्म के संवाद (कपिल सावंत, निखिल मेहरोत्रा और रवि जाधव), सरल, आडंबरहीन और हास्यास्पद हैं । फ़िल्म में ऐसे कई वन-लाइनर्स हैं जिन्हें फ़िल्म में पंचेस की तरह इस्तेमाल किया गया है, जो निश्चित रूप से दर्शकों को पसंद आएंगे ।

नटरंग, बालगंधर्व, बालक-पालक, टाइमपास, रेगे  और कई अन्य बेहतरीन मराठी फ़िल्मों में अपने निर्देशन का लोहा मनवा चुके निर्देशक रवि जाधव ने बैंजो के साथ अपना बॉलीवुड डेब्यू किया है । 'सार्थक दिशा' में एक अनुभवी हाथ होने के नाते, रवि जाधव ने बैंजो में अच्छा काम किया है । लेकिन फिल्म के कमजोर लेखन और उलझा देने वाली कहानी के कारण फ़िल्म कई जगहों पर अपनी कहानी से भटकती हुई नजर आती है । एक यही बात है जो रवि जाधव को निर्देशन में अपना पुरा जोर लगाने से रोक रही है । उदाहरण के तौर पर, नरगिस का किरदार और उसका जीवन का लक्ष्य दर्शकों को उलझाने वाला है । फ़िल्म में नरगिस का किरदार एक डीजे के तौर पर शुरू होता है जो बाद में एक म्यूजिक प्रोड्यूसर बनता है और अंत में एक परफ़ोरमर के रूप में उभरता है । और ये सब होता है क्योंकि वो न्यूयॉर्क म्यूजिक फ़ेस्टिवल में भाग लेना चाहती थी, जो फ़िल्म में होते हुए भी कभी दिखाया ही नहीं जाता । उनका रितेश के ग्रुप में शामिल होना, प्रायोजकों की खोज, भारतीय क्ल्ब में परफ़ोर्म करना और उनके भारत आने के मकसद को पूरा ही नहीं करता है । वहीं दूसरी तरफ़, यहां तक की मोहन कपूर का किरदार को निश्चित रूप से अधिक स्पष्टता की आवश्यकता थी । फ़िल्म का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू है इसका अचानक खत्म हो जाना । फ़िल्म का अचानक ख्त्म होना, फ़िल्म को छोटा करने का पहले से सोचे हुए प्रयास जैसा लगता है , जो निश्चित रूप से इस फिल्म की कथा पर बुरी तरह से उल्टा दाँव दिखाई पड़ता है ।

अभिनय की बात की जाए तो, ये पूरी फ़िल्म रितेश देशमुख के कंधो पर विराजमान है । मल्टी स्टारर फ़िल्मों (ज्यादातर डबल मिनिंग कॉमेडी),में अपना लोहा मनवाने के बाद, रितेश देशमुख को इस इंटेस अवतार में देखना वाकई बहुत अच्छा अनुभव रहत है । बैंजो, रितेश देशमुख के जिम्मेदारी से भरे शानदार अभिनय के साथ एक सोलो फ़िल्म नजर आती है । वहीं दूसरी तरफ़, नरगिस फ़ाखरी ने फ़िल्म में अच्छा अभिनय किया है । वह अपने किरदार में पूरी तरह डूब गई हैं और इसलिए, वह अपने विदेशी किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय करने में सफ़ल होती हैं साथ ही झुग्गी में रहने वाले एक बैंजो प्लेयर के साथ तालमेल बिठा पाने और उसकी विचित्र जीवन शैली को अपनाने में संघर्ष करने में सफ़ल होती हैं । ल्यूक केनी, जो पूरी तरह से फ़िल्म में अपने किरदार में नजर आए, बहुत विश्वसनीय लगे । फ़िल्म के उस सीन को मिस मत कीजिए जिसमें वह रितेश देशमुख और अपने बैंड के सदस्यों को (मराठी-हिन्दी शब्दावली में) अपनी पहचान बताता है । धर्मेश येलांडे, जो अपनी डांसिंग कौशल के लिए ज्यादा जाने जाते हैं, इस फ़िल्म में एक चमत्कार के रूप में सामने आते हैं । उनकी कॉमेडी टाइमिंग जबरदस्त है । अन्य कलाकार, जिन्होंने रितेश के बैंड के सदस्यों की भूमिका निभाई है, बहुत शानदार रहे हैं ।

जहां तक फ़िल्म के संगीत (विशाल-शेखर) का सवाल है, बैंज़ो एक म्यूजिकल होने के बावजूद सिर्फ़ एक गाना उड़न छू चार्टबस्टर साबित होगा । इसके अलावा फ़िल्म के बाकी के गाने सुखद रहे हैं, लेकिन कोई ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ते । वहीं दूसरी तरफ़ इस फ़िल्म का पृष्ठभूमि स्कोर (सौरव रॉय) अच्छा है और फ़िल्म को बयां करने में तालमेल बिठता है ।

फिल्म का छायांकन (मनोज लोबो) अच्छा है । फिल्म का संपादन (देवेंद्र मुर्देश्वर) औसत है ।

कुल मिलाकर, बैंजो अपने कम प्रचार के कारण, उलझा देने वाले सेकेंड हाफ़ और विचित्र क्लाइमेक्स के कारण मात खा जाती है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म दर्शकों को जुटाने के लिए संघर्ष करेगी ।

टैग: Banjo