बॉलीवुड में कई शैलियों के ऊपर परीक्षण हुएं हैं जिसमें से टाइम ट्रेवल अभी तक अपनी 'नवजात' अवस्था में है । तथ्य बताते हैं कि टाइम ट्रेवल शैली की फ़िल्में (लव स्टोरी 2050, फ़नटूश ..., एक्शन रिप्ले) बॉक्सऑफ़िस पर कभी हिट साबित नहीं हुईं ।  इस हफ़्ते बॉक्सऑफ़िस पर रिलीज हुई सिद्धार्थ मल्होत्रा और कैटरीना कैफ़ अभिनीत फ़िल्म बार बार देखो । यह फ़िल्म भी टाइम ट्रेवल शैली की फ़िल्म है । क्या यह फ़िल्म बॉक्सऑफ़िस पर अपने नाम को सार्थक करेगी या यह बिल्कुल उलटा पड़ जाएगा, आइए समीक्षा करते हैं  ।

बार बार देखो फ़िल्म दो जिंदगियों की उठापठक की कहानी है । फिल्म दिल्ली और लंदन में क्रमश: जय वर्मा (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और दिया कपूर (कैटरीना कैफ) के जन्म के साथ शुरू होता है । इसके बाद दिया कपूर का परिवार भारत में सेटल डाउन हो जाता है । जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है जय और दिया साथ-साथ बड़े होते हैं और फ़िर एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं ।  एक-दूसरे को जानने के कई सालों बाद पेंटर दिया 'गणित ग्रस्त प्रोफेसर' जय को शादी के लिए प्रस्ताव रखती है और यह बात जय को काफ़ी परेशान कर देती है क्योकि जय शादी के नाम से भी घबरता है । उनकी शादी के ठीक पहले, दिया जय को अपने अमीर पिता (राम कपूर) द्दारा उपहार में दिया हुआ आलीशान घर दिखाने के लिए ले जाती है । ये उपहार न केवल जय के स्वाभिमान को धक्का पहुंचाता है बल्कि इस बात के लिए भी हिम्मत दे देता है कि वो दिया को जाकर कह देता हि कि वह अभी शादी के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसके जीवन का मुख्य लक्ष्य उसका करियर है । ये बात दिया को दुख पहुंचाती है । इसके बाद शोक में डुबा हुआ जय शैम्पेन की पूरी बोतल गटक जाता है । और जब वह अगली सुबह जागता है तो वह अपने चारों ओर की दुनिया और टाइमजोन को बदला हुआ देखता है । खुद को अपने भविष्य में देख जय के पैरों तले जमीन खिसक जाती है ।  एक तरफ़, तो वह खुद को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक ड्रीम जॉब से इस्तीफ़ा देता हुआ देखता है वहीं दूसरी तरफ़ वह देखता है कि उसकी पत्नी दिया उसे तलाक दे रही है और जा रही है । इतना ही नहीं, जय अपने जीवन के कई अलग_अलग महत्वपूर्ण चरणों को जीता है । इन सब के बीच जय अपने टाइम ट्रेवल को कैसे संभालता है और क्या वो उन रहस्यों को उजागर करने में सफ़ल होता है, यह सब फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

जब बार बार देखो के प्रोमो रिलीज किए गए थे तब ऐसा लगा था कि यह फ़िल्म टाइम ट्रेवल शैली की फ़िल्मों में एक अच्छा प्रयास थी । हकीकत में,  फ़िल्म की पटकथा (श्री राव, नित्या मेहरा, अनुवब पाल) ने फ़िल्म को पूरी तरह से दबा दिया है । भ्रामक होने के अलावा फ़िल्म की पटकथा पूरी तरह से धीमी और असंबद्ध है, जो इसे दर्शकों से जुड़ने में मुश्किल पैदा करती है । फिल्म के संवाद (अन्विता दत्त) बिना किसी उत्कृष्ट वन लाइनर के साथ बहुत ही औसत है । यद्यपि फ़िल्म से हास्य बिल्कुल नदारद है, लेकिन वहीं यह फ़िल्म अनजाने में हुई थोड़ी बहुत कॉमेडी के क्षणों से भरी हुई है ।

लाइफ़ ऑफ़ पाई, डॉन और लक्ष्य जैसी बेहतरीन फ़िल्मों को असिस्ट कर चुकीं  नवोदित निर्देशक नित्या मेहरा बार बार देखो को दर्शाने में कमजोर साबित हुईं । बार बार देखो से बतौर निर्देशक पारी की शुरूआत करने वाली नित्या मेहरा ने इस फ़िल्म के लिए टाइम ट्रेवल शैली के पहलू को उठाकर बहुत बड़ी गलती की जो कि इसकी कमजोर कड़ी साबित हुई है । फ़िल्म में जिस तरह से टाइम ट्रेवल के विषय को काफ़ी कमजोर तरीके से हैंडल किया गया है, और उससे ये साबित होता है कि इस विषय पर फ़िल्म बनाने के लिए काफ़ी अनुभव की जरूरत पड़ती है । जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है तो ये लगने लगता है कि बार बार देखो हॉलीवुड की निकोलस केज अभिनीत फ़िल्म द फ़ैमिली मैन और एडम सैंडलर अभिनीत फ़िल्म क्लिक से बहुत ज्यादा प्रेरित लगती है । बार बार देखो का फ़र्स्ट हाफ़ (विशेष रूप से शुरूआत के 30 मिनट) बहुत दिलचस्प हैं, लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म में सिद्धार्थ का किरदार टाइम ट्रेवलिंग शुरू करता है फ़िल्म धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है । फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ और भी ज्यादा बदतर होता जाता है और ये आपके सब्र का इम्तिहान लेता है जब सिद्धार्थ फ़िर से चौथी बार ट्रेवलिंग शुरू करता है । यह कहना गलत नहीं होगा कि बार बार देखो का भले ही सार भारतीय है लेकिन इसका कॉंसेप्ट बिल्कुल विदेशी है । इन सबके चलते ये फ़िल्म  खिचड़ी बन गई है और किसी बेहतर रिजल्ट पर नहीं पहुंचती है ।  और जब अंत में फ़िल्म के बेतुके संसपेस का खुलासा होता है तो पूरी तरह से ये लगता है कि फ़िल्म के मेकर्स ने दर्शकों को कितना कम आंका है ।

अभिनय की बात करें तो, ये फ़िल्म पूरी तरह से सिद्धार्थ मल्होत्रा के कंधो पर विराजमान है ।  अपनी पिछली फ़िल्म कपूर एंड संस मे बेह्तरीन अभिनय करने वाले सिद्धार्थ मल्होत्रा ने फ़िल्म बार बार देखो में (यदि असाधारण या अतिशयोक्ति नहीं) में भी एक बार फ़िर अपने बेहतरीन अभिनय का परिचय दिया है । सिद्धार्थ इस फ़िल्म में एक युवक की भूमिका में और एक मध्यम आयु वर्ग के आदमी की भूमिका में तो विश्वसनीय रहे लेकिन वह एक बुजुर्ग आदमी की भूमिका के साथ न्याय कर पाने में असफ़ल साबित हुए । लेकिन फ़िर भी सिद्धार्थ ने पूरी फ़िल्म को अपने कंधो पर थामे रखा । वहीं दूसरी तरफ़ कैटरीना कैफ़ ने बार बार देखो में केवल  कामचलाऊ अभिनय किया है । फ़िल्म में ऐसी कई जगह थी जहां कैट अपने किरदार के साथ संघर्ष करती हुईं नजर आईं ।  फ़िल्म कैटरीना और सिद्धार्थ की उम्र में बहुत ज्यादा अंतर नजर आ रहा है लेकिन फ़िर भी दोंनो ने अपने अभिनय से इसकी भरपाई करने की पूरी कोशिश की है । रम कपूर के होते हुए भी फ़िल्म के बाकी कलाकार फ़िल्म में बर्बाद हुए ।

कई संगीत निर्देशक की मौजूदगी के बावजूद (अमाल मलिक, बादशाह, जसलीन रॉयल, बिलाल सईद, प्रेम हरदीप), फ़िल्म का केवल एक लोकप्रिय गाना 'काला चश्मा' ही यादगार साबित  होता है । और जब तक फ़िल्म में ये गाना आता है तब तक दर्शक पहले से ही इस फिल्म में अपनी रुचि खो चुके होते हैं ।

फिल्म का छायांकन (रवि चंद्रन) उत्कृष्ट है । जिस तरीके से उन्होंने लोकेशन को शूट किया वह शीर्ष पायदान पर है । फिल्म का संपादन (अमिताभ शुक्ला) औसत है ।

कुल मिलाकर बार बार देखो एक उलझा देने वाली फ़िल्म है जो दर्शकों की बुद्धिमत्ता को कमजोर समझते हुए उन्हें कम आंकती है । बॉक्सऑफ़िस पर इस फ़िल्म की कहानी चुनिंदा दर्शकों को ही आकर्षित करेगी जबकि दर्शकों की एक बड़ी संख्या इससे जुड़ने में कठिनाई महसूस करेंगे ।

टैग: Baar Baar Dekho