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पिछले कुछ वर्षों में देश में एसिड अटैक की वारदातें चरम सीमा पर पहुंच गई है । यह मुद्दा आज भी एक गहन चिंता का विषय है कि एसिड जैसा खतरनाक और जानलेवा पदार्थ इतनी आसानी से कैसे उपलब्ध हो जाता है । बॉलीवुड में यूं तो कई ज्वलंत मुद्दों पर फ़िल्में बनाई गई है लेकिन ये विषय अभी तक अछूता रहा है । और अब राजी और तलवार जैसी फ़िल्में बनाने वाली दिग्गज फ़ि्ल्ममेकर मेघना गुलजार ने इस मुद्दे को सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने का बीड़ा उठाया है और दीपिका पादुकोण के लीड रोल में फ़िल्म बनाई छपाक, जो इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है । तो क्या मेघना गुलजार का ये प्रयास काम करेगा और लोगों की आंखें खोलेगा या वह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएंगी ? आइए समीक्षा करते है ।Chhapaak Movie Review: दीपिका पादुकोण की छपाक समाज के लिए आईना है

छपाक, एक एसिड अटैक सर्वाइवर के संघर्ष की कहानी को दर्शाती है । मालती (दीपिका पादुकोण) एक 19 साल की लड़की है जिसपर दिल्ली की एक सड़क पर तेजाब से हमला होता है । वहां मौजूद लोग उसे तुरंत अस्पताल ले जाते है । इस एसिड अटैक से मालती का चेहरा बुरी तरह जल जाता है । लेकिन मालती अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए दृढ़ संकल्पित है । वारदात के समय ठीक से नहीं बोल पाने के बावजूद भी वह पुलिस को एसिड अटैकर के नाम बताती है जो बशीर शेख उर्फ बब्बू (विशाल दहिया) और उसकी बहन परवीन है । पुलिस दोनों को गिरफ्तार करती है और बबलू कबूल करता है कि उसने मालती पर तेजाब फेंका था । हैरानी की बात है कि, बबलू मालती का फ़ैमिली फ़्रेंड था और इस हमले के बाद वह कई मर्तबा हॉस्पिटल भी गया । अदालत में मालती की वकील अर्चना बजाज (मधुर त सरगी) को कड़ी टक्कर मिलती है, लेकिन बबलू कुछ आधारों या अन्य पर जमानत लेने में सफ़ल हो जाता है । अर्चना कोर्ट से गुहार भी लगाती है कि अपराधी को सख्त से सख्त सजा दी जाए । वहीं मालती भी अदालत में एक पिटिशन फ़ाइल करती है कि आसानी से उपलब्ध एसिड पर रोक लगाई जाए । इसके बाद आगे क्या होता है यह बाकी फ़िल्म देखने के बाद पता चलता है ।

छपाक, असल जिंदगी की घटना पर बेस्ड फ़िल्म है जो हिलाकर रख देने वाली है । यह एक आंख खोलने वाला भी साबित होती है क्योंकि बहुत से लोग इस स्थिति की गंभीरता से वाकिफ नहीं होंगे और भारत में यह एसिड इतनी आसानी से उपलब्ध है । अतिका चैहान और मेघना गुलज़ार की पटकथा हालांकि असंगत है । फ़िल्म में ऐसे कुछ सीन भी है जहां यह ज्यदा आकर्षित करती है । फ़िल्म इमोशनली कनेक्ट नहीं कर पाती और लेखन भी कमजोर है जिसके चलते फ़िल्म का प्रभाव कम हो जाता है । अतिका चौहान और मेघना के डायलॉग शार्प है ।

मेघना गुलजार का निर्देशन सख्ती से ठीक है । तलवार और राजी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया सिर्फ़ अच्छी कहानी के चलते ही नहीं बल्कि बेहतरीन निष्पादन के लिए भी । लेकिन छपाक की बात करें तो मेघना टॉप फ़ॉर्म में नजर नहीं आई । नेरेटिव के बीच में से फ़िल्म को शुरू करने का विचार काम नहीं करता है । मालती का संघर्ष एक हद तक ही आगे बढ़ रहा है । यहां बहुत कुछ किया जा सकता था लेकिन मेघना बस कुछ प्रमुख दृश्यों पर ज्यादा फ़ोकस रही । यह कोर्टरूम सीक्वंस में स्पष्टरूप से दिखाई देता है । इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण ट्रैक मालती के भाई (डेलज़ाद हिवाले) का है, लेकिन इस एपिसोड को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया गया । बाद में कुछ भी नहीं बताया गया कि भाई और मालती के पिता (मनोहर तेली) के साथ क्या हुआ । अगर मेघना ने वास्तव में यहां अपना सर्वश्रेष्ठ दिया होता, तो कहानी की क्षमता को देखते हुए, छपाक बॉक्सऑफ़िस पर सफ़लता के झंडे गाड़ देती ।

छपाक की शुरूआत काफ़ी ड्राई नोट पर होती है । शुरूआत के 10-15 मिनट के लिए दर्शक फ़िल्म से जुड़ नहीं पाते है । जब फ़िल्म में फ़्लैशबेक सीन शुरू होता है वहां से फ़िल्म रफ़्तार पकड़ती है । फ़र्स्ट हाफ़ का सबसे प्रभावशाली सीन वो है जहां, मालती एसिड अटैक के बाद पहली बार आईने में अपना चेहरा देखती है, और अर्चना द्दारा मालती का संघर्ष करने के लिए हौंसला बढ़ाना । कोर्टरूम सीन बांधे रखता है, लेकिन इच्छा होती है कि इसमें और अधिक ड्रामा होता । सेकेंड हाफ़ में, रोमांटिक ट्रेक ज्यादा काम नहीं करता है । और फ़िर ऐसे पल आते हैं जिसमें पता नहीं चल पाता कि आखिर फ़िल्म कहां जा रही है । मेघना क्लाइमेक्स में एक और फ़्लैशबेक सीन बचाकर रखती है और फ़िर फ़िल्म यहां से अलग स्तर पर चली जाती है ।

दीपिका पादुकोण इतने जटिल हिस्से को बहुत ही गहनता के साथ निभाती है । वह अपने किरदार को बखूबी निभाती हैं और जिस सीन में उनके चेहरे पर एसिड फ़ेंका जाता है उसे वह बखूबी निभाती है । लेकिन ज्यादातर सीन में वह बहुत ज्यादा इमोशस नहीं दिखा पाती जो कि साफ़-साफ़ नजर आता है । लगता है कि वह इन दृश्यों में ऐसा कुछ करती जिससे उनका परफ़ोर्मेंस बेहतरीन हो जाता । विक्रांत मैसी शानदार दिखते हैं और वाकई अच्छा प्रदर्शन देते हैं । लेकिन दुख की बात यह है कि लेखक ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया । मधुर जीत सरगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे वह मनोहर ढंग से निभाती है । कोर्ट रूम के दृश्यों में वह काफी आत्मविश्वास से भरी दिखती हैं । विशाल दहिया शानदार प्रदर्शन देते हैं । डेलज़ाद हिवले बर्बाद होती है । पायल नायर (शिराज) और वैभवी उपाध्याय (मिनाक्षी) ठीक हैं । मनोहर तेली ठीक है और उस दृश्य में वह देखने लायक हैं जहां वह चुपके से शराब पीते है । परवीन का किरदार निभाने वाला अभिनेता कोर्टरूम के दृश्य में बेहतरीन लगते है ।

शंकर एहसान लॉय का संगीत यादगार नहीं है । टाइटल ट्रैक एक महत्वपूर्ण दृश्य में अच्छी तरह से जोड़ा गया है । 'नोक झोक' और 'खुलने दो' औसत हैं । शंकर एहसान लॉय और ट्यूबी का बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा बेहतर है ।

मलय प्रकाश की सिनेमेटोग्राफ़र उचित है । सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे का प्रोडक्शन डिजाइन साफ-सुथरा है । अभिलाषा शर्मा की वेशभूषा यथार्थवादी है, विशेष रूप से दीपिका द्वारा पहनी गई । श्रीकांत देसाई की हेयर स्टाइल और मेकअप शानदार है और प्रोस्थेटिक का भी बहुत अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया है । नितिन बैद का संपादन असंगत है ।

कुल मिलाकर, छपाक एक अहम मुद्दे और हमारे समाज में मौजूद अपराध को उजागर करने का एक साहसी प्रयास है । बॉक्सऑफ़िस पर यह फ़िल्म संघर्ष करेगी क्योंकि यह एक कमर्शियल फ़िल्म नहीं है । इसका बॉक्सऑफ़िस कलेक्शन मल्टीप्लेक्स के एक सीमित वर्ग तक सीमित रहेगी ।