टॉयलेट : एक प्रेम कथा, एयरलिफ़्ट, जॉली एलएलबी 2, हॉलीडे, बेबी, नाम शबाना इत्यादी के साथ लंबे समय से अक्षय कुमार सामाजिक और राष्ट्रवादी मुद्दों पर फ़िल्म बनाने में चैंपियन रहे है । यह कहना मुनासिब होगा कि अभिनेता ने वाणिज्यिक सिनेमा के क्षेत्र में उचित मुद्दों को एकीकृत करने के साथ अपनी अच्छी खासी जगह बना ली है । अक्षय, जो वर्तमान में व्यापार के क्षेत्र में सबसे अधिक विश्वसनीय अभिनेताओं में से एक हैं, आर बाल्की की पैड मैन ,जो कि ग्रामीण भारत में वंचित महिलाओं के सामने मासिक धर्म से संबंधित मुद्दों पर आधारित है, के साथ बड़े पर्दे पर फ़िर से लौटे हैं । ट्विंकल खन्ना के प्रोडक्शन हाउस, मिसेज फ़नीबोंस के बैनर तले बनी पैड मैन में अक्षय कुमार के अलावा सोनम कपूर और राधिका आप्टे ने अहम भूमिका निभाई है ।

फ़िल्म समीक्षा : पैड मैन अपने दमदार विषय से दिल जीत लेती है

पैड मैन को लेकर बनी तमाम हेडलाइन तार्किक रूप से फ़िल्म को लेकर उम्मीद बांधती है । तो क्या यह फ़िल्म हमारी सामूहिक अपेक्षाओं को पूरा करती है ? यह पता लगाने के लिए पढ़ें, जो हमने आपके लिए कवर किया है ।

यह फिल्म मध्य प्रदेश के एक गांव के व्यक्ति लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है साथ ही रूढ़िवादी समाज से जुड़े माहवारी और जाति के बारे में जागरूकता फैलाने की उसकी प्रेरक यात्रा है ।

सबसे पहले हम इस बात से सहमत हैं कि अक्षय का इस विषय पर फ़िल्म बनाना वाकई साहसी कदम है । एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि आम जनता, इस फ़िल्म की अपरंपरागत विषय सामग्री की वजह से फिल्म देखने से दूर हो सकती है । लेकिन मेकर्स ने यह सुनिश्चित किया है कि फ़िल्म का प्रचार पर्याप्त रूप से किया गया है जिससे लोग अपनी अज्ञानता को दूर कर देंगे और तहे दिल से फ़िल्म को गले लगाएंगे । फ़िल्म की कहानी शुरू कुछ इस तरह होती है, नवविवाहित लक्ष्मी पेशे से एक वेल्डर है, लेकिन वह महिलाओं की माहवारी के बारे में बहुत उत्सुक है और साथ ही उसके  आसपास स्वच्छता या जागरूकता की कमी से परेशान भी है ।

अक्षय कुमार गांव की देहाती पोशाक पहन लक्ष्मी के किरदार में सभी का ध्यान अपनी ओर बखूबी खींचते है । राधिका आपटे, मृण्मयी गोखले और ज्योति सुभाष सहायक कलाकार में शानदार लगते हैं और उनका प्रदर्शन उनसे मेल खाता है । फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ अक्षय और राधिका के बीच कई कड़वे-मीठे क्षणों से भरा हुआ होता है, लेकिन एक सीन जो हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ था, वो इंटरवल से ठीक पहले आता है ।

लक्ष्मी, एक पूर्ण प्रमाण नैपकिन बनाने की कोशिश में, एक पशु के रक्त की थैली को अपनी कमर में बांध लेता है और फ़िर उसमें से अपने हस्तनिर्मित पैड में लगातार रक्त की बूंदे गिराता है । उसे लगता है कि उसका काम हो गया, लेकिन उसे देखकर निराशा होती है कि उसका बनाया पैड लीक हो रहा है । अक्षय का गंदी पेंट होने पर नदी में डुबकी लगाना संभवत; रूढ़िवादी तत्वों को तोड़ता है । । यह वास्तव में हिंदी फ़िल्म नायक के लिए साहसी प्रयास है जो इस तरह का कुछ करने का प्रयास करता है । स्वानंद किरकिरे और आर बाल्की द्वारा लिखे गए संवाद मजाकिया, भावनात्मक हैं, जो मुख्य अभिनेता का जमीनी स्वभाव दर्शाता है । हालांकि हमें लगा कि लक्ष्मी का संयुक्त राष्ट्र स्पीच थोड़ी कम की जा सकती थी ।

सेकेंड हाफ़ में, निर्देशक आर बाल्की थोड़ा सा भटक से जाते हैं क्योंकि तब फ़िल्म थोड़ी टेक्निकल हो जाती है, जब लक्ष्मी एक पैड निर्माण मशीन को शुरूआत से बनाते है । यहां चंदन अरोड़ा द्दारा की गई एडिटिंग और भी सख्त हो सकती थी । इसके अलावा, सोनम कपूर की एंट्री थोड़ी बहुत सुविधाजनक लगती है और जिस तरह से वह पैड बॉय अक्षय के साथ मिलकर काम करना शुरू करती है, थोड़ा फ़िल्मी सा लगता है । सोनम अक्षय के किरदार के साथ एक विश्वासपात्र और मार्केटिंग गुरु के रूप में एक ईमानदार प्रदर्शन देने की कोशिश करती है लेकिन फिल्म में उन पर थोड़ा ध्यान कम दिया जाता है । हालांकि वह कई जगह अपनी उपस्थिती दर्ज कराने की पूरी कोशिश करती है जिसमें वह कई जगह कामयाब भी होती है । यह कहना गलत नहीं होगा कि, सोनम और अक्षय के बीच मेकर्स द्दारा लव एंग़ल क्रिएट करना जबरदस्ती का घुसाया हुआ लगा ।

पटकथा (आर बाल्की) काफी आकर्षक और मनोरंजक है । हालांकि यह कहीं_कहीं भटक सी जाती है लेकिन फ़िर एकदम से ऊपर उठकर कहानी के रूप में सामने आती है ।

क्योंकि इस फ़िल्म, जो कि तमिलनाडु के सामाजिक उद्यमी अरुणाचलम मुरुगनाथम की जिंदगी से प्रेरित है, को अधिक से अधिक दर्शकों को मद्देनजर रखते हुए उत्तर भारतीय संवेदनशीलता के अनुरूप बनाया गया है, इसलिए पैड मैन को मध्य प्रदेश के महेश्वर, इंदौर और महू के सुंदर स्थानों पर शूट किया गया है । पीसी श्रीराम ने छायांकन के साथ एक उत्कृष्ट काम किया है । वहां रहने वाले लोगों की जीवन शैली की सादगी को कैप्चर करने में कैमरे का काम सुंदर और विशाल लगता है । फ़िल्म में किरदारों की पोशाक, बातचीत करने का अंदाज और बहुत कुछ देखकर लोग इस फ़िल्म से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते है ।

अमित त्रिवेदी का संगीत अच्छा है, लेकिन ईमानदारी से कहें तो यह शानदार नहीं । केवल दो गानें "आज से तेरी' और पैड मैन टाइटल सॉंग अच्छे है लेकिन फ़िल्म में संगीत की गुंजाइश कम है क्योंकि फ़िल्म की विषय सामग्री ही काफ़ी दमदार है ।

यहां यह कहना सही होगा कि अक्षय कुमार संजीदगी से अपने नारीवादी आईकन, जो अपने कारण के लिए बेहद भावुक और जुनूनी है, को अच्छी तरह से निभाते है । यह वाकई प्रशंसनीय है कि अक्षय ने एक टैबू टॉपिक (टॉयलेट: एक प्रेम कथा, के बाद) लिया और उस पर कमर्शियल फ़िल्म बनाई, ज्यादा उपदेशात्मक हुए बिना । इसके अलावा, यहां ध्यान देना भी दिलचस्प है कि बाल्की के दर्शक हमेशा से शहरी रहे हैं है लेकिन इस बार उन्होंने एक देहाती या मूल फ़िल्म बनाकार, जिसमें वर्ग / जाति के अवरोधों में कटौती करने की क्षमता है, हमें चौंका दिया ।

कुल मिलाकर, पैड मैन एक वर्जित विषय पर कमर्शियल फ़िल्म बनाने का साहसी और प्रेरक प्रयास है । फ़िल्म अपने कंटेंट और भावनाओं को लेकर सफ़लता अर्जित करती है । बॉक्सऑफ़िस पर अक्षय कुमार का सामूहिक अनुरोध दर्शकों को खींचने में निश्चितरूप से मदद करेगा । इसमें, सकारात्मक तारीफ़ों से बॉक्सऑफ़िस पर बढ़त हासिल करने की पूरी क्षमता है ।