अधिकतम मुंबई शहर अद्वितीय है और भारत के किसी अन्य महानगर से काफ़ी अलग है । जिस तरह से समाज के विभिन्न स्तरों के लोग यहां एक दूसरे के साथ मिलकर बातचीत करते, घुलमिल कर रहते है, यह इस शहर की खासियत है । इस हफ़्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है कालाकांडी, जिसके साथ डेली बेली के लेखक अक्षत वर्मा ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा है, एक अलग अंदाज में मुंबई के इस पहलू पर प्रकाश डालने का प्रयास करती है । तो क्या यह फ़िल्म मनोरंजन करने में कामयाब होगी, या यह निराश करती है ? आइए समीक्षा करते है ।

कालाकांडी कहानी है कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए लोग मुंबई में एक खेदजनक रात इकठ्ठे होते है । रिलीन (सैफ अली खान) को एक दिन पता चलता है कि उसे पेट का कैंसर है और उसकी जिंदगी के कुछ ही दिन बचे है । तारा (शोभिता धुलिपला) ज़ुबिन (कुनाल रॉय कपूर) से डेटिंग कर रही है । वह आयशा (शहनाज ट्रेजरी) से मिलती है क्योंकि उसका जन्मदिन है । ये सब एक रेव पार्टी मेम मिलते है लेकिन उस रेव पार्टी में पुलिस का छापा प।द जाता है । तारा को लगता है कि वह फ़्लाइट पकड़ने के लिए काफ़ी लेट हो रही है और इसकी पूछताछ के बीच खुद को फ़ंसते देखकर वह यहां से बच निकलने का प्लान बनाते है । । वारिस (दीपक डोबरियाल) और अमजद (विजय राज) खतरनाक गैंगस्टर रजा (असिफ बसरा) के लिए काम करते हैं । वह अपने बॉस को धोखा देकर रातोंरात अमीर होने का प्लान बनाते है । अंगद (अक्षय ओबेराय) रिलीन के भाई हैं, जो उसी रात नेहा (अमायरा दस्तूर) से शादी कर रहे हैं । उसे अपनी पूर्व-प्रेमिका सेलीना (अमांडा रोजारियो) से एक फोन आता है । वह बताती है कि वह मुंबई में है और तुरंत उससे मिलना चाहती है । अंगद तुरंत मान जाती है । कैसे ये सभी ट्रेक्स अलग-अलग किरदरों की जिंदगी पर क्या प्रभाव डालते है, यह सब बाकी की फ़िल्म में पता चलता है ।

कालाकांडी का फ़र्स्ट हाफ़ काफ़ी दिलचस्प और हास्यास्पद है । फ़िल्म के किरदारों का काफ़ी अच्छी तरह से परिचय कराया गया है और निर्देशक अक्षत वर्मा ने कई सारे ट्रेक्स को बखूबी संभाला है । सैफ़ अली खान का ट्रेक सबसे मजेदार है क्योंकि यह काफ़ी दिलचस्प है और वाहवाही पाता है । जिस तरीके से वह भ्रम पैदा करता है वह बहुत अच्छी तरह से किया जाता है । हैरानी की बात है इसके बाद सब कुछ बिखरने लगता है । और फ़िर फ़िल्म फ़नी होना बंद कर देती है और बोर करने लगती है । तारा-ज़ुबिन का ट्रैक अच्छे नोट पर समाप्त होता है लेकिन यह ऐसी कोई फिल्म नहीं है जिसकी हम उम्मीद करते हैं । वारिस-अमजद का ट्रैक नियंत्रण से बाहर हो जाता है और विशेष रूप से जिस तरह से समाप्त होता है उसे समझना मुश्किल होता है ।

अक्षत वर्मा की कहानी कुछ हद तक आशाजनक है लेकिन फिर खराब हो जाती है । इसकी कहानी अगली 99, शोर इन द सिटी और यहां तक की डेल्ही बेल्ही की क्षमता रखती थी लेकिन दुख की बात है लेखक ऐसा करने में विफ़ल रहते है । अक्षत वर्मा का स्क्रीनप्ले फ़र्स्ट हाफ़ तक बांधे रखता है लेकिन फ़िर ये आकर्षित नहीं करती है । अक्षत वर्मा के डायलॉग्स फ़नी और मजेदार है, खासकर सैफ अली खान और शहनाज ट्रेजरी के । अक्षत वर्मा का निर्देशन नवोदित के रूप में अच्छा है । लेकिन ऐसी कमजोर स्क्रिप्ट के साथ, उनके पास बहुत कम चांस थे इसे बचाने के लिए ।

फ़िल्म के बारें में सैफ़ अली खान बेहतरीन है । वह क्रेजी परफ़ोरमेंस देते है और यह फिल्म के बारे में एकमात्र नया फ़ैक्टर साबित हुई है । अक्षय ओबेरॉय गंभीर है और अच्छी परफ़ोरमेंस देते है । शोभिता धूलिपाला अपने कठिन हिस्से को बहुत ही सहजता के साथ निभा जाती है । कुणाल रॉय कपूर जंचते है और अपने एंट्री सीक्वेंस में हंसी का डोज देते है । दीपक डोबरियाल चमकते है लेकिन विजय राज को करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं मिलता है । शहनाज ट्रेजरीवाला हॉट लगती हैं और हंसी को बढ़ाती है । शिवम पाटील (जहांगीर) इमरान हाशमी सीक्वंस में एक प्रभाव छोड़ जाते है । नेरी सिंह (शैला) एक बहुत प्यारा किरदार है और वह उसे अच्छे से निभाती है । अमायरा दस्तूर सुंदर दिखती है लेकिन बहुत कम नजर आती है । आसिफ बसरा खतरनाक है । नील भूपलम (उस्ताद) एक अनोखा किरदार निभाते है, जो कुछ भी उसने अतीत में किया है उसके विपरीत वह इसमें करते है लेकिन उन्हें सीमित स्क्रीन टाइम दिया गया है । ईशा तलवार (राखी) अच्छा परफ़ोरमेंस देती है लेकिन ये देखना हैरानी देता है क्यों वह हर समय तस्वीर खींचती रहती है ।

समीर उदीन का संगीत बहुत अच्छा नहीं है । 'स्वैगपुर का चौधरी' थोड़ा यादगार है जबकि 'काल डोरेया' भूलने योग्य है । हालांकि बैकग्राउंड स्कोर फ़ंकी है ।

हिममान धामिया का छायांकन साफ है । निधि रूंगटा का प्रोडक्शन डिजाइन प्रामाणिक है । शान मोहम्मद का संपादन मज़बूत होना चाहिए था । वीएफएक्स शानदार है, विशेषकर उन दृश्यों में जहां सैफ भ्रम में फ़ंसे हुए है ।

कुल मिलाकर, कालाकांडी फ़र्स्ट हाफ़ में अच्छी होने का भरोसा दिलाती है लेकिन इसके बाद यह पूरी तरह से भटक जाती है । बॉक्सऑफ़िस पर इस फ़िल्म के व्यावसायिक रूप से सफल होने की बहुत कम संभावनाएं है ।